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Dussehra 2019: कानपुर में आज खुलेगा दशानन मंदिर, रावण वध से पहले हो जाएगा बंद

Dussehra (Vijayadashami) 2019: मंदिर के पुजारी के मुताबिक, शिवाला मंदिर भगवान शिव का पावन धाम है। शिव की आराधना सबसे बड़े भक्त के बिना अधूरी है। इसी वजह से उन्नाव जिले के रहने वाले गुरुप्रसाद शुक्ल ने 1868 में दशानन मंदिर बनवाया था।

Author कानपुर | Updated: October 8, 2019 8:41 AM
फोटो सोर्स- स्थानिय

Dussehra 2019: दुनिया में रावण से बड़ा प्रकांड ज्ञानी और भगवान शंकर का भक्त किसी और को नहीं माना जाता। कहा जाता है कि रावण जब भगवान शिव की आराधना करता था तो कमल के फूलों की तरह अपने सिर उनके चरणों पर चढ़ा देता था। उसकी भक्ति देखकर भगवान शिव भी हैरान रह जाते थे। बताया जाता है कि रावण का जन्म जिस दिन हुआ, उसी दिन उसका वध भी हुआ था। यही वजह है कि कानपुर में बना दशानन मंदिर सिर्फ विजयदशमी के दिन खुलता है और रावण दहन से पहले ही मंदिर के पट बंद हो जाते हैं।

साल में एक बार खुलता है दशानन मंदिर: शिवाला में बना दशानन मंदिर साल में सिर्फ एक बार विजयदशमी के दिन खुलता है। रावण की मूर्ति को दूध और जल से नहलाया जाता है। पूरे मंदिर परिसर को तरह-तरह के फूलों से सजाकर भव्य तरीके से पूजा की जाती है। मंदिर में दशानन के दर्शन को आने वाले श्रद्धालु सरसों के तेल के दिए जलाते हैं। वहीं, रावण दहन से पहले मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं।

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1868 में बना था दशानन मंदिर: मंदिर के पुजारी के मुताबिक, शिवाला मंदिर भगवान शिव का पावन धाम है। शिव की आराधना सबसे बड़े भक्त के बिना अधूरी है। इसी वजह से उन्नाव जिले के रहने वाले गुरुप्रसाद शुक्ल ने 1868 में दशानन मंदिर बनवाया था। पुजारी बताते हैं कि इस मंदिर के पट जब खुलते हैं तो एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। बल, बुद्धि और विवेक मिलता है, क्योंकि रावण प्रकांड ज्ञानी था।

इस वजह से साल में एक बार खुलता है मंदिर: पुजारी बताते हैं कि प्रकांड पंडित रावण का जन्म विजय शुक्ल दशमी को हुआ था। उसकी मृत्यु भी विजय शुक्ल दशमी को हुई थी। यही वजह है कि दशहरे के दिन दशानन मंदिर के पट खोलकर हम लोग सुबह रावण का जन्मोत्सव मनाते हैं। वहीं, सूर्यास्त और रावण दहन से पहले ही मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं।

त्रिकालदर्शी था रावण: पुजारी ने बताया कि पैराणिक कथाओं के मुताबिक, रावण ने कोई गुनाह नहीं किया। वह जनकपुरी में धनुष तोड़ने गया, लेकिन उसने धनुष नहीं उठाया। जो कैलाश पर्वत उठा सकता था, उसके लिए धनुष बड़ी बात नहीं थी। जब सीता हरण किया तो रावण को पता था कि प्रभु राम ने सीता को अग्नि में प्रवेश करा दिया है। रावण ने सीता को ऐसी जगह रखा, जहां शोक दूर होता है, जिसे कहते हैं अशोक वाटिका। वहीं, माता सीता की जिम्मेदारी ऐसी महिला को दी, जो 24 घंटे राम के नाम का जप करती थी।

लक्ष्मण ने भी रावण से ली थी शिक्षा: रावण सोचता था कि यदि मुझे पहले मोक्ष मिल गया तो संसार के बाकी राक्षस आतंक मचा देंगे। रावण ने एक-एक करके सभी राक्षसों को मोक्ष दिलाया। अंत में पाताल का एक राक्षस बच गया था, जिसका नाम था अहिरावण। उसे भी प्रभु राम के हाथों मोक्ष दिलाने का काम किया। भगवान राम ने रावण का क्रियाकर्म तक किया। इसके बाद हवन करके दोषमुक्त हुए। जब रावण अंतिम सांस ले रहा तो भगवान राम ने लक्ष्मण से कहा था कि रावण से कुछ ज्ञान ले लो। यह प्रकांड ज्ञाता है, जिसने त्रिकालदर्शी होने की वजह से यह चक्रव्यूह रचा।

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