Dwijapriya Sankashti Chaturthi 2026: हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी का विशेष महत्व है। साल में कुल 24 गणेश चतुर्थी पड़ती है और हर एक चतुर्थी का अपना-अपना महत्व है। ऐसे ही फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को पड़ने वाली गणेश चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन भगवान गणेश की विधिवत पूजा करने के साथ-साथ व्रत रखने का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा करने के साथ सुख-समृद्धि, मान-सम्मान और संतान सुख की प्राप्ति हो सकती है। इस साल द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत 5 फरवरी, गुरुवार को रखा जा रहा है। आइए जानते हैं द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का शुभ मुहूर्त, गणेश पूजा विधि, चंद्रोदय का समय समेत अन्य जानकारी….
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 (Dwijapriya Sankashti Chaturthi 2026 Date)
द्रिक पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 5 फरवरी को 12:09 ए एम से शुरू हो रही है, जो 6 फरवरी दिन शुक्रवार को 12:22 ए एम पर समाप्त होगी। ऐसे में उदया तिथि के हिसाब से द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत 5 फरवरी, गुरुवार को रखा जाएगा।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी शुभ मुहूर्त 2026(Dwijapriya Sankashti Chaturthi 2026 Shubh Muhurat)
शुभ-उत्तम मुहूर्त- 07:07 ए एम से 08:29 ए एम
लाभ-उन्नति मुहूर्त- दोपहर 12:35 पी एम से 01:57 पी एम तक
ब्रह्म मुहूर्त- 05:22 ए एम से 06:15 ए एम तक
अभिजीत मुहूर्त- दोपहर में 12:13 पी एम से 12:57 पी ए
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर चंद्रोदय का समय
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर चंद्रमा को अर्घ्य देने के साथ व्रत पूर्ण होता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, इस दिन रात 09:35 पी एम पर चंद्रोदय होगा। शहर के हिसाब से चंद्रोदय के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है। ऐसे में आप पंचांग देख सकते हैं।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत पूजा विधि (Dwijapriya Sankashti Chaturthi 2026 Puja Vidhi)
- संकष्टी चतुर्थी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। फिर हाथ में चावल और पुष्प लेकर व्रत का संकल्प करें तथा भगवान गणेश के चरणों में संकल्प चावल और फूल अर्पित करें।
- जिस स्थान पर पूजा संपन्न करनी है, उसे गंगाजल से शुद्ध करें। वहां एक चौकी स्थापित करें और उस पर पीले रंग का वस्त्र बिछाकर कलावा बांध दें।
- इसके पश्चात चौकी पर स्वस्तिक का चिन्ह बनाएं और भगवान गणेश की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करें।
- अब गणेश जी को फूल, माला, दूर्वा, वस्त्र आदि अर्पित करें।
- सिंदूर, अक्षत लगाने के बाद भोग लगाएं और घी का दीपक जला लें। इसके बाद व्रत कथा, गणेश चालीसा, गणेश स्तुति एवं मंत्रों का पाठ कर लें।
- अंत में भगवान गणेश की आरती करें। भूलचुक के लिए माफी मांग लें।
- शाम को चंद्रोदय से पहले गणेश जी की पुन: पूजा कर लें।
- चंद्रोदय के बाद चंद्रदेव को जल, दूध, फूल आदि से अर्घ्य देने के साथ भोग, दीपक आदि जलाएं।
गणेश भगवान की आरती (Ganesh Ji Ki Aarti)
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा,
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।
एकदंत, दयावन्त, चार भुजाधारी,
माथे सिन्दूर सोहे, मूस की सवारी।
पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा,
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा।। ..
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश, देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।
अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया,
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया।
‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ..
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।
दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो जय बलिहारी।
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
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डिसक्लेमर- यह लेख पूरी तरह से ज्योतिषीय गणनाओं और मान्यताओं पर आधारित है। जनसत्ता इसकी सत्यता या इससे होने वाले किसी भी लाभ-हानि की पुष्टि नहीं करता है। अधिक जानकारी के लिए पंचांग, शास्त्र या फिर किसी पंडित से अवश्य जानकारी लें।
