Mahabharat Katha: महाभारत युद्ध को 17 दिन हो चुके थे और कौरवों की तरफ से कर्ण लगातार अपने वार से पांडवों के महारथियों को परास्त करते जा रहे थे फिर अर्जुन और कर्ण के बीच भयंकर युद्ध आरंभ हुआ। दोनों महारथी एक-दूसरे पर विभिन्न तरह के बाणों से प्रहार कर रहे थे। जब अर्जुन के भयंकर वेगशाली और तेजधार वाले नाना प्रकार के बाणों से कर्ण को घायल कर दिया और उनके शरीर से रक्त की धारा बहने लगी थी। इसी बीच कर्ण का रथ जमीन में धंस गया। जिसे निकालने के लिए वह अपनी रथ से नीचे उतरे, लेकिन अर्जुन ने बाण चढ़ाना बंद नहीं किया, तो कर्ण धर्म की दुहाई देने लगा। ऐसे में श्री कृष्ण ने आगे आकर महादानी कर्ण को उसके द्वारा धर्म का परित्याग करके किए गए कृत्यों के बारे में बताया, जिससे कर्ण कोई उत्तर नहीं दे पाया। आइए आज ‘धर्म गाथा’ श्रृंखला में जानते हैं महाभारत ग्रंथ के कर्ण पर्व में दिए गए श्री कृष्ण और कर्ण के बीच हुए उस संवाद के बारे में जिन्हें सुनकर कर्ण ने अपना सिर झुका लिया था…

धर्म गाथा: गांधारी के क्रोध से जब कांप उठे पांडव, एक नजर देखते ही युधिष्ठिर के पैर के नाखून पड़े काले

कर्ण ने अर्जुन से थोड़ी देर युद्ध रोकने के लिए कहा

शत्रुओं को संताप देने वाले अर्जुन ने अग्नि और सर्प विष के समान भयंकर दिव्य बाण को अभिमंत्रित करने के साथ कर्ण पर छोड़ने का विचार किया। तभी कर्ण के रथ के पहिये धरती में धंस गए। यह देख कर्ण तुरंत ही अपने रथ से उतरकर अपनी भुजाओं से पहिये को निकालने का कोशिश करने लगें। वहीं दूसरी ओर अर्जुन कर्ण पर बाणों से प्रहार करने पर तत्पर थे। पहिया धंस जाने पर कर्ण का क्रोध बढ़ने लगा और उसकी आंखों से आंसू गिरने लगे और गुस्से से अर्जुन की ओर देखते हुए कहा कि हे महान धनुर्धर कुंती कुमार, दो घड़ी प्रतीक्षा करो, जिससे मैं इस फंसे हुए पहिये को पृथ्वी तल से निकाल लूं। पार्थ! दैवयोग से मेरे इस बाएं पहिये को धरती में फंसा हुआ देखकर तुम पुरुष के लिए उचित कपटपूर्ण बर्ताव का परित्याग करो। जिस मार्ग पर कायर चला करते हैं, उसी पर तुम भी न चलो, क्योंकि तुम युद्धकर्म में विशिष्ट वीर के रूप में विख्यात हो।

श्री कृष्ण ने कर्ण को याद दिलाएं उसके कृत्य

कर्ण की बात सुनकर अर्जुन रुक गए। ऐसे में श्री कृष्ण सामने आए और कर्ण से कहने लगे कि तुम किस धर्म की बात कर रहे हो। अब तुम्हें धर्म की याद आ रही है। जब स्वयं तुमने अनेक कुकर्म किए है। जब तुम, दुर्योधन, दुःशासन और सुबलपुत्र शकुनि ने एक वस्त्र पहने और रजस्वला द्रौपदी को राज सभा में घसीटकर बुलवाया था, तब तुम्हारे धर्म बोध का क्या हुआ था? जब जुए के खेल से अनभिज्ञ धर्मराज युधिष्ठिर को शकुनि ने छल-कपट से पराजित किया था, तब तुम्हारा धर्म कहां सो रहा था?

हे कर्ण! वनवास और अज्ञातवास की अवधि पूर्ण हो जाने के बाद भी जब पांडवों को उनका न्याय के हिसाब से राज्य लौटाने से इंकार किया गया, तब तुम्हारा धर्म कहां चला गया था? जब दुर्योधन ने तुम्हारी सलाह पर भीमसेन को जहर मिलाकर भोजन खिलाकर उनकी हत्या का षड्यंत्र रचा और उन्हें विषैले सांपों से डंसवाया, तब तुम्हारा धर्म किस ओर मुख किए बैठा था?

