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बिहार: राजगीर में नहीं लगेगा मलमास मेला, सरकार बोली- कोरोना गाइडलाइंस पालन कराना होगा मुश्‍किल

नालंदा के जिलाधीश ने इस बाबत पत्र जारी कर कहा है कि राज्य में कोरोना के प्रकोप की गंभीर हालत है। मेले में सुरक्षित दूरी का पालन नहीं हो सकता है। संक्रमण फैलने के खतरा बहुत बढ़ सकता था।

प्रशासन के मुताबिक मेले में सुरक्षित दूरी का पालन नहीं हो सकता है। संक्रमण फैलने का खतरा बहुत बढ़ सकता था। इसी वजह से मेला रद्द किया गया।

बिहार में चुनाव की तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं। मतदाता जागरुकता के लिए ज़िलों के डीएम झंडी दिखा रैलियां रवाना कर रहे हैं। मतदानकर्मियों को प्रशिक्षण कार्यक्रम दिया जा रहा है। मगर 18 सितंबर से राजगीर में लगने वाले मलमास मेले को कोविड-19 का मुलम्मा दे रद्द कर दिया गया है। नालंदा के जिलाधीश ने इस बाबत पत्र जारी कर कहा है कि राज्य में कोरोना के प्रकोप की गंभीर हालत है। मेले में सुरक्षित दूरी का पालन नहीं हो सकता है। संक्रमण फैलने का खतरा बहुत बढ़ सकता था। इसी वजह से इस बार मलमास मेले का आयोजन नहीं होगा। राज्य सरकार ने यह फैसला लिया है।

गौरतलब है कि बिहार में कोरोना की चपेट में आने वालों का आंकड़ा डेढ़ लाख पार कर चुका है। लाकडाउन भी 6 सितंबर से खत्म है। अनलॉक-4 के नियमों का पालन शुरू हो गया है। मंदिरों के पट खुल चुके हैं। बाकी जिंदगी भी सामान्य होने लगी है। राज्य में बाजार और दुकानें आम दिनों की तरह खुल रही हैं। कहीं कोई शारीरिक दूरी का पालन नहीं हो रहा। नेता चुनाव के लिए वर्चुअल रैलियां कर रहे है। झारखंड के गोड्डा से भाजपा सांसद निशिकांत दुबे तीन रोज के भागलपुर दौरे पर बुधवार 9 सितंबर को पहुंच पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें कर रहे हैं। पर सरकार को राजगीर के धार्मिक मेले के आयोजन पर आपत्ति है।

यह मेला दुनिया में महशूर है और चार साल में एक बार एक माह यह मेला राजगीर में लगता है। मलमास मेला धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जाता है। इसकी अर्ध कुंभ की तरह ही शास्त्र में अहमियत बताई गई है। नालंदा जिला का राजगीर पर्यटन के लिए बिहार में ही नहीं दुनिया भर में मशहूर है। हर साल लाखों की संख्या में पर्यटक जापान, श्रीलंका, चीन, थाइलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया और नेपाल जैसे देशों से आते हैं। राजगीर पर्यटकों के लिए रमणीय स्थल तो है ही, साथ ही इसकी अपनी धार्मिक महत्ता भी है।

मान्यता है कि मलमास मेले के दौरान हिन्दू धर्म के तमाम 33 करोड़ देवी-देवता यहां निवास करते हैं। दुनिया में एकमात्र यह जगह है जहां मलमास मेला लगता है। मगर अबकी यह आयोजन नहीं होने से यहां चहल-पहल और रौनक फीकी पड़ गई है। दुकानदार फाकाकशी में आ गए हैं। चाय बेचने वाले रामकुमार कहते हैं कि सब कुछ खत्म हो गया। आमदनी धेला नहीं है। चार साल में लगने वाले मेले और पर्यटकों पर लोग आश्रित हैं। मगर सब बंद है। दो जून की रोटी के लाले पड़े हैं।

लेकिन ये मलमास मेला है क्या ? कब और और क्यों लगता है ? इसकी महत्ता क्या है? जैसे सवाल जनमानस के मन मस्तिष्क में घुमता रहता है। इसको जानना जरूरी है।

