Ganesh Puran Katha: हिंदू धर्म के विभिन्न ग्रंथों में देवी-देवताओं को मिले श्राप और वरदानों का वर्णन है। इनमें से कुछ ऐसी घटनाएं है, जो आपके जीवन में कई बदलाव डाल सकती है। इन कथाओं में अहंकार, विनम्रता, कर्म और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। ऐसे ही एक काफी रोचक कथा है जो प्रथम पूज्य श्री गणेश और चंद्रमा से संबंधित है। चंद्र देव को अपने तेज और सौंदर्य को लेकर काफी अहंकार था, जिसके कारण उन्हें भगवान गणेश से श्राप का भागी होना पड़ा। इस श्राप से निजात पाने के लिए उन्होंने 12 वर्षों तक कठोर तपस्या की, जिससे उन्हें पुन: तेज तो मिल गया। लेकिन एक दिन उन्हें देखने से आज भी लोग पाप के भागी होते हैं। गणेश पुराण के द्वादश अध्याय में श्री गणेश जी द्वारा चंद्रमा को श्राप का विस्तार में वर्णन मिलता है। आइए जानते हैं ‘धर्म गाथा‘ श्रृंखला में भगवान गणेश द्वारा चंद्रमा को दिए गए श्राप के बारे में…
कैलाश पर फल का विवाद और गणेश जी का क्रोध
प्राचीन काल की बात है-कैलाश शिखर पर अनेक देव, ऋषिगण, सिद्ध गणादि के साथ ब्रह्माजी भी एक उच्च आसन पर विराजमान थे । वहीं पर एक अन्य आसन पर भगवान शंकर के साथ मां पार्वती सुशोभित थी । उनके निकट ही गणपति और कुमार कार्तिकेय दोनों ही अन्य बालकों के साथ खेल रहे थे।
शिवजी के हाथ में एक दिव्य फल था, जो उन्हें नारद जी ने दिया था। इस फल को हाथ में लेकर वे सोच रहे थे कि इसे किसे दिया जाए। शिव जी के साथ मां पार्वती भी ये निर्णय ले पाने में असमर्थ थी। तब शिवजी ने ब्रह्मा जी से पूछा, तो उन्होंने विचार करके कहा कि अगर फल एक ही है तो नियमानुसार कुमार को दिया जाना चाहिए, क्योंकि किसी भी वस्तु पर बड़े बालक का अधिकार पहिले पहुंचता है।
ब्रह्माजी की बात सुनकर शिवजी ने वह फल कुमार को दे दिया । यह देखकर गणपति रुष्ट हो गए और सबसे ज्यादा ब्रह्मा जी पर हो गए है कि उन्होंने ऐसी व्यवस्था क्यों दे डाली? सभा समाप्त हुई । सभी देवता आदि उठ-उठ कर अपने-अपने स्थानों को चले गये । ब्रह्माजी भी अपने लोक में जा पहुंचे । वहां उन्हें सृष्टि का आरंभ करना था । जैसे ही वह आरंभ करने वाले थे, तो गणेश्वर ने विघ्न उपस्थित कर दिया । उस समय उन्होंने प्रकट होकर अपना अत्यन्त उग्र रूप दिखाया । उनके उस रूप को देखकर ब्रह्माजी डर के कारण कांपने लगे।
चंद्रमा का उपहास और गजानन का भयानक श्राप
जब चंद्रमा ने देखा कि गणपति का स्वरूप देखकर ब्रह्माजी भय से कांप रहे हैं, तो उन्हें हंसी आ गई। चंद्र देव के साथ उनके गण भी उपहास करने लगे। ऐसे में गजानन का क्रोध चंद्रमा के ऊपर बढ़ गया और इसे श्राप देते हुए कहा कि मयङ्क ! तूने इस समय मेरी हंसी उड़ा कर जो अभद्रता दिखाई है। इसका फल तुझे मिलना चाहिए।’ जा तू किसी के भी देखने के योग्य नहीं रहेगा और यदि कोई भूल से भी देख लेगा तो अवश्य ही पाप का भागी होगा।’ इतना कहकर गजमुख वहां से अंतर्धान हो गये।
कलाहीन चंद्रमा की व्याकुलता और ‘गं’ मंत्र से मुक्ति
गणेश जी के श्राप के कारण चंद्रमा का तेज खत्म हो गया और श्री हत मलिन और दीन हो गया। इससे वह बहुत व्याकुल हुआ और खिन्नता पूर्वक पश्चात्ताप करने लगा कि देखो! मैं कैसी मूर्खता कर बैठा, उन जगदीश्वर के साथ। वे प्रभु तो अणिमादि गुणों से संपन्न, संसार के कारण के भी कारण एवं महाप्रभु हैं । उनके रुष्ट होने से मैं अदर्शनीय एवं कलाहीन हो गया हूँ । अब इससे छुटकारा पाने के लिए क्या करूं?’
