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Hartalika Teej 2018 Puja Vidhi, Muhurat, Vrat Katha: जानें हरतालिका तीज पूजन सामग्री, मुहूर्त और व्रत विधि!

Hartalika Teej 2018 Puja Vidhi, Vrat Katha, Muhurat, Samagri, Timings, हरतालिका तीज 2018 पूजन विधि, व्रत कथा: हरतालिका तीज का प्रात: काल शुभ सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त 6.08 बजे से रात 8.35 बजे तक है। इस व्रत को सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए किया था।

Hartalika Teej 2018 Puja Vidhi, Vrat Katha: यह व्रत हिंदू पंचांग के मुताबिक भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया को रखा जाता है।

Hartalika Teej 2018 Puja Vidhi, Vrat Katha, Muhurat, Samagri, Timings in Hindi: हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। इस साल 12 सितबंर दिन बुधवार को हरतालिका तीज मनाई जा रही है। हरतालिका तीज का त्योहार शिव और पार्वती के पुर्नमिलन के उपलक्ष में मनाया जाता है। मान्यता है कि मां पार्वती ने शिव को पति के रूप में पाने के लिए 107 जन्म लिए थे। आखिर में मां पार्वती के कठोर तप की वजह से उनके 108वें जन्म में शिव ने पार्वती जी को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था। उसी समय से ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से मां र्पावती प्रसन्न होकर पतियों को दीर्घायु होने का आशीर्वाद देती है। इसके अलावा यह त्योहार एक बेहतर और सौभाग्य वर पाने के लिए भी रखा जाता है। अधिकांश महिलाएं इस दिन निर्जल व्रत रखती हैं तथा भगवान शिव और माता पार्वती की मिट्टी या बालू की प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करती हैं। पारण से पहले पानी पीना इस व्रत में वर्जित है। इसीलिए इस व्रत को सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है। आइए जानते हैं पूजा विधि और शुभ मुहूर्त।

पूजा का शुभ मुहूर्त: हरतालिका तीज का प्रात: काल शुभ सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त 6.08 बजे से रात 8.35 बजे तक है। इस व्रत को सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए किया था। इस व्रत में कुछ भी खाया-पिया नहीं जाता है। तृतीय तिथि आरंभ – 11 सितंबर 2018, मंगलवार 18:04 बजे। तृतीया तिथि समाप्त – 12 सितंबर 2018, बुधवार 16:07 बजे।

पूजन विधि:  हरतालिका तीज का व्रत रखने के लिए महिलाएं सुबह-सुबह उठकर सन्ना करने के बाद एक चौकी पर रंगीन वस्त्रों के आसन बिछाकर शिव और पार्वती की मूर्तियों को स्थापित करें। अगर ऐसा संभव नहीं है तो केवल शिवलिंग की पूजा भी की जा सकती है। मंदिर जाते वक्त 16 श्रंगार का सामान ले जाना होता है। इनमें कंघी, आइना, सिंदूर, बिंदी, काली मोतियों का मंगलसुत्र, लिप्सटिक, काजल, एक दर्जन चूड़ियां, मेहंदी, नेल पॉलिस, चांदी की बिछिया, लाल वस्त्र, लाल चुनरी, भगवान शिव के लिए पीला कपड़ा, जनेऊ, कलावा शामिल हैं। ये ले जाकर मंदिर में माता पार्वती को अर्पित करना होता है।

इस व्रत का पालन करने का संकल्प लें। संकल्प करते समय अपने समस्त पापों के विनाश की प्रार्थना करते हुए कुल, कुटुम्ब एवं पुत्र पौत्रादि के कल्याण की कामना की जाती है। आरंभ में श्री गणेश का विधिवत पूजन करना चाहिए। गणेश पूजन के पश्चात् शिव-पार्वती का आवाहन, आसन, पाद्य, अघ्र्य, आचमनी, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंध, चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, दक्षिणा तथा यथाशक्ति आभूषण आदि से षोडशोपचार पूजन करना चाहिए।

पूजन की समाप्ति पर पुष्पांजलि चढ़ाकर आरती, प्रदक्षिणा और प्रणाम करें। फिर कथा श्रवण करें। कथा के अंत में बांस की टोकरी या डलिया में मिष्ठान्न, वस्त्र, पकवान, सौभाग्य की सामग्री, दक्षिणा आदि रखकर आचार्य पुरोहित को दान करें। पूरे दिन और रात में जागरण करें और यथाशक्ति ओम नम: शिवाय का जप करें। दूसरे दिन और प्रात: भगवान शिव-पार्वती का व्रत का पारण करना चाहिए।

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