Mahabharta Katha: महाभारत के अठारह दिनों तक चले भीषण कुरुक्षेत्र युद्ध का अंत केवल कौरवों और पांडवों की विजय या फिर हार का निर्णय नहीं था। युद्ध तो समाप्त हो चुका था लेकिन अपने पीछे कई गहरे घाव छोड़ गया, जो अभी भी जीवित थे। हस्तिनापुर की धरती वीरों के रक्त से रंग चुकी थी। धृतराष्ट्र, गांधारी, द्रौपदी, कुंती से लेकर असंख्य माताएं, पत्नियां और पुत्र अपने प्रियजनों के वियोग में विलाप कर रहे थे। इसी अत्यंत दुखद वातावरण में महाभारत का एक और मार्मिक प्रसंग हुआ। जिसमें गांधारी के क्रोध से पांडव भी डर गए थे और कौरवों की माता की एक नजर से धर्मराज युधिष्ठिर के पैरों के नाखून काले हो गए थे। आइए आज ‘धर्म गाथा’ श्रृंखला में जानते हैं महाभारत ग्रंथ के स्त्री पर्व का यह अत्यंत मार्मिक कथा के बारे में…

महाभारत युद्ध पर विजय होने के बाद श्री कृष्ण और पांडव धृतराष्ट्र से मिले। इसके बाद धृतराष्‍ट्र की आज्ञा लेकर वह गांधारी के पास पहुंचे। अपने सौ पुत्रों के वध से शोकाकुल गांधारी को जब यह मालूम हुआ कि युधिष्ठिर कौरवों का संहार करने के बाद उनसे मिलने आ रहे हैं, तो उनके अंदर इसका क्रोध उत्पन्न हुआ कि वह उन्हें श्राप देने के लिए तैयार हो गई। लेकिन किसी प्रकार से वेद व्यास से उन्हें ऐसा ना करने के लिए मना लिया।

जब डरते हुए भीमसेन ने मांगी गांधारी से क्षमा

युद्ध की समाप्ति के बाद जब पांचों पांडव में से पहले भीमसेन डरते हुए और अत्यंत विनयपूर्वक गांधारी के सामने आए। भीमसेन ने कहा, “माताजी! यह अधर्म हो या धर्म, मैंने दुर्योधन से डरकर अपने प्राण बचाने के लिए ही गदा युद्ध में ऐसा किया था। आपके उस महाबली पुत्र को कोई भी धर्मानुकूल युद्ध करके पराजित नहीं कर सकता था, इसलिए मुझे यह कदम उठाना पड़ा। कृपया मेरे इस अपराध को क्षमा करें।

इसके बाद भीमसेन ने गांधारी को द्रौपदी के अपमान और दुर्योधन द्वारा भरी सभा में किए गए अधर्म की याद दिलाई। भीमसेन की इन बातों को सुनकर गांधारी का क्रोध कुछ शांत हुआ, लेकिन दुःशासन के वध के समय भीमसेन द्वारा किए गए आचरण पर उन्होंने अपनी गहरी आपत्ति व्यक्त की, जिससे उनका क्रोध और भी ज्यादा बढ़ गया और उन्होंने कहा कि कहां है वह राज युधिष्ठिर ?’। यह सुनकर महाराज युधिष्ठिर कांपते हुए हाथ जोड़े उनके सामने आए।

युधिष्ठिर का आगे बढ़ना और गांधारी का श्राप देने के लिए बढ़ना

भीमसेन के बाद धर्मराज युधिष्ठिर अत्यंत भयभीत और कांपते हुए हाथ जोड़कर माता गांधारी के सम्मुख आए। युधिष्ठिर ने अत्यंत मीठी और विनीत वाणी में अपनी भूल स्वीकार करते हुए कहा कि आपके पुत्रों का संहार करने वाला क्रूरकर्मा युधिष्ठिर मैं हूं। पृथ्‍वी भर के राजाओं का नाश करने में मैं ही हेतु हूं, इसलिए श्राप के योग्य हूं। इसलिए आप मुझे श्राप दे दीजिए।

युधिष्ठिर ने आगे कहा कि अपने ही बंधु-बांधवों का वध करके अब उन्हें इस जीवन, राज्य या धन से कोई सरोकार नहीं रह गया है। युधिष्ठिर की यह आत्मग्लानि और सत्य निष्ठा देखकर गांधारी देवी जोर-जोर से सांस खींचती हुई सिसकने लगीं, उनके मुंह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे।

आंखों की पट्टी के नीचे से पड़ी दृष्टि और काले पड़ गए नाखून

अब डरे हुए राजा युधिष्ठिर पूरी तरह से झुककर माता गांधारी के चरणों पर गिरकर क्षमा याचना करने वाले थे। ठीक उसी समय एक अभूतपूर्व घटना घटी। धर्म को जानने वाली दूर-दर्शिनी देवी गांधारी ने अपनी आंखों पर बंधी पट्टी के भीतर (नीचे के आंशिक हिस्से) से नीचे झुक रहे राजा युधिष्ठिर के पैरों की उंगलियों के अग्रभाग को देख लिया। इतने में ही राजा के नख काले पड़ गये। इसके पहले उनके नख बड़े ही सुन्दर और दर्शनीय थे।

श्रीकृष्ण के पीछे छिपे गए अर्जुन

गांधारी की दृष्टि की यह अमोघ और विनाशकारी शक्ति देखकर वहां उपस्थित सभी लोग स्तब्ध रह गए। गांधारी के इस भयंकर तेज को देखकर अर्जुन अत्यंत भयभीत हो गए और वे तुरंत भगवान श्रीकृष्ण के पीछे जाकर छिप गए। अर्जुन को इस तरह छिपते देख गांधारी का मातृ-हृदय पसीज गया और उनका क्रोध धीरे-धीरे शांत हो गया। इसके बाद उन्होंने पांडवों को एक स्नेहमयी माता के समान सांत्वना दी।

अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख लोक मान्यताओं और शिव महापुराण में वर्णित पारंपरिक पौराणिक कथाओं पर आधारित है। जनसत्ता डॉट कॉम (Jansatta.com) इसके ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण का दावा नहीं करता है। इसका उद्देश्य केवल पाठकों को सांस्कृतिक और धार्मिक प्रसंगों से अवगत कराना है