Dharma Gatha, Mahabharat Katha: महाभारत की कथाएं केवल युद्ध और वीरता का वर्णन नहीं करतीं, बल्कि उनमें छिपे हैं त्याग, प्रतिशोध और भाग्य के गहरे रहस्य। ऐसी ही एक महत्वपूर्ण कथा काशी की राजकुमारी अंबा की है, जो अपमान और अस्वीकृति के बाद कठोर तपस्या करके अगले जन्म में शिखंडी के रूप में जन्म लेती है। अंत में भगवान शिव के वरदान से पुरुष बनकर शिखंडी ने कुरुक्षेत्र युद्ध में भीष्म पितामह के पतन का कारण बनकर अपना प्रतिशोध पूरा किया। जानें आज ‘धर्म गाथा’ श्रृंखला में कैसे और क्यों राजकुमारी अंबा बनी शिखंडी और कैसे लिया भीष्म से प्रतिशोध..

महाभारत ग्रंथ के आदि पर्व में काशी की राजकुमारी अंबा के स्वयंवर से भीष्म के द्वारा हरण से लेकर उनके पुन:शिखंडी के रूप में पुनर्जन्म लेने की कथा विस्तार से बताई गई है। माता सत्यवती चेदिराज वसु की पुत्री है और निषादराज ने इसका पालन-पोषण किया है। यह जानकर राजा शान्तनु ने उसके साथ शास्त्रीय विधि से विवाह किया। इसके बाद उन्होंने सत्यवती को अपने महल में रखा। कुछ काल के बाद सत्यवती के गर्भ से दो पुत्रों को जन्म दिया था, जो चित्रांगद और विचित्रवीर्य थे। विचित्रवीर्य के बचपन में ही उनके पिता  महाराजा शांतनु की मृत्यु हो गयी। शांतनु के स्‍वर्गवासी हो जाने पर भीष्म ने सत्‍यवती की सम्मत्ति से शत्रुओं का दमन करने वाले वीर चित्रांगद को राज्‍य पर बिठाया।

चित्रांगद अपने शौर्य के घमंड में आकर सब राजाओं का तिरस्कार करने लगे। वह किसी भी व्यक्ति को अपने समान नहीं मानते हैं। तब एक दिन उन्हीं के समान नाम वाला महाबली गन्धर्वराज चित्रांगद उनके पास आया और दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ। अंत में नरश्रेष्ठ चित्रांगद को मारकर युद्ध समाप्त करके वह गन्धर्व स्वर्गलोक में चला गया। इसके बाद पितामह भीष्म के कहने पर विचित्रवीर्य को सिंहासन में बैठाया गया, जो अभी बालक थे।

भीष्म के द्वारा स्वयंवर से काशीराज की कन्याओं का हरण

जब विचित्रवीर्य धीरे-धीरे युवावस्था में पहुंचे, तो वह बुद्धिमानों में श्रेष्ठ भीष्‍म जी ने उनकी वह अवस्था देख विचित्रवीर्य के विवाह पर विचार किया। उन दिनों काशीराज की तीन कन्याएं थीं, जो अप्सराओं के समान सुन्दर थीं। जब पितामह भीष्म जी ने सुना कि वे तीनों कन्‍याएं एक साथ ही स्वयंवर सभा में पति का वरण करने वाली हैं। तब माता सत्यवती की आज्ञा से भीष्म एक रथ के साथ काशी पहुंच गए।

वहां भीष्म ने देखा कि स्वयंवर सभा में हर जगह से आए राजा एकत्रित और नके नाम लेकर उनका परिचय कन्याओं से कराया जा रहा है। इतने में ही जब वृद्ध भीष्‍म सभा में पहुंचे, तो कन्याएं उन्हें देखकर वहां से चली गई और सभा में मौजूद कुछ नीच स्वभाव के राजा आपस में बात कर उनकी हंसी उड़ाने लगे। वह कह रहे थे कि भरतवंशियों में श्रेष्ठ भीष्‍म तो बड़े धर्मात्मा सुने जाते थे। ये बूढ़े हो गये हैं, शरीर में झुर्रियां पड़ गयी हैं, सिर के बाल सफेद हो चुके हैं। फि‍र क्‍या कारण है कि यहां आये हैं? ये तो बड़े निर्लज्ज जान पड़ते हैं। अपनी प्रतिज्ञा झूठी करके ये लोगों में क्‍या कहेंगे- कैसे मुंह दिखाएंगे? भूमण्डल में व्यर्थ ही यह बात फैल गयी कि भीष्‍म जी ब्रह्मचारी हैं।

सभी की इस तरह से बातों को सुनकर भीष्म अत्‍यन्‍त क्रोधित हो उठे और उन्होंने उस समय स्वयं ही समस्त कन्‍याओं का वरण किया। इतना ही नहीं, प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ भीष्‍म ने उन कन्‍याओं को उठाकर रथ पर चढ़ा लिया और समस्‍त राजाओं को ललकारते हुए कहा कि आठ प्रकार के विवाह का वर्णन किया। इसके साथ ही सभी को युद्ध करने के लिए ललकारा। फि‍र तो समस्‍त राजा इस अपमान को न सह सके और सभी के बीच भीषण युद्ध हुआ।