क्या है मलमास?: लोग इसे अधिक मास या पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं। ज्योतिषों की गणना के मुताबिक हर तीन साल के बाद एक माह बढ़ जाता है। हिंदू धर्म में तारीखों की गणना दो विधि से की जाती है। प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है, जो हर तीन वर्ष में लगभग 1 मास के बराबर हो जाता है। इसी एक अतिरिक्त महीने को अधिकमास यानि मलमास का नाम दिया गया है। इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। अंग्रेजी में यही लीप ईयर है।

मलमास क्यों कहा जाता है: इस एक महीने के मलमास में शुभ कार्य वर्जित होते हैं। जैसे शादी-विवाह और गृहप्रवेश आदि की मनाही होती है। मान्यता के मुताबिक इसे शुरुआत में मलिन माह कहा जाता था जिसे बाद में मलमास कहा जाने लगा।

पुरुषोत्तम मास क्यों कहते हैं: धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक कहा जाता है कि जब ऋषि मुनियों ने समय की गणना की और एक महीना अतिरिक्त निकला। तब ऐसे में सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष में संतुलन बैठाना मुश्किल हो रहा था। ऋषियों ने देवताओं से इस एक महीने का स्वामी बनने का आग्रह किया तो कोई भी देवता इसका स्वामी बनने को तैयार नहीं हुए। जिसके बाद ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से इस अधिक मास का भार अपने ऊपर लेने का आग्रह किया। तब भगवान विष्णु ने इसे स्वीकार कर लिया और तभी से इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाने लगा।

राजगीर में 22 कुंडों और 52 जलधाराओं की उत्पत्ति की कहानी: वायु पुराण के मुताबिक भगवान ब्रह्मा के पौत्र राजा बसु ने इसी मलमास महीने के दौरान राजगीर में ‘वाजपेयी यज्ञ’ करवाया था। जिसमें सभी 33 करोड़ देवी देवाओं को आने का न्योता दिया। इस दौरान काग महाराज को छोड़कर बाकी सभी देवी देवता वहां पधारे। यज्ञ में पवित्र नदियों और तीर्थों के जल की जरूरत पड़ी। इस दौरान देवी-देवताओं को एक ही कुंड में स्नान करने में परेशानी होने लगी। तब ब्रह्मा जी ने राजगीर में 22 अग्निकुंडों के साथ 52 जल धाराओं का निर्माण कराया।

बह्मा जी ने जिन 22 कुंडों का निर्माण कराया वे हैं- ब्रह्मकुंड, सप्तधारा, व्यास, अनंत, मार्केण्डेय, गंगा-यमुना, काशी, सूर्य, चन्द्रमा, सीता, राम-लक्ष्मण, गणेश, अहिल्या, नानक, मखदुम, सरस्वती, अग्निधारा, गोदावरी, वैतरणी, दुखहरनी, भरत और शालीग्राम कुंड। जिसमें ब्रह्मकुंड का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस रहता है। यह गर्म पानी का कुंड है। बताया जाता है कि यहां सप्तकर्णी गुफाओं से पानी आता है। यहां वैभारगिरी पर्वत पर भेलवाडोव तालाब है, इससे ही जल पर्वत से होते हुए यहां पहुंचता है। इस पर्वत में कई तरह के केमिकल्स जैसे सोडियम, गंधक, सल्फर हैं। इसकी वजह से पानी गर्म रहता है।

दिलचस्प बात यह है कि मलमास मेला के दौरान राजगीर में काग दिखाई नहीं देते। वायु पुराण के मुताबिक वाजपेयी यज्ञ में काग महाराज को छोड़कर बाकी सभी देवी देवता इसमें शरीक हुए थे। क्योंकि राजा बसु भूलवश काग महाराज को न्योता देना भूल गए थे। इसके कारण महायज्ञ में काग महाराज शामिल नहीं हुए। उसके बाद से मलमास मेले के दौरान राजगीर के आसपास काग कहीं दिखायी नहीं देते हैं।

राजगीर में मेला शुरू होने के एक महीने पहले ही तैयारियों को लेकर चहल-पहल होने लगती थी। जो इस बार बिल्कुल फीकी है।

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