धर्म सम्मत कार्य करें, प्रतिफल की चिंता न करें

जीवन भर हमारी यही कोशिश रहती है कि लोग हमसे प्रेम करें।

भगवान शंकर।

राधिका नागरथ

जीवन भर हमारी यही कोशिश रहती है कि लोग हमसे प्रेम करें। इसी चाह में जीवन गुजर जाता है। यानी हम जिनसे प्रेम करते हैं वे भी हमें उतना ही प्रेम अभिव्यक्त करें। अपने करीबी जब विश्वास तोड़ते हैं तो हम खुद को बिखरा हुआ महसूस करते हैं। शास्त्र बताते हैं कि कभी प्रभु को मौका दो कि वह हमें प्रेम करें। कभी उसे हमारे द्वारा अभिव्यक्त होने का मौका दें तो जीवन सहज एवं सार्थक हो जाता है।

क्योंकि हम हर वक्त आधे मन से उसको ध्याते हैं और आधा वक्त हमारा संसार में सांसारिक प्रेम की आशा में उलझा रहता है जो कभी पूरी नहीं होता, इसलिए हमने कभी प्रभु को मौका ही नहीं दिया कि वह हमसे प्रेम करें। कभी अपने विचार और प्रेम को अंतर्मुखी करके देखें तो हम पाएंगे उस निरंतर बहते प्रेम के झरने को, उस अपने प्राणों से प्यारे प्रीतम को, जो सदा हमारे भीतर आस लगाए बैठा है कि हम कब उसको पुकारें।

जब प्रभु के प्रति प्रेम भक्तों में उमड़ता है तो उसकी आंखों का नूर अलग ही दिखाई देने लगता है। उस उमड़ते सरस प्रेम को कोई भी महसूस कर पाएगा। सबसे पहला चिन्ह कि प्रभु प्रेम हुआ है, वह यह है कि उस व्यक्ति को कोई भी काम बोझिल नहीं लगता। उस व्यक्ति की कृतियों में निखार आ जाता है और वह जो भी कार्य करता है खूब मन लगाकर, क्योंकि वह ईश्वर, उसका अपना प्रभु, उसका इष्ट सदा उसकी चेतना में बसता है। कर्म योगी की एक ही इच्छा रह जाती है कि वह कैसे अपने प्रभु को प्रसन्न रखे।

धर्म सम्मत कार्य करते हुए वह उसके प्रतिफल की ओर चिंतित नहीं होता, बस केवल कर्म करने के लिए ही कर्म करता है क्योंकि उस कारण से उसको आनंद की प्राप्ति होती है कि वह उसने अपने प्रभु के साक्ष्य में किया है। इंसान जीवन में अगर प्रेम ना करें तो उसका काम नहीं चलता। स्वामी विवेकानंद कहते थे कि प्रेम ही वह शक्ति है जिसने इस पूरे संसार को चलायमान रखा है और अपने जीवन में उस प्रेम की पराकाष्ठा को अनुभव करना वही जानता है जिसने उस प्रेम के स्रोत को छुआ है, जो हमारा, हम सबका अधिष्ठाता है। ऐसा प्रभु प्रेमी संसार में बिरला ही होता है और वह जहां भी बैठता है अपनी सुगंध बिखेरता ही है। वह मैं और मेरे से कहीं ऊपर उठकर, तू ही तू।

जब विशुद्ध प्रेम होता है तो दो रह ही नहीं जाते। कबीर ने क्या सुंदर दोहे में लिखा है- प्रेम गली अति सांकरी जाने दो ना समाए। प्रेम हमें एकाकार हुए चैतन्य महाप्रभु, प्रेम में एकाकार हुईं मीरा, ऐसे भक्त तो जीवन मुक्त हो जाते हैं। आज भी अगर ऐसी भक्ति का रसपान करना हो तो वृंदावन की कुंज गलियों में खुद को भुला कर अपने इष्ट श्री कृष्ण का भजन करते लोग मिल जाते हैं। ठीक ही लिखा है कबीर ने- जा घट प्रेम न संचरै सो घट जान मसान। जिस दिल में प्रभु की याद, वह तो श्मशान के बराबर है. बस एक बार लगन लगा के देखना है फिर हर पल एक उत्सव होगा। हर क्षण कर्म योग, पूरा जीवन एक प्रेम युक्त जीवन, बंधन मुक्त जीवन।

सांसारिक प्रेम तो बंधन का कारण बनता है किंतु ऐसा भगवत प्रेम सदा मुक्त रहता है और आनंद की अनुभूति कराता है। प्रेम की पराकाष्ठा उस गोपी प्रेम से आंकी जा सकती है जिस के वशीभूत होकर उन्होंने उद्धव को कहा था कि उधो मन न भए दस बीस, एक हूं जो गयो श्याम संग, को आराधे ईश। जब हम उस एक प्रभु को अपना पूर्ण सर्वस्व देते हैं तो प्रभु खुद हमारे भीतर से झांकने लगते हैं। हमारा व्यवहार, हमारी वाणी, हमारा स्वभाव देवी गुणों को परिलक्षित करने लगता है। यही कारण है कि भक्तों की संगति में सदा आनंद होता है। एक अलग सी ऊर्जा मिलती हैं जहां उस दिव्य राह के राही एकत्रित होते हैं, इसलिए एक मौका इस मनुष्य जीवन में उस सर्वे सर्वा को जरूर दें कि वह हमें अपनी अभिव्यक्ति के लिए चुने।

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