Guru Pradosh Vrat Katha 2026 (गुरु प्रदोष व्रत कथा): हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का विशेष महत्व है। भगवान शिव को समर्पित इस व्रत पर पूजा करने के साथ व्रत रखने का विधान है। गुरुवार के दिन पड़ने के कारण इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाएगा। गुरुवार होने के कारण इस दिन विष्णु जी की पूजा भी करना अत्यंत लाभकारी हो सकता है। गुरुवार का संबंध बृहस्पति ग्रह से लेकर ज्ञान, धर्म, गुरु कृपा और समृद्धि से संबंधित माना जाता है। इसके साथ ही इस दिन प्रदोष काल के समय शिव जी की आराधना करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इस दिन शिव जी और मां पार्वती की पूजा, व्रत करने के साथ-साथ इस व्रत कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। आइए जानते हैं गुरु प्रदोष व्रत की संपूर्ण कथा और धार्मिक महत्व….

गुरु प्रदोष व्रत 2026 तिथि (Guru Pradosh 2026 Date)

ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि का आरंभ- 14 मई को दोपहर में 11 बजकर 21 मिनट पर
ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि समाप्त- 15 मई को सुबह में 8 बजकर 32 मिनट पर
गुरु प्रदोष व्रत तिथि- 14 मई 2026, गुरुवार

गुरु प्रदोष व्रत पूजा का मुहूर्त (Guru Pradosh 2026 Shubh Muhurat)

शिव जी की पूजा शाम 5 बजकर 22 मिनट से 7 बजकर 4 मिनट तक कर सकते हैं।

गुरु प्रदोष व्रत की कथा (Pradosh Vrat Katha)

इस व्रत कथा के अनुसार एक बार इंद्र और वृत्तासुर की सेना में घनघोर युद्ध हुआ। देवताओं ने दैत्य-सेना को पराजित कर नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। यह देख वृत्तासुर अत्यंत क्रोधित हो स्वयं युद्ध को उद्यत हुआ। आसुरी माया से उसने विकराल रूप धारण कर लिया। सभी देवता भयभीत हो गुरुदेव बृहस्पति की शरण में पहूंचे। बृहस्पति महाराज बोले- पहले मैं तुम्हें वृत्तासुर का वास्तविक परिचय दे दूं।

वृत्तासुर बड़ा तपस्वी और कर्मनिष्ठ है। उसने गंधमादन पर्वत पर घोर तपस्या कर शिवजी को प्रसन्न किया। पूर्व समय में वह चित्ररथ नाम का राजा था। एक बार वह अपने विमान से कैलाश पर्वत चला गया। वहां शिवजी के वाम अंग में माता पार्वती को विराजमान देख वह उपहासपूर्ण बोला- ‘हे प्रभो! मोह-माया में फंसे होने के कारण हम स्त्रियों के वशीभूत रहते हैं किंतु देवलोक में ऐसा दृष्टिगोचर नहीं हुआ कि स्त्री आलिंगनबद्ध हो सभा में बैठे।’

चित्ररथ के यह वचन सुन सर्वव्यापी शिव शंकर हंसकर बोले- ‘हे राजन! मेरा व्यावहारिक दृष्टिकोण पृथक है। मैंने मृत्युदाता-कालकूट महाविष का पान किया है, फिर भी तुम साधारणजन की भांति मेरा उपहास उड़ाते हो!’ माता पार्वती क्रोधित हो चित्ररथ से संबोधित हुईं- ‘अरे दुष्ट! तूने सर्वव्यापी महेश्वर के साथ ही मेरा भी उपहास उड़ाया है अतएव मैं तुझे वह शिक्षा दूंगी कि फिर तू ऐसे संतों के उपहास का दुस्साहस नहीं करेगा- अब तू दैत्य स्वरूप धारण कर विमान से नीचे गिर, मैं तुझे शाप देती हूं।’

जगदम्बा भवानी के अभिशाप से चित्ररथ राक्षस योनि को प्राप्त हुआ और त्वष्टा नामक ऋषि के श्रेष्ठ तप से उत्पन्न हो वृत्तासुर बना। गुरुदेव बृहस्पति आगे बोले- ‘वृत्तासुर बाल्यकाल से ही शिवभक्त रहा है अत हे इंद्र! तुम बृहस्पति प्रदोष व्रत कर शंकर भगवान को प्रसन्न करो।’ देवराज ने गुरुदेव की आज्ञा का पालन कर बृहस्पति प्रदोष व्रत किया। गुरु प्रदोष व्रत के प्रताप से इंद्र ने शीघ्र ही वृत्तासुर पर विजय प्राप्त कर ली और देवलोक में शांति छा गई। अत: प्रदोष व्रत हर शिव भक्त को अवश्य करना चाहिए।

गुरु प्रदोष व्रत कथा कहने का महत्व (Guru Pradosh 2026 Significance)

गुरु प्रदोष व्रत के दिन कथा कहने और सुनने का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार प्रदोष काल में केवल व्रत ही नहीं रखा जाता है बल्कि भगवान शिव की महिमा, कथा और उनके द्वारा मिलने वाली कृपा के बारे में बताया जाता है। इस व्रत कथा का पाठ करने से कई गुना अधिक फलों की प्राप्ति हो सकती है।

गुरु प्रदोष व्रत कथा का पाठ करने या फिर श्रवण करने से मां पार्वती के साथ शिव जी की कृपा प्राप्त हो सकती है। इसके साथ ही जीवन के हर एक रोग, दोष और कष्ट दूर हो सकते हैं। इसके अलावा कुंडली में गुरु की स्थिति मजबूत होने के साथ विवाह, संतान होने में आ रही परेशानियां समाप्त हो सकती है। पूर्व जन्म के किए गए पापों से मुक्ति मिल सकती है और घर में सुख-शांति, धन-समृद्धि बनी रह सकती है।

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डिसक्लेमर- यह लेख पूरी तरह से ज्योतिषीय गणनाओं और मान्यताओं पर आधारित है। जनसत्ता इसकी सत्यता या इससे होने वाले किसी भी लाभ-हानि की पुष्टि नहीं करता है। अधिक जानकारी के लिए पंचांग, शास्त्र या फिर किसी पंडित से अवश्य जानकारी लें।