इस्लाम धर्म के पांच पवित्र स्तंभों में से एक है हज, जो हर साल आयोजित किया जाता है। हर वो मुसलमान जो साहिब-ए-हैसियत हो, उस पर जिंदगी में एक बार हज करना फर्ज माना गया है। मुसलमानों के लिए हज उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी और पाक इबादतों में से एक होता है। झुलसा देने वाली भीषण गर्मी और करीब 50 डिग्री सेल्सियस तापमान के बीच दुनिया भर से आए लाखों अकीदतमंद सफेद लिबास यानी एहराम पहनकर मैदान-ए-अराफात की ओर बढ़ते हैं। यहां न कोई राजा होता है, न कोई गरीब, न रंग का फर्क और न ही ऊंच-नीच का भेद। सफेद एहराम में लिपटे लाखों कदमों का सिर्फ एक ही ठिकाना होता है  मैदान-ए-अराफात।

मैदान-ए-अराफात यानी Mount Arafat हज का वह सबसे अहम पड़ाव माना जाता है, जहां पहुंचकर हर हाजी की आंखें नम हो जाती हैं। अराफात की तपती पहाड़ियों पर उमड़ता आस्था का यह समंदर इंसान को अपने गुनाहों से तौबा करने और अल्लाह से माफी मांगने का मौका देता है। इस्लामिक मान्यता के अनुसार, अराफात में ठहरने के बिना हज अधूरा माना जाता है। यही वजह है कि इस दिन को हज की रूह कहा जाता है। 

हज का सबसे आखिरी दिन अराफात का दिन 

इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार,अल-हज्जू अराफात यानी अराफात के मैदान में ठहरना (वकूफ) ही असल में हज है। जो शख्स 9 जिलहिज को यहां नहीं पहुंचता, उसका हज मुकम्मल नहीं माना जाता। मैदाने अराफात में बिताए गए ये चंद घंटे एक हाजी की जिंदगी का सबसे बड़ा पल होते हैं। तपते हुए पहाड़ ‘जबल-अल-रहमह’ (रहमत की पहाड़ी) पर खड़े होकर जब लाखों लोग एक साथ ‘लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक’ (हाजिर हूं ऐ अल्लाह, मैं हाजिर हूं) पुकारते हैं, तो वह मंजर रोंगटे खड़े कर देने वाला और दिलों को पिघला देने वाला होता है।

हज के मुकद्दस सफर की पूरी जानकारी: एहराम से लेकर जुमरात तक

एहराम और तवाफ

हज की शुरुआत एहराम यानी सफेद चादर बांधने से होती है। हाजी दो सफेद चादरों वाला एहराम पहनते हैं। नीचे वाली चादर को इस तरह बांधा जाता है कि चलने, तवाफ करने और सई करने में आसानी रहे। इसके बाद हाजी Masjid al-Haram पहुंचते हैं, जहां काबा का तवाफ किया जाता है। हज की नीयत के बाद तलबिया ‘लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक…’ लगातार पढ़ा जाता है।

मीना की ओर रवाना

तवाफ और नमाज के बाद हाजी मीना के लिए रवाना होते हैं। 8 ज़िलहिज्जा को मीना पहुंचना सुन्नत माना जाता है। यहां बड़े-बड़े खेमों में हाजियों के रहने, खाने और आराम की व्यवस्था होती है। मीना में पांचों नमाजें अदा की जाती हैं। भीषण गर्मी को देखते हुए मीना में हाजियों के लिए एयर कंडीशनर वाले टेंट, वुज़ूखाने, कैंटीन और चौबीसों घंटे मेडिकल सुविधाएं मौजूद रहती हैं।

अराफात का दिन (हज का सबसे अहम रुक्न): 

9 ज़िलहिज्जा की सुबह हाजी अराफात की ओर रवाना होते हैं। अराफात पहुंचने के बाद ज़ोहर और असर की नमाज एक साथ पढ़ी जाती है और हज का खुत्बा सुना जाता है। फिर वकूफ-ए-अराफात किया जाता है, यानी अराफात में ठहर कर अल्लाह से गिड़गिड़ाकर दुआ की जाती है। अगर कोई हाजी अराफात में वुकूफ़ (ठहरना) नहीं कर पाया, तो उसका हज पूरा नहीं माना जाता।

मस्जिद-ए-नमिरा और हज का खुत्बा

अराफात में मौजूद Masjid al-Namirah में ही हज का मुख्य खुत्बा (संबोधन) दिया जाता है। यह एक ऐसी ऐतिहासिक मस्जिद है जहां आम दिनों में नमाज नहीं होती, लेकिन 9 ज़िलहिज्जा को यहां लाखों हाजी जुहर और असर की नमाज़ एक साथ अदा करते हैं। सूरज डूबने तक अराफात में ठहरना अनिवार्य है।

मुज़दलिफा में रात और रमी (कंकरी मारना)

सूर्यास्त के बाद हाजी Muzdalifah पहुंचते हैं, जहां खुले आसमान के नीचे रात गुजारी जाती है। यहीं से जुमरात (शैतान) के लिए छोटे-छोटे कंकड़ जमा किए जाते हैं। 10 ज़िलहिज्जा की फज्र की नमाज के बाद हाजी मीना लौटते हैं और Jamarat Bridge जाकर शैतान को प्रतीकात्मक रूप से कंकरी मारते हैं।

हल्क, कुर्बानी और तवाफ-ए-जियारह

कंकरी मारने के बाद अल्लाह की राह में कुर्बानी दी जाती है और मर्द हाजी सिर मुंडवाते हैं (जिसे हल्क कहा जाता है) और एहराम खोलते हैं। इसके बाद 10 जिलहिज्जा को ही दुनिया भर के मुसलमान ईद-उल-अजहा (बकरीद) मनाते हैं। इसके बाद हाजी दोबारा काबा पहुंचकर तवाफ-ए-जियारह और सफा-मरवा के बीच सई करते हैं, जिसके बाद हज के मुख्य अरकान मुकम्मल होते हैं।

डिस्क्लेमर:यह लेख इस्लामिक इतिहास, हज के पारंपरिक अरकान (नियमों) और हज मंत्रालय (सऊदी अरब) द्वारा जारी की जाने वाली सामान्य जानकारियों पर आधारित है। हज यात्रा की लाइव अपडेट्स, बदलती गाइडलाइंस और तारीखों के लिए हज कमेटी ऑफ इंडिया या सऊदी हज मंत्रालय की आधिकारिक घोषणाओं को ही अंतिम माना जाए।