Dharm Gatha, Shani Dev Curse: भगवान शनि का नाम आते ही प्राय: लोग भय भी हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें क्रूर और कर्मों का फल देने वाला कहा जाता है। वह जातक को अनुशासन में रहना सिखाते हैं। कर्म का फल व्यक्ति को धनवान बनाता है। कर्म से ही व्यक्ति को भाई, संतान से लेकर स्त्री की प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं कर्मों से ही अल्प आयु से लेकर दीर्घ आयु होते हैं। शनि इकलौते देव है जिनके पास क्रूर दृष्टि है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि न्याय के देवता शनि के पास ये दृष्टि कहां से आई है। किसने और कैसे उन्हें ये दृष्टि मिली। आपको बता दें कि उनको ये श्राप के तौर पर उनकी ही पत्नी के द्वारा मिला था। गणेश पुराण में दी हुई कथा के अनुसार, स्वयं शनिदेव ने माता पार्वती को अपने मस्तक नीचे रखने और अपनी दृष्टि के पीछे का रहस्य बताया था। यही वह कथा है जो शनिदेव ने पार्वती जी को सुनाई थी, जिसके कारण वे आज भी ज्योतिष शास्त्र में अपनी दृष्टि के प्रभाव (साढ़े साती या ढैय्या) के लिए जाने जाते हैं। आइए जानते हैं धर्म गाथा श्रृंखला में आज शनिदेव की पत्नी के श्राप की कहानी, जिसने एक तपस्वी शनि को न्याय का कठोर देवता बना दिया…
महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित गणेश पुराण के तृतीय खंड के छठे अध्याय में शनि को मिली क्रूर दृष्टि के बारे में वर्णन है। इस कथा को स्वयं कर्मफल दाता शनिदेव ने मां पार्वती को गणेश जी के जन्म के बाद सुनाई थी।
स्वयं शनिदेव ने माता पार्वती को सुनाई ये कथा
गणेश पुराण के अनुसार, जब गणेश जी का प्राकट्य हुआ, तो सभी देवी-देवता उनके दर्शन करने के लिए पहुंचे। ऐसे में शनिदेव भी मां पार्वती के साथ गणेश जी के दर्शन करने के लिए पहुंचे। लेकिन उनकी क्रूर दृष्टि होने के कारण वह गणेश जी को देखने के लिए हिचकिचा रहे थे। शनिदेव जगज्जननी उमा को देखते ही उन्हें प्रणाम कर स्तुति करने लगे। माता एक अत्युच्च रत्नमणि जटित स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके चारों ओर असंख्य देवियां खड़ी थीं। पांच प्रमुख सखियों श्वेt चामरों द्वारा निरंतर उनकी सेवा कर रही थीं। कुछ अन्य सखियां ताम्बूल भेंट कर रही थीं तो कुछ सुगंधित द्रव्य अर्पण कर रही थीं।
माता ने अपनी देह पर अग्नि के समान तेजस्वी वस्त्र धारण किए हुए थे। उनकी गोद में अद्वितीय शिशु विद्यमान था। उनके समक्ष अप्सराएं और देवांगनाएं नृत्य कर रही थीं। समस्त नारी-समाज रस-विभोर हो रहा था। परन्तु शनिदेव का सिर नीचा किए रहने के कारण वह कुछ भी न देख सके।
सूर्यपुत्र शनि को अपने चरणों में दण्डवत प्रणाम करते देखकर माता प्रसन्न होती हुईं बोलीं- ‘शनैश्चर! वत्स! मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूं। तुम निरन्तर लोक-कल्याणार्थ गतिशील रहते हो, अतः आयुष्यमान् रहकर अपने कार्य का निर्वाह करते रहो। बोलो, और क्या चाहते हो? मैं तुम्हारी अभिलाषा सुनना चाहती हूँ। यदि कुछ इच्छा हो तो वर माँग सकते हो।
शनिदेव ने कहा- ‘जगज्जननी! मैं आपके शिशु-दर्शन की कामना से यहां उपस्थित हुआ हूं। आप मेरी यह इच्छा पूर्ण करने की कृपा करें।
उमा ने कहा- ‘वत्स! शिशु तो मेरी गोद में ही है, मेरे दर्शन के साथ उसके दर्शन भी सहज रूप से हो रहे हैं। अब और जो कुछ चाहते हो वह भी कहो!’