सम्पूर्ण शस्त्रधारियों से युद्ध जीतकर भीष्म ने कन्याओं को साथ ले भरतवंशियों की राजधानी हस्तिनापुर को प्रस्थान किया। राजन्! तब महारथी शाल्वराज ने पीछे से आकर युद्ध के लिए शांतनु नन्दन भीष्म पर आक्रमण किया। इसके बाद भीष्म और शाल्व के बीच भीषण युद्ध हुआ अंत में राजा शाल्व हार गए।

भीष्म ने विचित्रवीर्य को सौंपा कन्याओं का हाथ

युद्ध में भीष्म का पराक्रम अवर्णनीय था। उन्‍होंने स्वयं अक्षत रहकर शत्रुओं को ही क्षति पहुंचाई थी। धर्मात्मा गंगा नन्दन भीष्‍म काशिराज की कन्‍याओं को पुत्रवधू, छोटी बहन एवं पुत्री की भांति साथ रखकर कुरु देश में ले आए और सर्व सद्गुण संपन्न कन्याओं को अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य के हाथ में दिया। इसके साथ ही विवाह की तैयारी करने लगे। काशीराज की उन कन्याओं में जो सबसे बड़ी थी, जो वह बड़ी सती-साध्‍वी थी। उसने जब सुना कि भीष्‍म जी मेरा विवाह अपने छोटे भाई के साथ करेंगे, तब वह उनसे इस प्रकार बोली-

धर्मात्मा! मैंने पहले से ही मन-ही-मन सौम नामक विमान के अधिपति राजा शाल्‍व को पति रूप में वरण कर लिया था। उन्होंने भी पूर्वकाल में मेरा वरण किया था। मेरे पिता जी की भी यही इच्‍छा थी कि मेरा विवाह शाल्व के साथ हो। उस स्वयंवर में मुझे राजा शाल्व का ही वरण करना था। धर्मज्ञ! इन सब बातों को सोच-समझकर जो धर्म का सार प्रतीत हो, वही कार्य कीजिए।

अंबा ने किया विचित्रवीर्य से विवाह करने से इनकार

जब उस कन्या ने ब्राह्मण मंडली के बीच वीरवर भीष्‍म जी से इस प्रकार कहा, तब वे उस वैवाहिक कर्म के विषय में युक्तियुक्त विचार करने लगे। वे स्वयं भी धर्म के ज्ञाता थे, फिर वेदों के पारंगत विद्वान् ब्राह्मणों के साथ भली-भांति विचार करके उन्‍होंने काशीराज की ज्येष्ठ पुत्री अंबा को उस समय शाल्‍व के यहां जाने की अनुमति दे दी। शेष दो कन्याओं का नाम अम्बिका और अम्बालिका था। उन्‍हें भीष्म जी ने शास्त्रोक्त विधि के अनुसार छोटे भाई विचित्रवीर्य को पत्नी रूप में प्रदान किया।  

अंबा को राजा शाल्व ने स्वीकार करने से किया मना

वहीं दूसरी ओर अंबा शाल्व के पास पहुंची। किंतु शाल्व से उन्हें स्वीकार करने से मना कर दिया और कहा कि  तुम भीष्म द्वारा बलपूर्वक लाई गई हो, इसलिए अब मैं तुम्हें स्वीकार नहीं कर सकता। जब अंबा कहती हैं कि मैंने तुम्हें ही पति माना था, भीष्म ने मुझे बलपूर्वक हरण किया है, मेरा हृदय अब भी तुम्हारे लिए ही था। आगे शाल्व कहता है कि जिस स्त्री को किसी और पुरुष ने बलपूर्वक प्राप्त किया हो, मैं उसे स्वीकार नहीं कर सकता। तुम जहां चाहो वहां चली जाओ। इस बात पर अंबा कहती हैं कि मैं अपवित्र नहीं हूँ, मुझमें कोई दोष नहीं है, मुझे तो भीष्म ने बलपूर्वक हरण किया है, मैं धर्म से निर्दोष हूं। शाल्व अंततः उसे स्पष्ट रूप से त्याग देता है और कहता है कि वह उसे स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि वह भीष्म द्वारा हरण की जा चुकी है।

इसके बाद अंबा गुस्से में वहां से चली जाती हैं और भीष्म ने उन्हें स्वीकार करने के लिए कहती थी। लेकिन भीष्म के द्वारा ब्रह्मचारी का वचन की बात कहने के साथ वह अंबा को मना कर सकते हैं। ऐसे में अंबा प्रतिशोध लेने के लिए शिव जी की कठोर तपस्या करती हैं।

