Dharm Gatha, Ganesh Puran Katha: आपने भगवान गणेश के सिर कटने की कथा के बारे में तो सुना ही होगा, जिसे स्वयं महादेव ने काटा था। माना जाता है कि भगवान गणेश के मस्तक छिन्न होने के पीछे केवल शनिदेव की दृष्टि थी। लेकिन आपको बता दें कि इसके पीछे महर्षि कश्यप का एक प्राचीन श्राप भी था, जो उन्होंने भगवान शिव को दिया था। गणेश पुराण में दी हुई कथा के अनुसार, सूत जी ने शौनक जी के संदेह का निवारण किया है। शौनक जी का प्रश्न था कि भगवान शिव के पुत्र और स्वयं श्रीकृष्ण के अंश होने के बावजूद गणेश जी का मस्तक शनि की दृष्टि से कैसे छिन्न हो गया? आइए ‘धर्म गाथा’ श्रृंखला में जानते हैं कि महर्षि कश्यप ने शिव जी को क्या श्राप दिया जिसके कारण गणेश जी को अपना मस्तक गंवाना पड़ा था…
जब श्री सूत जी ने शौनक जी से शनि को मिली क्रूर दृष्टि और गणेश जी के सिर का शिव जी के काटने की कथा सुनी, तो उनके मन में एक आशंका उत्पन्न हुई। गणेश पुराण के तृतीय खंड के नवम अध्याय में श्री सूत जी ने शौनक जी को इस कथा के बारे में बताया था, जो स्वयं श्री हरि विष्णु ने नारद जी को सुनाई थी।
शौनक जी ने श्री सूत जी से पूछा कि हे महामुने मुझे एक बात की आशंका है जिसका निवारण आप कर दें। सर्वशक्तिमान गोलोकवासी भगवान् श्रीकृष्ण के अंश भूत एवं सर्व भूतभावन भगवान शंकर द्वारा पार्वती जी के गर्भ से उत्पन्न शिशु को इस प्रकार के विघ्न की प्राप्ति क्यों हुई थी? भला शनि को इस प्रकार की शक्ति कहां से प्राप्त हो गई, जिसके कारण देवाधिदेव भगवान गणेश का ही मस्तक छिन्न हो गया था? कृपया इसका समाधान करें।
शौनक जी का प्रश्न सुनकर सूतजी आनंद विभोर हो गए और भगवान का स्मरण करने के बाद बोले कि शौनक जी तुम धन्य हो जो ऐसे लोकोपकारी प्रश्नों को पूछते हो। मैं भी अपने को धन्य ही मानता हूं जो ऐसे हरिभक्त श्रोता की शंकाओं का हल करने का अवसर मिल रहा है।
स्वयं श्री हरि विष्णु ने नारद जी को सुनाई थी ये कथा
इस प्रश्न का उत्तर में आपको अवश्य दूंगा, क्योंकि यहीं प्रश्न देवर्षि नारद ने श्री नारायण से किया था और नारायण ने जो उत्तर दिया था, वही तुम्हें बताऊंगा।
देवर्षि नारदजी ने श्री हरी विष्णु से पूछा-
“नारायण महाभाग वेदवेदाङ्गपारग ।
पृच्छामि त्वामहं किञ्चिदतिसन्देहमीश्वर ॥
सुतस्य त्रिदशेशस्य शङ्करस्य महात्मनः ।
विघ्नविघ्नस्य यद्विघ्नमीश्वरस्य कथं प्रभो ॥”
अर्थ- हे नारायण, महाभाग, हे वेद वेदांगों के पारगामी प्रभो, हे ईश्वर.. मुझे कुछ संदेह हुआ है, इसलिए आपसे पूछता हूं। हे नाथ भगवान शंकर तो महान हैं, उनके आत्मभूत पुत्र जो स्वयं भी सभी विघ्नों के विघ्न दूर करने में समर्थ हैं, उन परमात्मा को विघ्न की प्राप्ति किस कारण से हुई थी? हे भगवान.. गोलकनाथ तो पर से भी परे, परिपूर्ण परमात्मा हैं तथा पार्वती के यह पुत्र उन्हीं के अंश रूप हैं तो कैसे आश्चर्य का विषय है कि उन परिपूर्ण परमेश्वर का मस्तक भी शनि की दृष्टि मात्र से छिन्न हो गया?