शनैश्चर ने निवेदन किया- ‘मातेश्वरी! संसार में तप ही प्रधान कर्म है। सभी प्राणी अपने-अपने कर्म रूप तप का ही फल भोगते हैं। शुभ या अशुभ कोई भी कर्म किसी भी कल्प में लुप्त नहीं होता। अपने ही कर्म-फल रूप में उसे देवता, दैत्य, गन्धर्व, किन्नर आदि योनियों की प्राप्ति होती है। कर्मफल से ही जीव इन्द्रादि की पदवी प्राप्त कर लेता अथवा ब्रह्मा प्रभृति रूप ग्रहण कर लेता है। कर्म ही उसे पशु, पक्षी, कीड़ा-मकौड़ा आदि का जन्म धारण कराते हैं। ऐसे में मैं आपके पुत्र को नहीं देख सकता है। लेकिन मां पार्वती नहीं मानी, तो स्वयं शनिदेव ने उन्हें क्रूर दृष्टि के मिले श्राप के बारे में बताया।
श्री कृष्ण के भक्त थे शनिदेव
शनिदेव मां पार्वती से कहते हैं कि अब आप एक अत्यन्त गोपनीय और महत्त्वपूर्ण इतिहास सुनिए। यद्यपि वह न कहने योग्य इतिहास माता के समक्ष लज्जाजनक भी है तो भी उसे कहना होगा। ‘मातेश्वरि! मैं आरम्भ से ही भगवान् श्रीकृष्ण का भक्त रहा हूं तथा मेरा मन सदैव उन्हीं भगवान के चरणारविन्दों में लगा रहता था। विषयों से विरक्त रहता हुआ मैं पूर्ण रूप से तपस्वी बन गया। किन्तु, उस समय वह तपस्या समाप्त हो गई जब मेरा विवाह हो गया।।
तभी एक सखी बीच में ही बोल उठी- ‘विवाह होने पर तो तपस्या का भंग होना स्वाभाविक ही था। सभी की यही दशा होती है, तब तुम्हारी बात में क्या विशेषता है?’
चित्ररथ की पुत्री से हुआ शनिदेव का विवाह
शनि ने आगे कहा कि विशेषता है तभी तो कह रहा हूं। उस विशेषता पर भी ध्यान दो। मेरा विवाह चित्ररथ की अत्यन्त सुन्दरी, तेजस्विनी कन्या से हुआ था। वह सती भी निरन्तर तपस्या में लगी रहती। एक बार जब वह ऋतुस्नाता हुई तब उसने सोलह श्रृंगार किए। उस समय वह दिव्य अलंकारों से विभूषित और अत्यन्त शोभामयी लग रही थी। उसके रूप और शृंगार दोनों ने मिलकर सोने में सुहागे का ही कार्य किया था। उस समय उसका रूप मुनियों को भी मोहित कर लेने वाला बन गया।
शनिदेव को उनकी पत्नी ने ही दिया ये श्राप
रात्रि होने पर वह मेरे पास उपस्थित हुई। मैं भगवान श्रीकृष्ण के ध्यान में तल्लीन था, इसलिए उसके आगमन पर भी मैंने ध्यान न दिया। लेकिन वह तो मदान्वित हो रही थी, कुछ तीखे स्वर में बोली- स्वामिन! मेरी ओर देखो तो सही। किंतु मैंने उसकी ओर कुछ भी ध्यान न दिया।
वह अपने चंचल नेत्रों से देख रही थी, किंतु मेरी तल्लीनता भंग न हो पाई। उसने अपने को असफल प्रयास देखा तो क्रोधित हो गई। क्योंकि उसका ऋतुकाल व्यर्थ हो रहा था। क्रोध में भी उसने मुझे चैतन्य करने का हर तरीके से प्रयत्न किया था। जब वह मेरा ध्यान भंग करने में सफल नहीं हो सकी तब सहसा कामवती कह बैठी-
“न दृष्टाहं त्वया येन न कृतमृतुरक्षणम् ।
त्वया दृष्टश्च यद्वस्तु मूढ! सर्वं विनश्यति ॥”
अरे मूढ! तूने मेरी ओर देखा तक नहीं, इस कारण मेरे ऋतुकाल की रक्षा नहीं हो सकी अर्थात् मेरा ऋतुकाल व्यर्थ ही जा रहा है। इस कारण अब तू जिस किसी को भी देखेगा, वह अवश्य ही नष्ट हो जायेगा।
श्राप के बाद शनिदेव का ध्यान हुआ भंग
उसका श्राप मेरे कानों में पड़ा जिससे मेरा ध्यान भंग हो गया। नेत्र खोलकर देखा तो मेरी पत्नी ही खड़ी है। वह उस समय अत्यन्त सुंदर प्रतीत हो रही थी। सोचने लगा, यह तो मेरी पत्नी है, इसने मुझे ऐसा शाप क्यों दे दिया? वस्तुतः यह मेरी भूल भी है कि विवाह करके भार्या को संतुष्ट करने के अपने कर्तव्य से विमुख ही रहा।
श्राप से बचने का कोई नहीं है तरीका
