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Guru Gobind Singh Jayanti 2019: सिखों के अंतिम गुरु थे गोबिंद सिंह, जानिए गुरुपर्व का क्या है महत्व

Guru Gobind Singh Jayanti 2019: गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु की पदवी को समाप्त करने के लिए गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का गुरु बनाया। गुरु गोबिंद सिंह ने ही संदेश दिया था कि अब कोई भी देहधारी गुरु नहीं होगा और गुरु वाणी व गुरु ग्रंथ साहिब ही सिखों के लिए गुरु सामान्य होगी।

Happy Guru Gobind Singh Jayanti 2019: गुरु गोबिंद सिंह सिखों के दसवें और अंतिम गुरु थे।

Guru Gobind Singh Jayanti 2019: गुरु गोबिंद सिंह जी को बचपन में गोबिंद राय कहा जाता था। गुरु गोबिंद सिंह का जन्म पटना में 22 दिसंबर वर्ष 1666 को हुआ था। पटना के जिस घर में गुरु का जन्म हुआ उसे आज तख्त श्री पटना साहिब के नाम से जाना जाता है। जानकारी के मुताबिक गुरु गोबिंद सिंह ने अपने बचपन के 4 साल यहां गुजारे। उनके पिता का नाम गुरु तेग बहादुर तथा माता का नाम गुजरी था। जब गुरु गोबिंद सिंह का जन्म हुआ था तब उनके पिता असम में धर्म उपदेश के लिए गए हुए थे।

कहा जाता है कि 1670 में उनका परिवार पंजाब में वापस आ गया और मार्च 1672 में उनका परिवार हिमालय के शिवालिक पहाड़ियों के चक्क नानकी नाम के जगह पर गया जो अब आनंदपुर साहेब के नाम से विख्यात है। गुरु गोबिंद सिंह की शिक्षा यहीं से आरंभ हुई थी। गोबिंद सिंह जी ने फारसी संस्कृति की शिक्षा प्राप्त की और एक योद्धा बनने के लिए अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान भी हासिल किया।

आज सिख समुदाय के बीच गुरु गोबिंद सिंह के जन्म उत्सव को ‘गुरु गोबिंद जयंती’ या ‘गुरु पर्व’ के रुप में मनाया जाता है। इस मौके पर देश के विभिन्न गुरुद्वारों में भव्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं तथा गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ भी किया जाता है। 5 जनवरी को गुरु की जयंती को प्रकाश पर्व के रुप में मनाया जाता है।

खालसा पंथ के संस्थापक: गुरु गोबिंद सिंह ने सन् 1699 में बैसाखी के दिन खालसा जो की सिख धर्म के विधिवत दीक्षा प्राप्त अनुयायियों का एक सामुहिक रूप है उसका निर्माण किया था। गुरु गोबिन्द सिंह जी ने एक सिख समुदाय की सभा में आये लोगों से पूछा – ‘कौन अपने सर का बलिदान देना चाहता है’ ? उसी समय एक व्यक्ति राजी हो गया और गुरु गोबिन्द जी के साथ एक तम्बू में चला गया और कुछ देर बाद गुरु गोबिन्द जी अकेले वापस आये और उनके हाथ में एक तलवार थी जिस पर खून लगा हुआ था। फिर गुरु गोबिन्द सिंह जी ने यही सवाल पूछा और एक और व्यक्ति राजी हो गया और तम्बू में चला गया और फिर गोबिन्द जी अकेले आये और खुनी तलवार हाथ में थी।

लगातार ऐसे ही पांचवा व्यक्ति जब उनके साथ तम्बू में चला गया और कुछ देर बाद गुरु गोबिन्द जी उन सभी जीवित लोगों के साथ वापस लौटे तब उन्होंने उन्हें पंज प्यारे या पहले खालसा का नाम दिया था।  गुरु गोबिन्द जी ने एक लोहे का कटोरा लिया और उसमें पानी और चीनी मिला कर दुधारी तलवार से घोल कर अमृत का नाम दिया और उन पांच व्यक्तियों के बाद खुद छठवां खालसा का नाम दिया जिसके बाद उनका नाम गुरु गोबिन्द राय से बदलकर गुरु गोबिन्द सिंह रख दिया गया। गोबिंद सिंह ने उस वक्त पांच चीजों का महत्व बताया और समझाया – केश, कंघा, कडा, किरपान, क्च्चेरा।

अत्याचार के खिलाफ लड़ी जंग: मुगल शासक औरंगजेब के राज में 27 दिसम्बर 1704 को जोरावतसिंह व् फ़तेहसिंह जी (छोटे साहिबजादे) को दीवारों में चुनवा दीया गया था। जब ये बात गुरूजी को पता चली तो उन्होंने औरंगजेब को जफरनामा (जीत की चिट्टी) लिखी की औरंगजेब तेरा साम्राज्य खत्म करने के लिए खालसा तैयार हो गए हैं। उन्होंने 8 मई 1705 में “मुक्तसर” नामक जगह पर मुगलों से बहुत भयानक युद्ध लड़ी और जीत हासिल की। गुरु जी ने हमेशा अत्याचार के खिलाफ ही युद्ध किये थे जिसमे उनका कोई आपसी लाभ नहीं था। यही कारण है की लोगों के दिलों में गुरु गोबिन्द जी का वास है और गुरु जी की कही बातों पे आज भी अमल किया जाता है।

बेहतरीन कवि: एक बहादुर योद्धा होने के साथ-साथ गुरु गोबिंद सिंह एक बेहतरीन कवि भी थे। गुरुजी ने बेअंत वाणी की रचना की। गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु की पदवी को समाप्त करने के लिए गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का गुरु बनाया। गुरु गोबिंद सिंह ने ही संदेश दिया था कि अब कोई भी देहधारी गुरु नहीं होगा और गुरु वाणी व गुरु ग्रंथ साहिब ही सिखों के लिए गुरु सामान्य होगी।

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