Ganesh Visarjan 2021 Muhurat: जानिए किस शुभ मुहूर्त में करें गणेश विसर्जन और क्या है विधि

Ganesh Visarjan Muhurat 2021, Puja Vidhi: अनंत चतुर्दशी के दिन गणेशोत्सव का समापन हो जाता है। इस दिन लोग गणेश भगवान की प्रतिमा को नदी, तालाब, समुद्र या बहते हुए पानी में विसर्जित करते हैं और उनसे घर परिवार की सुख समृद्धि की कामना करते हैं।

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इस दिन लोग गणेश भगवान की प्रतिमा को नदी, तालाब, समुद्र या बहते हुए पानी में विसर्जित करते हैं और उनसे अगले वर्ष जल्द आने की कामना करते हैं।

Ganesh Visarjan 2021 Muhurat, Puja Vidhi, Aarti, Mantra: गणेश चतुर्थी के दिन घर आए बप्पा की विदाई कई लोग अनंत चतुर्दशी (Anant Chaturdashi 2021) के दिन करते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत रूप की उपासना भी की जाती है। अनंत चतुर्दशी के दिन गणेशोत्सव का समापन हो जाता है। इस दिन लोग गणेश भगवान की प्रतिमा को नदी, तालाब, समुद्र या बहते हुए पानी में विसर्जित करते हैं और उनसे अगले वर्ष जल्द आने की कामना करते हैं। कई लोग गणेश प्रतिमा का विसर्जन घर पर ही टब या बाल्टी में करते हैं। जानिए गणेश विसर्जन की पूरी विधि यहां।

सबसे पहले जान लें गणेश विसर्जन का शुभ मुहूर्त:
प्रातः मुहूर्त 07:40 AM से 12:15 PM
अपराह्न मुहूर्त 01:46 AM से 03:18 PM
सायाह्न मुहूर्त 06:21 PM से 10:46 PM
रात्रि मुहूर्त 01:43 AM से 03:12 AM, सितम्बर 20
उषाकाल मुहूर्त 04:40 AM से 06:08 AM, सितम्बर 20
चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ सितम्बर 19 को 05:59 AM बजे
चतुर्दशी तिथि समाप्त सितम्बर 20, 2021 को 05:28 AM बजे

गणेश विसर्जन की विधि:
गणेश विसर्जन करने से पहले गणेश जी की प्रतिमा की विधिवत पूजा करें।
उन्हें मोदक और फल का भोग लगाएं।
फिर गणेश जी की आरती उतारें और उनसे विदा लेने की प्रार्थना करें।
पूजा स्थल से गणेश जी की प्रतिमा को एक लकड़ी के पटरे पर गुलाबी वस्त्र बिछाकर रखें।
गणेश प्रतिमा के साथ फल, फूल, वस्त्र और मोदक की पोटली भी रखें।
एक पोटली में चावल, गेहूं, पंचमेवा और कुछ सिक्के रखें।
विसर्जन से पहले एक बार फिर गणेश जी की आरती उतारें और अपनी मनोकामना कहें।
विसर्जन से पहले श्रीगणेश जी से जाने-अनजाने में हुई अपनी गलतियों की क्षमा मांगे और घर में सदैव सुख-समृद्धि बनी रहने की प्रार्थना करें।
इसके बाद गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन कर दें और साथ में पोटली भी विसर्जित कर दें।

गणेश जी के मंत्र
ॐ गं गणपतये नम:
वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभ। निर्विघ्नं कुरू मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।
ॐ एकदन्ताय विद्धमहे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ति प्रचोदयात्॥

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