चंद्रमा ने लिया देवताओं का सहारा
जब चंद्रमा की समझ में कोई उपाय नहीं आया तो वह तुरंत ही देवराज इंद्र के पास गया। लेकिन इंद्र भी उन्हें नहीं देखना चाहते थे और अपनी आंखों को झुकाकर वह चंद्र से बोले कि अरे, चंद्रमा ! तुम्हारी यह दशा कैसे हुई ? क्या गजकर्ण के श्राप का ही प्रभाव है यह ? सब बात स्पष्ट कहो ।’
चंद्रमा बोले कि देवराज ! आपसे क्या छुपा है ! सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनकर क्यों पूछ रहे हो ? सहस्राक्ष ! अब शीघ्र ही मेरे श्राप-मुक्त होने के यत्न करो, अन्यथा समस्त संसार ही मेरे शापित होने से अशुभ फल भोगेगा। इसके बाद इंद्र ने उन्हें ब्रह्मा जी के पास जाने के लिए कहां और सभी देवगण उनके पास पहुंचे। तब ब्रह्मा जी ने कहा कि इस श्राप से आपको गणेश जी ही मुक्त कर सकते हैं। ब्रह्माजी ने उन्हें सलाह दी कि केवल गणेश्वर की शरण में जाकर ही इस श्राप का निवारण हो सकता है।
चन्द्रमा के ऊपर गणेश्वर की कृपा
देवताओं की प्रार्थना पर जब भगवान गणेश प्रकट हुए, तो चंद्रमा ने उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगी कि प्रभो ! मुझे श्राप मुक्त कीजिए । मेरी कांति नष्ट हो गई है उसे लौटा दीजिए। मैं अदर्शनीय से दर्शनीय हो जाऊं नाथ। मेरे अपराध को क्षमा कर दीजिए भक्तवत्सल ।’ इस बात पर गणेश जी से कहा कि अच्छा, बोल तुझे एक वर्ष, छह मास अथवा तीन मास के लिए अदर्शनीय रहने दिया जाय अथवा कुछ और चाहता है ? शीघ्र ही स्पष्ट बता ।’
चंद्रमा ने कहा कि मुझे बहुत दण्ड मिल गया है । अब तो क्षमा कर दीजिए।’ यह कहकर उसने पुनः दण्डवत प्रणाम किया। तब श्री गणेश ने कहा कि अपने वचन को मिथ्या कैसे करूं? चाहे सूर्य और सुमेरु अपना स्थान त्याग दें, समुद्र अपनी मर्यादा छोड़ दे अथवा अग्नि शीतल हो जाए, किंतु मेरा वचन मिथ्या नहीं हो सकता । फिर भी मैं तुम्हें वर्ष में एक ही दिन के लिए शापित रखूंगा तथा जाने या अनजाने में भी जो कोई भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चन्द्रमा को देखेगा वही अभिशप्त होगा और वही अधिक दुःख का भागी होगा इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक
“भाद्रशुक्लचतुर्थ्यां यो ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा ।
अभिशापो भवेच्चन्द्र दर्शनाद् भृशदुःखभाक् ॥”
12 वर्षों तक की तपस्या और ‘गं’ मंत्र से व्याकुलता से मिली मुक्ति
भगवान हेरम्ब के इन कृपापूर्ण वचनों को सुनकर चंद्रमा बहुत प्रसन्न हुआ तथा समस्त देवगण भी उनका जय-जयकार करने लगे। चंद्रमा ने पुनः निवेदन करते हुए कहा कि हे प्रभु भविष्य में मुझसे इस प्रकार की मूर्खता न हो और मेरा चित्त आपके चरण-कमलों के स्मरण में लगा रहे, ऐसा वर मुझे प्रदान करें।
