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क्यों लोक देवता हैं गणेश, कैसे सार्थक हो गणेशोत्‍सव!

बाल गंगाधर तिलक ने आज से ठीक सौ वर्ष पहले जब महाराष्ट्र में गणेश पूजन का कार्यक्रम शुरू किया तो उनके पीछे आजादी का विराट उद्देश्य था।

क्यों लोक देवता हैं गणेश, कैसे सार्थक हो गणेशोत्‍सव!
महाराष्ट्र में गणेश पूजा धूम-धाम से होती है।(Photo by Pavan Khengre)

डॉ. आर.एन. त्रिपाठी

स्वतंत्रता के 75वें वर्ष यानी अमृत महोत्सव पर फिर गणपति पूजन प्रारंभ हो चुका है। भगवान गणपति और भारत की स्वतंत्रता, दोनों का जो साम्य है इसे इस महोत्सव वर्ष में समझना आवश्यक है। बाल गंगाधर तिलक जैसा विद्वान जो ‘गीता रहस्य’ का रचनाकार है, उन्होंने आज से ठीक सौ वर्ष पहले जब महाराष्ट्र में गणेश पूजन का कार्यक्रम शुरू किया तो उनके पीछे आजादी का विराट उद्देश्य था। यह वही गणपति हैं जो समस्त भारत को एक सूत्र में बांधते हैं, वही गणपति हैं जो ऋग्वेद ब्रह्ममनसूक्त में ‘गणानां त्वं गणपति ग्वं हवामहे’ और जो शुक्ल यजुर्वेद में प्रथमतया बन्दना में ‘गणानांम तव गणपति ग्वं हवामहे, प्रियाणाम त्वं गणपति ग्वं हवामहे’ हैं। यह वही गणपति हैं जो सत्य सनातन उत्तर भारत के संस्कृति में ‘गजाननमं भूतगणादि सेवितं’ हैं। वही गणपति हैं जो बौद्ध धर्म में महायान अनुयायिओं में विघ्नेश के रूप में मिलते हैं, वहीं सुदूर पूर्वोत्तर शाखा में भी उनका रूप विघ्नेश व विघ्नहर्ता रहा है।

वही गणपति हैं जिनकी तंत्र साहित्य में महिमा है। गणेश अथर्वशीर्ष में दक्षिण भारत में पूजे जाते हैं। वही गणपति हैं जिनको प्रत्यक्ष तत्व की साक्षात आत्मा कहकर ब्रह्मा विष्णु रूद्र इंद्र अग्नि वायु सूर्य चंद्रमा ओमकार स्वरूप कहा जाता है। यह वही गणपति हैं जो हमारे उपनिषदों में ‘एकदंताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दंतो प्रचोदयात्’ यानी एकदंत हैं, वक्रतुंड हैं, पाश और अंकुश धारण करते हैं, जिनका कर्ण शूपकर्ण है, पेट लम्बोदर है, लाल वस्त्र पहने हैं, लाल चंदन है, लाल फूल हैं। गणपति को शिवसुत के साथ गजबदन, अर्थात प्रकृति से जुड़ा देवता भी कहा जाता है। शैव धर्मावलंबी इनको वैष्णो की ही तरह मानते हैं और समृद्धि और शासक दोनों का समन्वय जहां करना होता है, व्यापारी से लेकर राजा इन्हें शुभंकर के रूप में मानते हैं।

भगवान गणेश उत्सव -पुरुष हैं। प्रथम पूज्य हैं और सामाजिक गतिविधियों के प्रणेता हैं। प्रकृति से प्रदत्त जब सुपारी का कोई प्रयोग नहीं था तब भगवान गणेश सुपारी के रूप में रखकर पूजे जाने लगे, आदिवासियों द्वारा गोबर गणेश अर्थात सर्व सुलभ हैं। वहीं संपन्न व्यक्तियों द्वारा स्वर्ण रजत ताम्र में भी पूजे जाते रहे हैं। काष्ठ कला तथा खेत की मिट्टी से, गोबर से इनकी मूर्ति बनाना भारत की प्राचीन कला है। ये प्रकृति और पुरुष को साम्य करते हैं, गरीब अमीर सभी को सर्व सुलभ हैं। गणपति भारत के संगठनकर्ता हैं और आप किसी भी पूजा को देखिए कहीं ना कहीं उस पूजा में, चाहे जिस जाति धर्म विशेष से जुड़ी हो, इनकी पूजा अवश्य होती है। गणपति बंगाल में दुर्गा के साथ हैं तो महाराष्ट्र में अकेले तो दक्षिण भारत के समस्त शिव मंदिरों के आगे विराजमान मिलेंगे। संपूर्ण भारत में क्षेत्रवाद, जातिवाद, लिंगभेद, वर्गभेद, वर्ण व्यवस्था से परे अगर कोई देवी-देवता पूजा जाता है तो वह गणपति ही हैं। वे प्रत्येक उपासना के व्रत प्रति और प्रमुखपति हैं। इसीलिए संपूर्ण समाज के सूत्रधार हैं।

उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम में, संस्कृति का सामंजस्य बनाने के लिए गणेश जी ही एकमात्र देवता हैं जो सारी संस्कृतियों के समग्र रूप हैं। चाहे वह शैव हो, चाहे वह वैष्णव हो, चाहे वह बौद्ध हों, चाहे वह जैन हों, सभी में गणेश की पूजा होती है। यहां तक कि इंडोनेशिया आदि देशों में मुस्लिम धर्मावलंबियों द्वारा भी एकमात्र स्वीकार्य देवता गणेश ही हैं । इसलिए इसी बात को ध्यान में रखकर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने शायद लोक देवता का स्मरण किया और स्वतंत्रता प्राप्ति में भारत की समस्त लोक संस्कृतियों में एक्य बनाने के लिए गणेश पूजारूपी स्वतंत्रता दीप जलाया। एक चिंगारी महाराष्ट्र में चिटकायी गई और परिणाम हुआ जाति धर्म के भेदभाव से परे, पूरब से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक, वैदिक-अवैदिक के भेदभाव से हटकर, मिट्टी से लेकर स्वर्ण की प्रतिमाओं के रूप में भगवान गणेश शुभंकर के रूप में गरीब, अमीर हर व्यक्ति के के घर में स्थापित हुए।

संसार भर में अगर आप देखेंगे तो जहां भी स्वतंत्रता, समृद्धि, समरसता की बात आएगी वहां शुभंकर गणेश ही होंगे। शायद हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने संग्राम की शुरुआत के लिए मूल-आराध्य विषय के रूप में इन्हें चुना और परिणाम साक्षात रहा कि आज हम अपना 75वां अमृत महोत्सव वर्ष मना रहे हैं। इसलिए हम सभी लोगों को चाहिए कि गणेश पूजा के जो समता भरे मूल्य थे, उसके साथ समाज की पूजा करें। समाज को समृद्ध बनाएं। किसी भी प्रकार के भेदभाव से ऊपर उठकर गणेश की वंदना करें ताकि मंगलमूर्ति, सर्व विघ्नहरे…अर्थात जो दीन-दलि, छूटे, पिछड़े तमाम अधिकारों व सुविधाओं से वंचित रह गए हैं उन सब के भी विघ्न को हर कर समाज में समरसता का भाव पैदा करें। तभी इस गणेश पूजन का जो मूल उद्देश्य था, वह पूरा हो सकेगा। तभी तिलक का सपना साकार हो पाएगा।

(डॉ. आर.एन. त्रिपाठी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के सदस्य हैं। )

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