Mahabharat Katha: महाभारत के वन पर्व का वह प्रसंग आज भी ये सोचने में मजबूर कर देता है कि कौरवों के द्वारा द्रौपदी का हुआ अपमान क्या वास्तव में सही था। जब वनवास के दौरान काम्यक वन में पांडव और द्रौपदी से श्री कृष्ण मिलने आए, तो उनके कष्टों को देखकर उन्हें काफी क्रोध आया और वह कौरवों का नाश करने से चल पड़ें। लेकिन अर्जुन और द्रौपदी ने उनकी स्तुति करके उन्हें शांत किया। इसके साथ ही द्रौपदी ने अपने साथ हुए अपमान और पीड़ा को भगवान श्री कृष्ण के सामने कहा। पाञ्चाली ने उन पर हुए अन्याय की वह गाथा सुनाई जिसे सुनकर स्वयं जनार्दन की आंखें नम हो गई थीं और पांडवों के सिर भी झुक गए। आइए ‘धर्म गाथा‘ श्रृंखला में आज जानते हैं कि द्रौपदी से श्री कृष्ण को अपनी पीड़ा सुनाते हुए क्या-क्या प्रश्न किए।
द्रौपदी ने श्री कृष्ण से कहा कि मैं आपके प्रति प्रेम होने के कारण आपसे अपना दुःख निवेदन करूंगी, क्योंकि दिव्य और मानव जगत में जितने भी प्राणी हैं। उन सबके ईश्वर आप ही हैं। भगवान कृष्ण! मेरे-जैसी स्त्री जो कुंती पुत्रों की पत्नी, आपकी सखी और धृष्टद्युम्न जैसे वीर की बहन हो। क्या फिर भी उसके केशों को पकड़कर घसीटकर लायी जा सकती है? मैं रजस्वला थी, मेरे कपड़ों पर रक्त के छींटे लगे थे, शरीर पर एक ही वस्त्र था और लज्जा एवं भय से मैं थर-थर कांप रही थी। उस दशा में मुझ दुखिनी अबला को कौरवों की सभा में घसीटकर लाया गया था। भरी सभा में राजाओं की मंडली के बीच अत्यन्त रक्तस्राव होने के कारण मैं रक्त से भीगी जा रही थी। उस अवस्था में मुझे देखकर धृतराष्ट्र के पापी पुत्रों ने जोर-जोर से हंसकर मेरी हंसी उड़ा रहे थे।
द्रौपदी का पांडवों पर निकाला गुस्सा
मधुसूदन। पांडवों, पांचालों और वृष्णिवंशी वीरों के जीतेजी धृतराष्ट्र के पुत्रों ने दासीभाव से मेरा उपभोग करने की इच्छा प्रकट की। मैं धर्मतः भीष्म और धृतराष्ट्र दोनों की पुत्रवधु हूं, तो भी उनके सामने ही बलपूर्वक दासी बनाई गई। मैं तो इन पांडवों की निंदा करती हूं, जो अपनी यशस्विनी धर्मपत्नी को शत्रुओं द्वारा सताये जाने पर सिर्फ देख रहे होते हैं। भीमसेन के बल को धिक्कार है, अर्जुन के गाण्डीव धनुष को भी धिक्कार है, जो उन नराधर्मों द्वारा मुझे अपमानित होती देखकर भी सहन करते रहे। इन लोगों के होते हुए दुर्योधन इतना बड़ा अत्याचार करके दो घड़ी भी जीवित रह रहा है।
इन चार कारणों से श्री कृष्ण ने की थी द्रौपदी की रक्षा
न मे पतयः सन्ति न पुत्रा न बान्धवाः ।
न भ्रातरः न च पिता न चैव त्वं जनार्दन ॥
पांचाल राजकुमारी कृष्णा लगातार रोती हुए श्री कृष्ण से बोली कि मधुसूदन.. मेरे लिए न पति हैं, न पुत्र हैं, न बान्धव हैं, न भाई हैं, न पिता हैं और न आप ही हैं। हे जनार्दन! आप सब लोग, नीच मनुष्यों द्वारा जो मेरा अपमान हुआ था, उसकी उपेक्षा कर रहे हैं, मानो इसके लिए आपके हृदय में तनिक भी दुःख नहीं है। उस समय कर्ण ने जो मेरी हंसी उड़ायी थी, उससे उत्पन्न हुआ दुःख मेरे हृदय से दूर नहीं होता है।
श्लोक
सम्बन्धाच्चाभिमानाच्च सख्याच्च मधुसूदन।
प्रभुत्वाच्चापि मे रक्ष्या त्वयाहं सततं विभो॥
(महाभारत, वन पर्व, अध्याय 12, श्लोक 121)
श्रीकृष्ण! चार कारणों से आपको सदा मेरी रक्षा करनी चाहिए। एक तो आप मेरे सम्बन्धी, दूसरे अग्नि कुण्ड में उत्पन्न होने के कारण मैं गौरवशालिनी हूं, तीसरे आपकी सच्ची सखी हूं और चौथे आप मेरी रक्षा करने में समर्थ हैं।
