Mahabharat Katha: महाभारत युद्ध पूरे 18 दिनों तक चला था। जब भीषण संहार के बाद कौरवों की सेना से लेकर कई बड़े महारथी भी वीरगति को प्राप्त हो गए थे। इन सभी में से सबसे महत्वपूर्ण युद्ध दुर्योधन और भीमसेन के बीच हुआ। दुर्योधन अपने भाइयों सहित सभी के मारे जाने के बाद असहाय होकर एक सरोवर में छिप जाता है। लेकिन युधिष्ठिर ने दुर्योधन को बाहर आने और क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने के लिए कहा। इसके बाद दुर्योधन बाहर निकला और भीम के साथ युद्ध हुआ। भीमसेन के साथ हुए गदा युद्ध में छल से अपनी जांघें टूट जाने के बाद, कौरव राज दुर्योधन कुरुक्षेत्र की भूमि पर असहाय, लहूलुहान और चेतना शून्य अवस्था में पड़ा था। जहां पर अश्वत्थामा ने आकर उन्हें पांडवों को लेकर कुछ ऐसी बातें कही जिससे वह अति प्रसन्न हुए और सुहृदों के लिए दुःख छोड़कर उसने अपने प्राण त्याग दिए। आइए ‘धर्म गाथा’ श्रृखंला में आ जानते हैं कि दुर्योधन के आखिरी समय पर किसी बात से संतो, मिला था और क्या थे आखिरी शब्द…
महाभारत ग्रंथ के सौप्तिक पर्व के श्लोक 18-36 में अश्वत्थामा और दुर्योधन के बीच हुए वार्ता को विस्तार से बताया गया है। जिसमें अश्वत्थामा पांडवों और श्री कृष्ण के ऊपर क्रोधित होते हैं। इसके साथ ही वह दुर्योधन के पांडवों के महारथी के मारे जाने का समाचार देते हैं। इस बात से खुश होकर दुर्योधन अश्वत्थामा की तारीफ करने के साथ स्वर्गलोक चले जाते हैं।
कृपाचार्य और अश्वत्थामा का विलाप
कौरव पक्ष के बचे हुए तीन महारथी अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा थे। वह अपने राजा दुर्योधन की ऐसी दशा देखकर काफी दुखी होते हैं और उनका हृदय शोक से फट जाता है और खूब विलाप करते हैं। वहीं द्रोणपुत्र अश्वत्थामा पांडवों और श्रीकृष्ण पर अधर्म का आरोप लगाते हुए क्रोध और दुख से भर जाता है।
अश्वत्थामा दुर्योधन से कहते हैं कि दुर्योधन गदा युद्ध के अद्वितीय योद्धा थे और स्वयं बलराम भी उनकी प्रशंसा करते थे। अश्वत्थामा के अनुसार भीमसेन ने धर्मयुद्ध के नियमों का पालन नहीं किया और छलपूर्वक दुर्योधन की जांघें तोड़कर उन्हें पराजित किया। वे इस घटना के लिए भीम, कृष्ण और पांडवों को दोषी ठहराते हैं।
अश्वत्थामा दुर्योधन के गुणों का स्मरण करते हुए कहते हैं कि उनके संरक्षण और उदारता से ही वे तथा उनके साथी सम्मान, संपत्ति और यश प्राप्त कर सके। दुर्योधन ने अपने मित्रों और सहयोगियों का सदैव आदर किया और प्रजा की रक्षा की। इसलिए उनका वियोग अत्यंत पीड़ादायक है।
अश्वत्थामा ने दुर्योधन को बताई पांडव पक्ष की बातें
इसके आगे अश्वत्थामा कहते हैं कि राजा दुर्योधन अगर आप जीवित हों तो यह कानों को सुख देने वाली बात सुनें। बता दें कि पांडव पक्ष में केवल सात और कौरव पक्ष में सिर्फ हम तीन ही व्यक्ति बच गए है। उधर तो पांचों भाई पांडव, श्रीकृष्ण और सात्यकि बचे है और इधर मैं, कृतवर्मा तथा शरद्वान के पुत्र कृपाचार्य शेष रह गये है। द्रौपदी तथा धृष्टद्युम्न के सभी पुत्र मारे जा चुके हैं। इसके साथ ही समस्त पांञ्जालों का भी संहार हो चुका है।
महाराज आप देखिए कि शत्रुओं की करनी का कैसा बदला चुकाया गया? पांडवों के भी सारे पुत्र मार डाले गए। रात में सोते समय मनुष्यों और वाहनों सहित उनके सारे शिविर का नाश कर दिया गया। मैने स्वयं रात के समय शिविर में घुसकर पापाचारी धृष्टद्युम्न को पशुओं की तरह गला घोंट-घोटकर मार डाला है। यह मन को प्रिय लगने वाली बात सुनकर दुर्योधन को पुनः होश आ गया।
दुर्योधन के ये थे अंतिम शब्द
द्रोण पुत्र अश्वत्थामा की बात सुनकर दुर्योधन काफी खुश हो गए है और कहा कि मित्रवर.. आज आचार्य कृप और कृतवर्मा के साथ तुमने जो कार्य कर दिखाया है, उसे न गंगानंदन भीष्म, न कर्ण और न तुम्हारे पिताजी द्रोणाचार्य ही कर सके थे। शिखण्डी सहित वह नीच सेनापति धृष्टद्युम्न मार डाला गया, इससे आज निश्चय ही मैं अपने को इन्द्र के समान समझता हूं। तुम सब लोगों का कल्याण हो ! तुम्हें सुख प्राप्त हो। अब स्वर्ग में ही हम लोगों का पुनर्मिलन होगा। ऐसा कहकर महामनस्वी वीर कुरूराज दुर्योधन चुप हो गया और अपने सुहृदों के लिए दुख छोड़कर उसने अपने प्राण त्याग दिये। वह स्वयं तो पुण्यधाम स्वर्गलोक में चला गया। लेकिन उसका पार्थिव शरीर इस पृथ्वी पर ही पडा रह गया ।
डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक ग्रंथों महाभारत के हिंदी अनुवाद और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, समुदाय या भावना को ठेस पहुंचाना नहीं है, बल्कि शास्त्रों में वर्णित ऐतिहासिक और नैतिक प्रसंगों को पाठकों तक पहुंचाना है। इसकी सत्यता का जनसत्ता से कुछ भी लेना देना नहीं है।
