Srimad Bhagavatam Puran Katha: महाभारत समाप्त होने के कुछ वर्षों के बाद द्वारका में कुछ अशुभ घटनाएं होने लगी थीं। भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष में बड़े-बड़े उत्पात-अपशकुन हो रहे हैं, तब उन्होंने सुधर्मा-सभा में उपस्थित सभी यदुवंशियों को उन्होंने बुलाकर द्वारका छोड़कर जाने के लिए कह दिया, क्योंकि श्री कृष्ण को आभास हो गया था गांधारी से मिले श्राप और उनके पुत्र साम्ब को मिले ब्रह्म ऋषियों के श्राप के सच होने का समय आ गया है। श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कन्ध में एक ऐसा ही अचंभित करने वाला प्रसंग है। यह कथा है श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब के एक छोटे से मज़ाक की, जिसके कारण ऋषियों के भयंकर ब्रह्मशाप का रूप ले लिया। आइए ‘धर्म गाथा’ श्रृंखला में जानते हैं कैसे साम्ब को मिले श्राप के कारण श्री कृष्ण, बलराम से लेकर पूरी सोने की द्वारिका समुद्र में विलीन हो…

साम्ब का परिहास और ऋषियों का ब्रह्मशाप

श्रीमद्भागवत महापुराण में दी गई कथा के अनुसार, एक बार द्वारका में महर्षि विश्वामित्र, असित, कण्व, दुर्वासा, भृगु और अंगिरा आदि महान ऋषि द्वारका पधारे। श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब ने अपने साथियों के साथ मिलकर ऋषियों की परीक्षा और परिहास करने की सोची। ऐसे में साम्ब को गर्भवती स्त्री के वस्त्र पहना दिए और वह श्रृषियों के पास जा पहुंचा। वहां जाकर उन्होंने ऋषियों से पूछा कि इसके गर्भ से क्या पैदा होगा?.. ऋषियों ने योगबल से इस क्रूर मज़ाक को जान लिया और वह साम्ब पर क्रोधित हुए और इसे श्राप दे दिया कि इसके गर्भ से न तो पुत्र होगा न ही पुत्री.. बल्कि एक ऐसा लोहमय मूसल उत्पन्न होगा, जो तुम्हारे पूरे यदुवंश के विनाश का कारण बनेगा।

श्लोक

जनयिष्यति मन्दोऽयं मूसलं कुलनाशनम् ।
येन सर्वं कुलं नष्टं करिष्यथ सुदुर्मदाः ॥
(श्रीमद्भागवत पुराण – 11.1.16)

ऐसे में घबराए युवकों ने जब साम्ब के शरीर से वस्त्र हटाए, तो सचमुच एक मूसल प्रकट हुआ। तब राजा उग्रसेन के आदेश पर उस मूसल को चूरा-चूरा कर समुद्र में फेंकवा दिया गया, लेकिन उसका एक नुकीला टुकड़ा एक मछली निगल गई और चूरा समुद्र तट पर जमा हो गया। जो आगे चलकर मूसल के चूरे से एरका घास पैदा हुई थी।

श्लोक

तच्छ्रुत्वा विप्रशप्तं ते विमुच्य साम्बस्योदरम् ।
ददृशुः मूसलं ते च लोहमयं विमोहिताः॥
(श्रीमद्भागवत पुराण – 11.1.18)

श्री कृष्ण के कहने पर प्रभास क्षेत्र की ओर निकले द्वारका वासी

वर्षों बाद, जब द्वारका में भयंकर अपशकुन होने लगे, तब श्रीकृष्ण सुधर्मा-सभा में उपस्थित सभी यदुवंशियों से यह बात कही कि द्वारका में बड़े-बड़े भयंकर उत्पात होने लगे हैं। ये साक्षात् यमराज की ध्वजा के समान हमारे महान अनिष्ट के सूचक हैं। अब हमें यहां घड़ी-दो-घड़ी भी नहीं ठहरना चाहिए। ऐसे में सभी स्त्रियां, बच्चे और बूढ़े यहां से शंखद्धार क्षेत्र में चल जाएं और हम लोग प्रभास क्षेत्र  (सरस्वती नदी के तट) में चलें। वहां स्नान आदि करने के बाद गौ, भूमि, सोना, वस्त्र, हाथी, घोड़े, रथ और घर आदि के द्वारा महात्मा ब्राह्मणों का सत्कार करेंगे। सभी ने श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर वहां से चले गए और नौकाओं से समुद्र पार करके रथों द्वारा प्रभास क्षेत्र की यात्रा की।