गणेश जी ने कहा कि ऐसा ही होगा। परंतु मेरे एकाक्षरी मंत्र ‘गं’ का जप करते रहना। यह कहकर भगवान अंतर्धान हो गए और तब समस्त देवता स्वर्गलोक को गए तथा चन्द्रमा भी अपने लोक में जा पहुंचा।
चंद्रमा ने बारह वर्ष तक तपश्चर्या की और गणेश्वर के एकाक्षरी मंत्र ‘गं’ का निरंतर जप करते रहे। पवित्र जाह्नवी के तट पर भक्तिपूर्वक, एकाग्र मन से उनका यह तप चलता रहा था। तभी सहसा एक दिन वे परम प्रभु चंद्रमा के समक्ष प्रकट हो गए। इस समय उनकी रूप-छटा देखकर निशापति अवाक रह गया। उसके चित्त में आश्चर्य मिश्रित भय की अवतारणा हुई। किंतु शीघ्र ही उसे निश्चय हो गया कि वह साक्षात आदिदेव भगवान गजानन ही हैं, तो वह हाथ जोड़कर प्रणाम करता हुआ उनकी स्तुति करने लगा—
गणेश जी ने दिया वरदान
श्लोक
“नमामि देवं द्विरदाननं तं यः सर्वविघ्नं हरते जनानाम्।
धर्मार्थकामांस्तनुतेऽखिलानां तस्मै नमो विघ्नविनाशनाय॥”
मैं उन दो दांतों से युक्त परमेश्वर को नमस्कार करता हूं, जो अपने भक्तों के सभी विघ्नों का हरण करके तथा सभी के लिए धर्म, अर्थ और काम को प्रशस्त करते हैं। उन विघ्न-विनाशक परमात्मा गजानन को नमस्कार है। हे प्रभो ! मैंने अज्ञानवश जो अपराध किया था, उसे क्षमा करके मुझे मेरा पूर्व रूप प्रदान कीजिए। हे नाथ ! आप ही मुझे मेरा यह रूप प्राप्त करा सकते हैं। हे दया निधान ! आप सभी देवताओं के
तब भगवान गजकर्ण ने चंद्रमा की ओर कृपापूर्ण दृष्टि से देखा और मधुर मुस्कान बिखेरते हुए बोले कि सुधांशु। यह तो मैं पहले ही कह चुका था कि तुम प्रत्येक वर्ष केवल एक दिन के लिए ही अदर्शनीय रहोगे । उस दिन तुम्हें जो कोई भी जाने-अनजाने देख लेगा वही बस अभिशाप का भागी बनेगा । इस प्रकार तुम्हारी निस्तेजस्विता को ऐसे ही लोग बांट लेंगे । कृष्ण पक्ष की चतुर्थी में जो व्रत किया जाए, उसमें तुम्हारा उदय होने पर व्रत करने वाले वे लोग यदि मेरी और तुम्हारी यत्नपूर्वक पूजा करेंगे तो भी उस व्रत का फल लाभ होगा । उस दिन तुम्हारा दर्शन अवश्य करना चाहिए, अन्यथा व्रत का फल नहीं होगा।
अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख लोक मान्यताओं और शिव महापुराण में वर्णित पारंपरिक पौराणिक कथाओं पर आधारित है। जनसत्ता डॉट कॉम (Jansatta.com) इसके ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण का दावा नहीं करता है। इसका उद्देश्य केवल पाठकों को सांस्कृतिक और धार्मिक प्रसंगों से अवगत कराना है।
