द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा (Dwijapriya Sankashti Chaturthi Vrat Katha): वैदिक पंचांग के अनुसार, फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत 5 फरवरी, गुरुवार को पड़ रहा है। इस दिन भगवान गणेश की विधिवत पूजा करने के साथ-साथ व्रत रखने का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी को व्रत रखने के विघ्नहर्ता गणेश जी की पूजा करें और अंत में व्रत कथा का पाठ अवश्य करें। मान्यता है कि इस व्रत कथा करे बिना उपवास अधूरा होता है। आइए जानते हैं द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत की संपूर्ण व्रत कथा के बारे में…
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, मां पार्वती गणेश जी से पूछती हैं कि हे गणपति! फाल्गुन माह (अमान्त माघ माह) की कृष्ण चतुर्थी को गणेश जी के पूजन का क्या विधान है, इस माह गणेश जी का किस नाम से पूजन होता है तथा आहार में क्या ग्रहण किया जाता है?”
भगवान गणेश कहते हैं – हे माता! फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी को द्विजप्रिय नाम से गणेश जी की पूजा-अर्चना करनी चाहिये। इस दिन खीर में कनेर के पुष्प मिलाकर गुलाबांस की लकड़ी से हवन करना चाहिये। इस दिन आहार में घृत एवं शक्कर का सेवन करना चाहिये। इस चतुर्थी से सम्बन्धित एक कथा का मैं वर्णन करता हूँ। धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा प्रश्न करने पर भगवान कृष्ण ने जो उत्तर दिया था उसका वर्णन मैं करता हूं…
श्री कृष्ण जी ने कहा कि प्राचीन काल में युवनाश्व नामक एक अत्यंत दयालु, उदार, धर्मनिष्ठ एवं प्रजावत्सल राजा राज्य करता था। वह देवताओं और ब्राह्मणों का आदर-सम्मान करने वाला था। उसी राज्य में विष्णुशर्मा नामक एक धर्मज्ञ एवं वेदवेत्ता ब्राह्मण निवास करते थे। उनके सात पुत्र थे, जो सुख-समृद्धि से परिपूर्ण थे। किंतु पारिवारिक कलह के कारण सभी पुत्र अलग-अलग स्थानों पर रहने लगे। विष्णुशर्मा प्रतिदिन क्रम से प्रत्येक पुत्र के घर भोजन करने जाते थे।
समय बीतने के साथ वृद्धावस्था के कारण विष्णुशर्मा अत्यंत दुर्बल हो गए। उनकी बहुएं उनका तिरस्कार करने लगीं, जिससे वे अत्यधिक व्यथित रहने लगे। एक दिन गणेश चतुर्थी का व्रत था और उस दिन वे अपनी ज्येष्ठ पुत्रवधू के घर पहुंचे। उन्होंने उससे कहा, “हे बहुरानी! आज भगवान गणेश का व्रत है। मेरे लिए पूजन सामग्री की व्यवस्था कर दो। गणेश जी की कृपा से तुम्हें धन-सम्पत्ति की प्राप्ति होगी।”
यह सुनकर पुत्रवधू कटु वाणी में बोली कि उसे घर के अनेक कार्य करने हैं और इन सब बातों के लिए उसके पास समय नहीं है। उसने यह भी कहा कि वह न तो गणेश चतुर्थी के व्रत को जानती है और न ही गणेश जी को, तथा विष्णुशर्मा से वहां से चले जाने को कह दिया।
इस प्रकार अपमानित होकर विष्णुशर्मा अपनी अन्य छह बहुओं के घर गए, किंतु सभी ने उनका तिरस्कार किया। अंततः वे अपनी सबसे छोटी बहु के घर पहुंचे। वह अत्यंत निर्धन थी। विष्णुशर्मा ने संकोचपूर्वक उससे कहा कि छहों बहुओं द्वारा अपमानित किए जाने के बाद अब उनके पास कोई और स्थान नहीं बचा है। साथ ही यह भी कहा कि उसके यहां पूजन सामग्री की व्यवस्था संभव नहीं है और वे वृद्धावस्था में यह व्रत कैसे कर पाएंगे।