अम्बोवाच—

यतो मे न कृतं न्यायं भीष्मेण च महीभुजा।
तस्मादहं तपो घोरं करिष्यामि न संशयः॥

अंबा कहती है कि भीष्म और राजा द्वारा मेरे साथ न्याय नहीं किया गया, इसलिए मैं निश्चय ही कठोर तप करूंगी।

भीष्मस्य विनाशार्थं तपः करिष्ये दृढव्रता।
न चैव शान्तिमाप्नोमि यावन्न स मम क्षयः॥

अंबा आगे कहती हैं कि मैं भीष्म के विनाश के लिए दृढ़ संकल्प के साथ तप करूंगी और तब तक शांति नहीं पाऊंगी जब तक उसका अंत न हो।

अंबा का शिखंडी के रूप में पुनर्जन्म

महाभारत के उद्योग पर्व में अंबा के शिखंडी बनने के बारे में बताया गया है। अंबा कठोर तपस्या के बाद जब यह समझती है कि उसका प्रतिशोध पूरा होगा, वह शरीर त्यागने का संकल्प लेती है और तपस्या से शुद्ध होकर अग्नि में प्रवेश किया और अपने पुराने शरीर को त्याग दिया।

तपसा च शरीरं सा त्यक्त्वा वै शुद्धमानसा।
अग्निं प्रविश्य लोकेषु शान्तिं प्राप सुदुर्लभाम्॥

पुनर्जन्म – शिखंडी के रूप में

उद्योग पर्व में दिए इस श्लोक के अनुसार, अंबा शिखंडी के रूप में पुनर्जन्म लेती हैं। जिसका एक ही उद्देश्य होता है भीष्म का वध

सा तु शिखण्डिनी भूत्वा पुनर्जाता महात्मिका।
भीष्मवधार्थमेव सा शापेन नियता पुरा॥

शिखंडी बना पितामह भीष्म की मृत्यु का कारण

कुरुक्षेत्र में पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध आरंभ होता है और भीष्ण वचन वृद्ध होने के कारण कौरवों की तरफ से और दूसरी ओर शिखंडी पांडवों की तरफ से युद्ध करते हैं, क्योंकि वह दौपद्री के भाई के रूप में जन्म लिया था।  महाभारत ग्रंथ के भीष्म पर्व में शिखंडी और भीष्म के युद्ध का वर्णन से लेकर उनकी मृत्यु का विस्तार से वर्णन होता है।

युद्ध के दौरान अर्जुन को भीष्म से लड़ना होता है, लेकिन भीष्म शिखंडी पर हथियार नहीं उठाते। रणक्षेत्र में शिखंडी वज्र के समान स्पर्श वाले तथा सर्प विष के समान भयंकर बाणों द्वारा पितामह भीष्म को घायल करने लगा। परंतु उसके चलाये हुए वे बाण भीष्म के शरीर में कोई घाव या वेदना नहीं उत्पन्न कर पाते थे। गंगानन्दन भीष्म उस समय मुस्कराते हुए उन बाणों की चोट सह रहे थे।

महाभारत युद्ध के दसवें दिन का यह प्रसंग भीष्म और अर्जुन के बीच हुए भीषण संग्राम का वर्णन करता है। युद्ध भूमि में पाण्डव पक्ष के अनेक वीर योद्धा भीष्म के बाणों से घायल होकर पीड़ा में थे, परंतु अर्जुन ने अपने पराक्रम से उनका उत्साह बढ़ाया और भीष्म का सामना किया। शिखंडी को आगे करके अर्जुन ने भीष्म पर तीव्र आक्रमण किया, क्योंकि भीष्म शिखंडी पर शस्त्र नहीं चलाते थे।
इस युद्ध में सात्यकि, धृष्टद्युम्न, विराट, द्रुपद, नकुल-सहदेव, घटोत्कच और अभिमन्यु जैसे अनेक वीरों ने भीष्म पर आक्रमण किया। भीष्म ने अपने अद्भुत पराक्रम से अनेक बाणों और अस्त्रों का नाश किया तथा अकेले ही पूरी सेना को चुनौती दी। वे बार-बार शत्रु सेना को भेदकर आगे बढ़ते रहे, परंतु अर्जुन हर बार उनके अस्त्रों को काट देता था।

अर्जुन ने भीष्म के धनुष को बार-बार काटा और उनके सभी प्रयास विफल कर दिए। अंततः भीष्म ने समझ लिया कि उनका समय आ गया है और उन्होंने शस्त्र त्यागने का निश्चय किया। ऋषियों और देवताओं ने भी उनके इस निर्णय को स्वीकार किया और आशीर्वाद दिया। अंत में भीष्म बाणों की शय्या पर गिर पड़े, जिससे सम्पूर्ण युद्ध भूमि में शोक और आश्चर्य का वातावरण छा गया।

डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। जनसत्ता इन कथाओं की ऐतिहासिकता या वैज्ञानिक प्रमाण की पुष्टि नहीं करता है।