हे राधानन्दन! जब वारणावत के लाक्षागृह में सोते हुए कुंती पुत्रों को जीवित जलाने का प्रयास किया गया, तब तुम्हारा धर्म कहां विलुप्त हो गया था? आज धर्म की दुहाई देने वाले तुम उन सभी अधर्मपूर्ण कृत्यों के समय मौन क्यों थे?

श्री कृष्ण ने आगे कहा कि हे राधानन्दन! पहले नीच कौरवों द्वारा क्लेश पाती हुई निरपराध द्रौपदी को जब तुम निकट से देख रहे थे, उस समय तुम्हारा धर्म कहां गया था? याद है न कि तुमने द्रौपदी से क्या कहा था। तुमने उससे कहा था कि कृष्णे, पांडव नष्ट हो गए, सदा के लिए नरक में पड़ गए। अब तू किसी दूसरे पति का वरण कर ले।

जब तुम इस प्रकार के कटु और अपमानजनक वचन कहते हुए गजगामिनी द्रौपदी को निर्लज्जता से निहार रहे थे, तब तुम्हारा धर्म कहां विलुप्त हो गया था?

हे कर्ण! जब राज्य के लोभ में अंधे होकर तुमने शकुनि की कुटिल सलाह का समर्थन करते हुए पाण्डवों को पुनः द्यूतक्रीड़ा के लिए बुलवाया था, तब तुम्हारा धर्म किस गर्त में समा गया था? इतना ही नहीं जब रणभूमि में अनेक महारथियों ने मिलकर वीर बालक अभिमन्यु को चारों ओर से घेर कर अन्याय पूर्वक उसका वध किया था, तब तुम्हारा धर्म कहां था? यदि उन सभी अवसरों पर धर्म का कोई अस्तित्व नहीं था, तो आज यहां धर्म की दुहाई देकर व्यर्थ वाणी का श्रम करने से क्या लाभ?

हे सूतपुत्र! अब चाहे तुम धर्म की कितनी ही बातें क्यों न कर लो, तुम्हारे पूर्व कृत अधर्मों का कलंक तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगा। कभी पुष्कर ने राजा नल को द्यूत में पराजित कर उनका राज्य छीन लिया था, किंतु नल ने अपने पराक्रम, धैर्य और पुरुषार्थ के बल पर पुनः अपना राज्य और यश दोनों प्राप्त कर लिए थे। उसी प्रकार लोभ और स्वार्थ से रहित पांडव भी अपनी भुजाओं के सामर्थ्य से, अपने मित्रों और सम्बन्धियों सहित, रणभूमि में उद्दण्ड शत्रुओं का संहार करके पुनः अपना राज्य प्राप्त करेंगे। निश्चय ही वे सोमकों के साथ मिलकर अपने अधिकार को पुनर्स्थापित करेंगे।

पुरुष श्रेष्ठ पांडव सदा धर्म की छत्रछाया में सुरक्षित रहे हैं। इसी निश्चित रूप से ये तुम जान लो कि उनके हाथों धृतराष्ट्र  के पुत्रों का विनाश अवश्य होगा। धर्म अंत में उन्हीं का साथ देता है जो सत्य और न्याय के पथ पर चलते रहते हैं।

श्री कृष्ण की बातों से लज्जा से झुक गया कर्ण का सिर

श्री कृष्ण का इस तरह से कर्ण से कहने पर उसा सिर लज्जा से झुक जाता है और वह किसी भी प्रकार का उत्तर दे पाने में असमर्थ हो जाते है। वह महान वेग और पराक्रम से सम्पन्न हो क्रोध से होंठ फड़फड़ाता हुआ धनुष उठाकर अर्जुन के साथ युद्ध करने लगा।

अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख लोक मान्यताओं और शिव महापुराण में वर्णित पारंपरिक पौराणिक कथाओं पर आधारित है। जनसत्ता डॉट कॉम (Jansatta.com) इसके ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण का दावा नहीं करता है। इसका उद्देश्य केवल पाठकों को सांस्कृतिक और धार्मिक प्रसंगों से अवगत कराना है