मदिरा का पान और शुरू हुआ खूनी संघर्ष

जब श्री कृष्ण के आदेश को मानकर सभी लोग मंगल कार्य करने लगे। लेकिन देव ने उनकी बुद्धि हर ली और वे उस ‘मैरेयक’ नामक मदिरा का पान करने लगे। इसका सेवन करने से सभी की बुद्धि भष्ट्र होने लगी। यहीं मंदिरा पीकर वे लोग क्रोध से भरकर एक-दूसरे पर आक्रमण करने लगे और धनुष-बाण, तलवार, भाले, गदा, तोमर और ऋष्टि आदि अस्त्र-शस्त्रों से वहां समुद्र तट पर ही एक-दूसरे से भिड़ गये। प्रद्युम्न साम्ब से, अक्रूर भोज से, अनिरुद्ध सात्यकि से, सुंदर संग्राम जित से, भगवान श्रीकृष्ण के भाई गद उसी नाम के उनके पुत्र से और सुमित्र सुरथ से युद्ध करने लगे। ये सभी बड़े भयंकर योद्धा थे और क्रोध में भरकर एक-दूसरे का नाश करने पर तुल गये थे।

जब एक साधारण घास बनी ‘वज्र’

जब इन सभी के सारे अस्त्र-शस्त्र समाप्त हो गए और धनुष टूट गए, तब उन्होंने समुद्र तट पर उगी हुई ‘एरका’ नाम की घास उखाड़नी शुरू की, जिसे सरकंडा ,सरपत या मूंज के नाम से जानते हैं। यादवों के हाथों में आते ही ये साधारण से दिखने वाली घास एक जब वज्र के समान हो गई थी।  श्रीकृष्ण और बलराम जी के मना करने पर वे उन पर भी टूट पड़े। अंततः, आपसी संघर्ष में पूरा यदुवंश वैसे ही भस्म हो गया।

बलराम जी देह त्याग और जरा व्याध का बाण

यदुवंश के संहार के बाद शेषनाग के अवतार बलराम जी ने योग धारण करके अपने शररी का त्याग कर दिया। वहीं दूसरी ओर भाई के जाने पर श्री कृष्ण ने एक पीपल के वृक्ष के नीचे शांत होकर बैठ गए। उन्होंने अपनी दाहिनी जांघ पर बायां चरण रखा हुआ था।तभी वहां जरा नाम का शिकारी आया। उसने मूसल के उसी बचे हुए नुकीले टुकड़े से अपने बाण की नोक बनाई थी। दूर से प्रभु का लाल तलवा उसे हिरण के मुख जैसा लगा और उसने बाण चला दिया। इसके बाद त्रिदेव के साथ सभी देवताओं के आने के बाद कान्हा बैकुंठ चले गए।

एक पल में समुद्र में डूब गई सोने की द्वारका

दूसरी ओर यदुवंश के विनाश और श्रीकृष्ण के स्वधाम जाने की खबर मिलने पर माता देवकी, रोहिणी और पिता वासुदेव ने भी शोक में अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद अर्जुन ने सभी का पिंड दान किए। इसके बाद जैसे ही बचे हुए बच्चों और स्त्रियों को लेकर द्वारका से बाहर निकले, वैसे ही समुद्र ने भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य महल को छोड़कर देखते ही देखते पूरी सोने की द्वारका नगरी को जलमग्न कर दिया।

अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख लोक मान्यताओं और शिव महापुराण में वर्णित पारंपरिक पौराणिक कथाओं पर आधारित है। जनसत्ता डॉट कॉम (Jansatta.com) इसके ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण का दावा नहीं करता है। इसका उद्देश्य केवल पाठकों को सांस्कृतिक और धार्मिक प्रसंगों से अवगत कराना है