धर्म पर द्रौपदी का वह सवाल, जिससे ‘धर्मराज’ भी निरुत्तर थे
द्रौपदी ने श्री कृष्ण के सामने अपने दर्द के साथ खूब विलाप किया और उन्होंने धर्म की रक्षा करने वालों पर सीधा प्रहार किया। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के सामने उस घृणित कृत्य का स्मरण कराते हुए कहा कि
रजस्वलामेकवस्त्रां सभायां मां नराधमाः।
आनाय्य व्यकुरुर्वाक्यं तद् दुःखं न स्मराम्यहम्॥
(महाभारत, वन पर्व, अध्याय 12, श्लोक 81)
अर्थ: मैं रजस्वला (मासिक धर्म ) थी और मैने केवल एक ही वस्त्र धारण किए हुए थी। उस नीच पुरुष दुःशासन ने उसकी एक बात नहीं मानी है और उसे बलपूर्वक सभा में घसीटा और अपमानित किया। वह दुःख और अपमान का क्षण कभी भी भूल नहीं सकती हूं।
इस प्रश्न के बाद द्रौपदी ने फिर प्रश्न किया कि, जिससे कृष्ण के अलावा पांडवों ने भी अपना सिर झुका लिया
किं नु धर्मः स धर्मज्ञ यत्राहं तादृशी सती।
सभामध्ये समानीता कौरवैर्धर्मदूषिभिः॥
(महाभारत, वन पर्व, अध्याय 12, श्लोक 82)
अर्थ: हे धर्म के ज्ञाता श्रीकृष्ण! क्या वह वास्तव में ‘धर्म’ था, जिसमें मेरे जैसी पतिव्रता और कुलवधू को उन धर्म-दूषित कौरवों ने सभा के बीच में इस प्रकार अपमानित किया?
द्रौपदी के तर्कों का था बहुत ही गहरा अर्थ
द्रौपदी का यह प्रश्न केवल कौरवों के लिए नहीं था, बल्कि वहां बैठे भीष्म, धृतराष्ट, द्रोण सहित अन्य महान राजाओं और उन पतियों के लिए भी था, जो उस सभा में बैठे थे। लेकिन सभा में एक स्त्री के मार्यदा की रक्षा न कर सके।
श्री कृष्ण को लेनी पड़ी ये प्रतिज्ञा
जब द्रौपदी ने इस प्रकार से श्री कृष्ण से कहा, तो उन्होंने उत्तर देते हुए है कि भाविनि तुम जिन पर क्रुद्ध हुई हो। आने वाले समय में उनकी स्त्रियां अपने प्राण प्यारे पतियों के लिए रोती हुई दिखेगी। मैं पांडवों के हित के लिए हर एक चीज करूंगा। शोक न करो। मैं सत्य प्रतिज्ञा लेकर ये कह रहा कि आने वाले समय में तुम एक बार फिर से तुम राज रानी बनोगी। प्रिय सखी कृष्णे आसमान फट पड़े, हिमालय पर्वत विदीर्ण हो जाए, पृथ्वी के टुकड़े-टुकड़े हो जाए और समुद्र सूख जाए। लेकिन मेरी बातें बिल्कुल भी झूठी नहीं होगी।
श्री कृष्ण की प्रतिज्ञा के बाद अर्जुन ने कहीं ये बात
द्रौपदी ने अपनी बातों के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण के मुख से ऐसी बातें सुनकर उन्होंने अर्जुन की ओर देखा। तब अर्जुन ने द्रौपदी से कहा कि देवी जैसा तुमसे मधुसुदन ने कहा वैसा होकर रहेगा। ये टल नहीं सकता है।
द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने कहीं ये बात
धृष्टद्युम्न ने कहा कि मैं द्रोण को मार डालूंगा, शिखण्डी भीष्म का वध करेंगे, भीमसेन दुर्योधन को मार गिराएंगे और अर्जुन कर्ण को यमलोक भेज देंगे। भगवान श्रीकृष्ण और बलराम का आश्रय पाकर हम लोग युद्ध में शत्रुओं के लिये अजेय हैं। इन्द्र भी हमें रण में परास्त नहीं कर सकते। फिर धृतराष्ट्र के पुत्रों की तो बात ही क्या है?
डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक ग्रंथों महाभारत के हिंदी अनुवाद और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, समुदाय या भावना को ठेस पहुंचाना नहीं है, बल्कि शास्त्रों में वर्णित ऐतिहासिक और नैतिक प्रसंगों को पाठकों तक पहुंचाना है। इसकी सत्यता का जनसत्ता से कुछ भी लेना देना नहीं है।