अपने श्वसुर की पीड़ा सुनकर छोटी बहु ने स्नेहपूर्वक कहा कि उन्हें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। वह उनके साथ मिलकर संकट नाशन गणेश व्रत का पालन करेगी और भगवान गणेश अवश्य कष्टों का निवारण करेंगे। यह कहकर वह भिक्षा मांगने गई और पूजन की सामग्री एकत्र कर लाई। उसने स्वयं और श्वसुर के लिए लड्डू बनाए तथा धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, ताम्बूल, पुष्प और फल आदि से विधिपूर्वक पूजन किया।
पूजन के पश्चात घर में भोजन का अभाव होने पर भी उसने अपने श्वसुर को भोजन कराया और स्वयं उपवास किया। रात्रि के समय विष्णुशर्मा को उदर पीड़ा और अपच हो गया, जिससे वे अशुद्ध हो गए। छोटी बहु ने उनके चरण धोकर उन्हें शुद्ध किया और व्यथित होकर विलाप करने लगी कि उसके कारण श्वसुर को यह कष्ट सहना पड़ा। सहायता के लिए कोई उपाय न सूझने पर वह रात्रि भर जागरण करती रही।
प्रातःकाल जब छोटी बहु जागी तो उसने देखा कि उसका पूरा घर हीरे, मोती, मूंगे और मणियों जैसे बहुमूल्य रत्नों से भरा हुआ है। उन रत्नों के प्रकाश से पूरा घर जगमगा रहा था। उधर विष्णुशर्मा की उदर पीड़ा भी पूर्णतः शांत हो चुकी थी।
आश्चर्यचकित होकर छोटी बहु ने पूछा कि यह अपार धन घर में कहां से आया और कहीं यह कोई षड्यंत्र या स्वप्न तो नहीं। तब विष्णुशर्मा ने कहा कि यह सब उसके भक्तिपूर्वक किए गए गणेश व्रत का फल है। भगवान गणेश उसके व्रत से प्रसन्न होकर उस पर कृपा कर गए हैं।
छोटी बहु ने विनम्रतापूर्वक कहा कि यह सब श्वसुर की श्रद्धा और मार्गदर्शन का परिणाम है, जिससे उसकी दरिद्रता का अंत हुआ। जब अन्य बहुओं को इस संपत्ति की जानकारी मिली तो वे ईर्ष्या और क्रोध से भर गईं और यह सोचने लगीं कि वृद्ध श्वसुर ने अपनी संचित संपत्ति छोटी बहु को दे दी है।
उनकी ईर्ष्या देखकर विष्णुशर्मा ने समझाया कि यह सब गणेश व्रत का पुण्यफल है। उन्होंने बताया कि वे सभी बहुओं के घर यह व्रत कराने गए थे, किंतु सभी ने उनका अपमान किया, जबकि छोटी बहु ने भिक्षा मांगकर पूजन सामग्री जुटाई और श्रद्धा से व्रत किया। उसी से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने उसे कुबेर समान धन प्रदान किया।
तब भगवान गणेश माता पार्वती से कहते हैं कि उस ब्राह्मण के छह पुत्र रोगग्रस्त, निर्धन और दुखी हो गए, जबकि सबसे छोटा पुत्र इन्द्र के समान वैभवशाली हो गया। बाद में जब सभी भाइयों ने फाल्गुन कृष्ण गणेश चतुर्थी का व्रत किया, तो व्रत के प्रभाव से वे सभी धनवान बन गए। इसी प्रकार जो भी भक्त श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करता है, उसके जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन अवश्य होता है।
डिस्क्लेमर: यह कथा धार्मिक मान्यताओं और लोक कथाओं पर आधारित है। इसकी आध्यात्मिक फलश्रुति व्यक्तिगत आस्था का विषय है।
