Hartalika Teej Katha In Hindi: हरतालिका तीज व्रत की इस कथा को पढ़ पूजन करें संपन्न

Hartalika Teej Katha: मान्यता है हरतालिका व्रत कथा स्वयं भगवान शिव ने ही मां पार्वती को सुनाई थी। जानिए क्या है ये कथा।

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विवाहित स्त्रियां इस व्रत को पति की लंबी उम्र और खुशहाल जीवन की कामना से रखती हैं

Hartalika Teej Katha: हरतालिका तीज व्रत में भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश भगवान की पूजा की जाती है। विवाहित स्त्रियां इस व्रत को पति की लंबी उम्र और खुशहाल जीवन की कामना से रखती हैं तो वहीं अविवाहित लड़कियां अच्छे वर की प्राप्ति के लिए। हरतालिका तीज व्रत पूजन में कथा सुनना बेहद जरूरी माना जाता है। मान्यता है हरतालिका व्रत कथा स्वयं भगवान शिव ने ही मां पार्वती को सुनाई थी। जानिए क्या है ये कथा।

शिव जी कहते हैं- ‘हे गौरा, पिछले जन्म में तुमने मुझे पाने के लिए क‍ठोर तप और घोर तपस्या की थी। तुमने इस तपस्या के दौरान ना तो कुछ खाया और ना ही पीया बस हवा और सूखे पत्ते चबाकर रहीं। भयंकर गर्मी और कंपा देने वाली ठंड भी तुम्हें तुम्हारी तपस्या से हटा न सकी। बारिश में भी तुमने जल नहीं पिया। तुम्हारी इस हालत को देख तुम्हारे पिता दु:खी थे। उनको दु:खी देख नारदमुनि आए और कहा कि मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां आया हूं। वह आपकी कन्या की से विवाह करना चाहते हैं।

’नारदजी की बात सुनकर आपके पिता बोले अगर भगवान विष्णु यह चाहते हैं तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं। परंतु जब तुम्हें इस विवाह के बारे में पता चला तो तुम अत्यंत ही दुःखी हो गईं। तुम्हारी सहेली ने तुम्हारे दुःख का कारण पूछा तो तुमने उसे बताया कि मैंने सच्चे मन से भगवान शिव का वरण किया है, किन्तु मेरे पिता ने विष्णुजी के साथ मेरा विवाह तय कर दिया है। अब मेरे पास प्राण त्याग देने के अलावा कोई और उपाय नहीं बचा है। (यह भी पढ़ें- कैसे रखें हरतालिका तीज व्रत, क्या सामग्री है जरूरी और क्या रहेगा पूजा का मुहूर्त, जानिए सबकुछ)

तुम्हारी सखी ने कहा-प्राण छोड़ने का यहां कारण ही क्या है? मैं तुम्हें घनघोर वन में ले चलती हूं जो साधना स्थल भी है और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी नहीं पाएंगे। तुमने अपनी सखी की बात मानकर ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर में न पाकर बड़े चिंतित और दुःखी हुए। इधर तुम्हारी खोज होती रही उधर तुम अपनी सहेली के साथ गुफा में मेरी आराधना में लीन रहने लगीं। तुमने एक दिन रेत के शिवलिंग का निर्माण किया। तुम्हारी कठोर तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन हिल उठा और मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास पहुंचा और तुमसे वर मांगने को कहा।

वर मांगते हुए तुमने कहा, ‘मैं आपका सच्चे मन से पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए। तब ‘तथास्तु’ कहकर मैं कैलाश पर्वत पर लौट गया। उसी समय गिरिराज अपने बंधु-बांधवों के साथ तुम्हें खोजते हुए वहां पहुंचे। तुमने कहा कि मैं घर तभी जाउंगी अगर आप महादेव से मेरा विवाह करेंगे। तुम्हारे पिता मान गए और उन्होने हमारा विवाह करवा दिया। मान्यता है जिस दिन भगवान शिव ने माता पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार किया था उस दिन भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी। (यह भी पढ़ें- प्रेग्नेंट महिलाएं कैसे रखें हरतालिका तीज व्रत? जानिए व्रत से जुड़े सभी जरूरी सवालों के जवाब यहां)

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