शनिदेव ने आगे कहा कि मैंने फिर सोचा कि यदि अब भी सन्तुष्ट कर लूं तो श्राप से बच सकता हूं। ऐसा विचार दृढ़ करके मैंने अपनी पत्नी तो शांत करने का प्रयत्न किया और कहा कि देवि, प्राणप्रिये, मैं ध्यानावस्थित था। इसी से तुम्हारी याचना नहीं सुन सका, अन्यथा तुम्हारी उपेक्षा कभी नहीं करता। अब मुझे जो आज्ञा हो करने को तैयार हूं।
इसी प्रकार मैंने उसे अनेक बार मनाया और जब वह शांत हो गई तब उसे काम्य प्रदान कर उससे श्राप मिथ्या करने का आग्रह करने लगा। परंतु अब ऐसी कोई शक्ति न रह गई थी, जो अपने श्राप को वह नष्ट कर सकती। श्राप देने के कारण उसका पातिव्रत धर्म अशक्त हो गया था। उसने बहुत पश्चात्ताप करते हुए कहा भी था कि मुझसे बड़ी भूल हो गई, मैं चाहती हूं कि मेरे द्वारा दिया गया श्राप नष्ट हो जाए। किंतु श्राप नष्ट नहीं हुआ।
ऐसा ही समझता हुआ मैं उस दिन से किसी की भी ओर आंख उठाकर नहीं देखता, क्योंकि आंख उठाकर देखने से न जाने किसका अहित हो जाये। लोक-कल्याणार्थ ही मैं सब समय अपना मस्तक झुकाए रहता हूं। इसी कारण हे जगज्जननि! मैं आपको या आपके शिशु को नहीं देख सका था।
शनि को प्राप्त शाप और उसके कारण सदैव मुख को नीचे किये रहने की बात सुनकर पार्वतीजी हंस पड़ीं। उनके साथ उनकी सभी सखियां, सभी दासियां, सभी अप्सराएं सभी देवकन्याएं भी हंस पड़ीं। वह हंसी बहुत देर तक चलती रही। बेचारे शनिदेव अपना मुख नीचे किए खड़े रहे।
यह कथा कहकर सूतजी कुछ देर के लिए चुप हो गये। यह देखकर शौनक ने विनीत भाव से प्रश्न किया- ‘फिर क्या हुआ सूतजी! यह उपाख्यान तो हमने आज तक नहीं सुना था। इस प्रकार के गोपनीय रहस्यों को बताने में आप ही सक्षम हैं। कृपा कर इसको पूर्ण करने का कष्ट करें।’
पार्वती ने शनि को पुत्र-दर्शन की आज्ञा दी
गणेश पुराण के तृतीय खंड के सप्तम अध्याय में ये कथा लिखी है। इसके अलावा सूतजी कुछ देर तक मौन रहने के पश्चात् बोले- ‘शौनक! बहुत देर तक हंसने के बाद माता पार्वती ने भगवान श्रीहरि का स्मरण किया और फिर बोलीं- तुम्हें जो शाप मिला है, उसका नाश तो हो नहीं सकता, इसलिए जो परिणाम मिलता हो, उसके लिए तैयार रहना आवश्यक है। परन्तु मेरा विचार है कि उस शाप का प्रभाव हमपर नहीं होगा। इसलिए तू मुझे अथवा मेरे पुत्र को देख।
शनैश्चर बड़े असमंजस में पड़ गए- इनमें से किसको देखूं? अथवा किसी को देखूं ही नहीं? यदि देखूं तो कहीं कोई अनिष्ट न हो जाये? परन्तु न देखने पर भी अनिष्ट होना सम्भव है। इसलिए शिशु को देख लेना चाहिए।
शनिदेव ने धर्म को साक्षी करके पार्वती-पुत्र को देखने का निश्चय किया। परन्तु पार्वतीजी की ओर न देखना ही उचित होगा। ऐसा निश्चय करके भी आशंका के कारण खिन्न मन वाले शनि के कण्ठ, ओष्ठ व तालु शुष्क हो गये। फिर उन्होंने अपने मन को संयत करके अपने दायें नेत्र के कोने से शिशु के मुख की ओर देखा।
शनि की दृष्टि पड़ते ही शिशु का मस्तक छिन्न हो गया!
शनिदेव का उस शिशु को देखना था कि आशंका साकार हो उठी। उनकी दृष्टि पड़ते ही शिशु का मस्तक छिन्न हो गया। यद्यपि शनि ने दायें नेत्र के कोण से शिशु की एक झलक ही देखी थी, तथापि शाप का फल न मिट सका।
बालक के मस्तकीय भाग से रक्त की अविरल धारा बह निकली। पार्वती की गोद में रक्त-ही-रक्त दिखाई देता था। परन्तु, वह छिन्न हुआ मस्तक अपने अभीष्ट गोलोक धाम में जाकर भगवान कृष्ण के शरीर में प्रविष्ट हो गया। बाद में इसी सिर पर शिव जी ने हाथी का सिर लगाकर गणेश जी को पुनर्जीवन दिया।
डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। जनसत्ता इन कथाओं की ऐतिहासिकता या वैज्ञानिक प्रमाण की पुष्टि नहीं करता है।
