Dhundiraj Chaturthi Vrat Katha in Hindi: हिंदू धर्म में भगवान गणेश जी को विघ्नों को दूर करने वाला देव माना जाता है और उनके अनेक स्वरूपों की पूजा की जाती है। इन्हीं में से एक स्वरूप ढुण्ढिराज है, जिनकी विशेष आराधना फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी, यानी ढुण्ढिराज चतुर्थी के दिन की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से गणेश जी की पूजा और व्रत करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही स्वास्थ्य, धन और पारिवारिक जीवन में भी सकारात्मकता बनी रहती है। वैदिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष ढुण्ढिराज चतुर्थी का व्रत कल यानी 21 फरवरी 2026, शनिवार को रखा जाएगा। इस दिन भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करने के साथ-साथ व्रत कथा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं ढुण्ढिराज चतुर्थी व्रत की पौराणिक कथा और पूजा के शुभ मुहूर्त के बारे में।
ढुण्ढिराज चतुर्थी की पूजा का शुभ मुहूर्त ( Dhundiraj Chaturthi 2026 Shubh Muhurat)
ज्योतिषियों के अनुसार, इस बार ढुण्ढिराज चतुर्थी के दिन शुभ, शुक्ल और रवि योग का शुभ संयोग का निर्माण हो रहा है। बता दें कि शुक्ल योग का संयोग रात भर है। वहीं, रवि योग शाम 07 बजकर 07 मिनट तक है। इन योग में भगवान गणेश की पूजा करने से सभी मनोरथ सिद्ध होने की मान्यता है।
- ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 05 बजकर 13 मिनट से 06 बजकर 04 मिनट तक
- विजय मुहूर्त – दोपहर 02 बजकर 28 मिनट से 03 बजकर 14 मिनट तक
- गोधूलि मुहूर्त – शाम 06 बजकर 13 मिनट से 06 बजकर 38 मिनट तक
- निशिता मुहूर्त – रात 12 बजकर 09 मिनट से 01 बजे तक
ढुण्ढिराज चतुर्थी की पौराणिक कथा ( Dhundiraj Chaturthi Vrat Katha in Hindi)
पुराणों के अनुसार, प्राचीन काल में भगवान शिव जी ने काशी को अपना निवास बनाने का विचार किया। उस समय राजा दिवोदास अपने धर्मप्रिय और दयालु शासन के लिए प्रसिद्ध थे, जिनके राज्य में सब कुछ पूर्ण और संपन्न था। ब्रह्मा जी से प्राप्त वरदान के कारण, जब तक राजा दिवोदास के राज्य में सब कुछ सही रहता, कोई भी देवता वहां प्रवेश नहीं कर सकता था। भगवान शिव को काशी बहुत पसंद आई, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र गणेश जी को वहां भेजा ताकि वह राज्य और वहां की परिस्थितियों का निरीक्षण कर सकें। काशी जाने से पहले गणेश जी ने ज्योतिषी का रूप धारण किया और खुद का नाम ‘ढुण्ढि’ रखा। जल्दी ही उनकी बुद्धिमत्ता और चतुराई की वजह से काशीवासियों में चर्चा होने लगी। इस प्रभाव से राजा दिवोदास के शासन में थोड़ी कमी आने लगी, जिससे भगवान शिव को काशी में प्रवेश मिल गया। उन्होंने गणेश जी को ‘ढुण्ढिराज’ नाम दिया और कहा कि जो भी भक्त काशी आएगा, उसकी यात्रा ढुण्ढिराज गणेश की पूजा के बिना पूरी नहीं मानी जाएगी। कहा जाता है कि जिस दिन भगवान शिव ने गणेश जी को यह नाम दिया, वह फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी थी। तभी से ढुण्ढिराज चतुर्थी मनाने की परंपरा शुरू हुई।
ढुण्ढिराज चतुर्थी व्रत का धार्मिक महत्व (Dhundiraj Chaturthi Vrat Significance)
ढुण्ढिराज चतुर्थी भगवान गणेश जी के विशेष स्वरूप की पूजा का दिन है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से जीवन में आने वाली परेशानियां और विघ्न दूर होते हैं और परिवार में खुशहाली, स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। इस दिन की पूजा से गृहस्थ जीवन और किसी भी शुभ कार्य में सफलता मिलने की मान्यता है। धार्मिक मान्यता है कि जो भी भक्त ढुण्ढिराज चतुर्थी व्रत विधिपूर्वक करता है, उसे भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होता है।
ढुण्ढिराज चतुर्थी व्रत पर क्या करें क्या न करें (Dhundiraj Chaturthi Vrat Niyam)
- व्रत के दिन सुबह नहाएं और साफ-सुथरा रहें।
- इस दिन निर्जल व्रत या अपने अनुसार फलाहार व्रत रखें।
- गणेश जी के मंत्रों का जप करें और भजन सुनें।
- इस दिन जरूरतमंदों को दान देना शुभ माना जाता है।
- इस दिन अशुभ कार्यों से बचें, जैसे – झगड़ा, गुस्सा, किसी से मन-मुटाव न करें।
- व्रत के दौरान भोग या भोजन का गलत समय पर सेवन न करें।
- इस दिन पूजा स्थल साफ और पवित्र रखें।
- ढुण्ढिराज चतुर्थी व्रत पर अशुद्ध विचारों से दूर रहें। पूरे दिन केवल सकारात्मक और शुभ विचार रखें।
ढुण्ढिराज चतुर्थी व्रत पर करें इन मंत्रों का जाप (Dhundiraj Chaturthi Vrat Mantra)
- ॐ गं गणपतये नमः
- ॐ एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो गणेश प्रचोदयात्
- ॐ श्री ढुण्ढिराजाय नमः
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