महर्षि कश्यप ने दिया था शिवजी को श्राप
नारद जी के प्रश्न का उत्तर देते हुए श्री हरि विष्णु ने कहा कि ब्रह्मन्। आपने बहुत सुन्दर प्रश्न किया है। आप सावधान होकर अपने प्रश्न का उत्तर सुनो।
यह बहुत प्राचीन काल की बात है कि एक बार भगवान शंकर ने सूर्यदेव को अपने त्रिशूल से मार गिराया, इस कारण समस्त संसार में अंधकार छा गया था। सूर्य के पिता महर्षि कश्यप उनके चेतनाहीन शरीर को गोद में लेकर विलाप करने लगे। उस समय त्रिभुवन में अंधकार के कारण हाहाकार होने लगा, जिससे सब देवता भी अत्यन्त त्रस्त हो गए । महर्षि कश्यप ब्रह्माजी के पौत्र, परम तपस्वी एवं तेज से जाज्वल्यमान थे। उन्होंने अपने पुत्र के संहारकर्ता शिवजी को श्राप दे डाला—
“मत्पुत्रस्य यथा वक्षश्छिन्नं शूलेन तेऽद्य च ।
त्वत्पुत्रस्य शिरश्छिन्नमेवभूतम्भविष्यति ॥”
उन्होंने कहा कि शंकर.. तुमने आज जिस प्रकार से मेरे पुत्र का छाती चीर दी है, उसी प्रकार तुम्हारे पुत्र का भी किसी दिन मस्तक छिन्न हो जायेगा।
कश्यप जी से श्राप से शिव जी को आया क्रोध
जब शिव जी से कश्यप जी से श्राप को सुना, तो उन्हें क्रोध आ गया और वे कश्यप को श्राप देने के लिए उद्यत हुए। तभी ब्रह्मा जी ने बीच में आकर उन्हें शांत करने की कोशिश करते हुए कहा कि हे देवाधिदेव.. आप तो तीनों लोकों के स्वामी और संहारकर्ता हैं। यह समस्त जीव आपकी ही ओर करुण-दृष्टि से देख रहे हैं। इसलिए प्रभु आप क्रोध को त्याग दीजिए और कश्यप से प्रतिशोध मत लीजिए। आपके ऐसा करने से विवाद और भी बढ़ जायेगा। हे दयामय अब शीघ्र ही प्रसन्न होकर अंधकार दूर कीजिए, जिससे कि समस्त प्राणी भय मुक्त हो सकें।
शिव जी से प्रसन्न होकर दिया सूर्य को दिया पुनर्जीवन का वरदान
जब शिव जी से ब्रह्मा जी की स्तुति सुनी, तो वह अति प्रसन्न हो गए और उन्होंने ब्रह्मा जी से कहा कि मैं आपसे प्रसन्न हूं। इसलिए आप जो चाहे वो वरदान मुझसे मांग सकते हैं।
ऐसे में ब्रह्मा जी ने कहा कि मुझे कोई दूसरा वर नहीं चाहिए। बस आपके यहीं यातना है कि आप सूर्य को पुनर्जीवन दें, जिससे संसार में छाया हुआ घोरतम अंधकार दूर हो सके। अगर ऐसा न हुआ, तो त्रिलोकी ही नष्ट हो जायेगी। क्योंकि सूर्य में मुझ ब्रह्मा, विष्णु और आपका भी अंश विद्यमान है। इस प्रकार सूर्य त्रिगुणात्मक हैं और शिव भी त्रिगुणात्मक हैं। जब उन्हें गुणों की प्राप्ति नहीं होगी, तब उनमें प्राण भी कहां रहेंगे?
ऐसे में शिव जी से पुन: सूर्य को पुनर्जीवन दिया। किंतु कश्यप का वह श्राप अमिट रहा, जिसके कारण अंततः गणेश जी को अपना मस्तक गंवाना पड़ा।
डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। जनसत्ता इन कथाओं की ऐतिहासिकता या वैज्ञानिक प्रमाण की पुष्टि नहीं करता है।
