Mahabharat Katha: महाभारत में मौजूद पात्र दौपद्री के बारे में सभी लोग जानते हैं। पांडवों की धर्म पत्नी दौपद्री केवल एक रानी ही नहीं थी। बल्कि उन्हें स्त्री शक्ति और आत्मसम्मान का सबसे बड़ा प्रतीक हैं। दुर्योधन द्वारा भरी सभा में उनका चीरहरण किया और इस अपमान को उन्होंने जिस वीरता से सहा और फिर अपने खुले केशों से दुर्योधन के अंत तक का जो संकल्प लिया। यहीं आगे चलकर महाभारत के भीषण युद्ध की सबसे बड़ी आधारशिला बनी। भगवान श्रीकृष्ण की सबसे प्रिय सखी थीं। कृष्ण उन्हें प्यार से ‘कृष्णा’ पुकारते थे। जब-जब द्रौपदी पर संकट आया, तब-तब ‘सखा’ कृष्ण ने उनकी रक्षा की थी। आपने उनके चीरहरण से लेकर उनकी प्रतिज्ञा पूरी होने के बारे में तो सुना होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दौपद्री का जन्म गर्भ से नहीं बल्कि यज्ञ की वेदी से हुआ था। राजा द्रुपद ने द्रोणाचार्य से प्रतिशोध लेने के लिए जब ऋषि याज और उपयाज से पुत्रेष्टि यज्ञ कराया, तब एक अद्भुत घटना घटी। रानी के स्नान और श्रृंगार में देरी के कारण, ऋषि ने उस सिद्ध हविष्य को अग्नि में डाल दिया। आइए आज धर्म गाथा श्रृंखला में जानते हैं दौपद्री के जन्म की संपूर्ण कथा…

महाभारत के आदि पर्व में दी गई कथा के अनुसार, पंचांल देश के राजा द्रुपद  की कोई संतान नहीं हो रही थी। वह अपने लिए एक श्रेष्ठ पुत्र चाहते हैं। लेकिन संतान न होने के कारण भाई-बंधुओं उन्हें धिक्कारते रहते थे। ऐसे में वह काफी अधिक व्याकुल रहते थे और कर्म सिद्ध श्रेष्‍ठ ब्राह्मणों को ढूंढने के लिए कई ब्रह्मर्षियों के आश्रम जाते थे कि शायद उन्हें कोई ऐसा ब्राह्मण मिव जाएं, जो ब्रह्मचर्य का पालन करके वेद-वेदांग की शिक्षा प्राप्त की है। नृपश्रेष्ठ द्रुपद द्रोणाचार्य से बदला लेने के लिए भी एक पुत्र की चाहत रखते थे।

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पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए राजा द्रुपद ने की ब्रह्मर्षियों  की खोज

एक बार राजा कृष्‍णवर्णा यमुना तथा गंगा दोनों के तटों पर घूमते हुए ब्राह्मणों की एक पवित्र बस्‍ती में जा पहुँचे। वहां उन महाभाग नरेश ने एक भी ऐसा ब्राह्मण नहीं देखा, जिसने विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करके वेद-वेदांग की शिक्षा प्राप्‍त न की हो। वहां पर ही उन्हें ऐसे दो ब्रह्मर्षियों को देखा, जिनके नाम ये याज और उपयाज। वे दोनों ही शांत और परमेष्ठी ब्रह्मा के तुल्‍य प्रभावशाली थे। वे वैदिक संहिता के अध्ययन में सदा संलग्न रहते थे। उनका गोत्र कश्यप था। वे दोनों ब्राह्मण सूर्यदेव के भक्त, बड़े ही योग्‍य तथा श्रेष्ठ ऋषि थे।

उन दोनों की शक्ति को समझकर राजा द्रुपद ने उन्हें सम्पूर्ण मनोवांछित भोग पदार्थ अर्पण करने का संकल्प लेकर नियंत्रित किया। उन दोनों में से जो छोटे उपयाज थे, वे अत्‍यन्‍त उत्‍तम व्रत का पालन करने वाले थे। द्रुपद एकांत में उनसे मिले और इच्‍छानुसार भोग्‍य वस्तुएं अर्पण करके उन्‍हें अपने अनुकूल बनाने की चेष्‍टा करने लगे। संपूर्ण पदार्थों को देने की प्रतिज्ञा करके प्रिय वचन बोलते हुए द्रुपद मुनि के चरणों की सेवा में लग गए और यथायोग्य पूजन करके उपयाज से बोले- ‘विप्रवर उपयाज! जिस कर्म से मुझे ऐसा पुत्र प्राप्‍त हो, जो द्रोणाचार्य को मार सके। उस कर्म के पूरा होने पर मैं आपको एक अर्बुद यानी दस करोड़ गाय दूंगा।

ब्रह्मर्षियों ने राजा द्रुपद का ठुकराया निवेदन

राता द्रुपद ने आगे कहा कि मैं गायों के अलाा और भी जो आपके मन को अत्यंत प्रिय लगने वाली वस्‍तु होगी, वह सब आपको अर्पित करुंगा, इसमें कोई संशय नहीं है। द्रुपद के ऐसे कहने पर ऋषि उपयाज ने उन्‍हें जवाब दे दिया, कि मैं ऐसा कार्य नहीं करुंगा। लेकिन द्रुपद उन्‍हें प्रसन्‍न करने का निश्‍चय करके पुन: उनकी सेवा में लगे रहे।

करीब एक वर्ष बीतने  उपयाज ने राजा द्रुपद से अपने बड़े भाई याज के स्वभाव के बारे में बताते हुए कहा कि हे राजन! मेरे बड़े भाई याज मर्यादाओं का उतना कठोरता से पालन नहीं करते जितना एक तपस्वी को करना चाहिए। एक बार जंगल में चलते समय उन्होंने जमीन पर गिरा हुआ एक ऐसा फल उठा लिया, जिसके बारे में यह पता नहीं था कि वह शुद्ध है या नहीं। मैं उनके पीछे ही था और मैंने देखा कि उन्होंने फल की अशुद्धि या उसके दोषों पर बिल्कुल विचार नहीं किया।

इतना ही नहीं, जब हम गुरुकुल संहिता भाग का अध्ययन कर रहे थे, तब भी वे अक्सर दूसरों की छोड़ी हुई भिक्षा खा लिया करते थे और बिना किसी संकोच के उस भोजन की तारीफ भी करते थे। अगर मैं तर्क के आधार पर देखूं, तो वे मुझे थोड़े लालची स्वभाव के लगते हैं और किसी भी वस्तु को स्वीकार करने से पहले उसकी शुद्धता की गहराई में नहीं जाते।

इसलिए हे राजन… आपका यज्ञ द्रोणाचार्य जैसे महान ब्राह्मण के विनाश के लिए है और मैं ऐसे प्रतिशोध वाले काम नहीं करता। लेकिन मेरे भाई याज इन नियमों में ज्यादा नहीं उलझते, वे आपके लिए यह यज्ञ करा देंगे। आप उन्हीं के पास जाएं।

द्रोणाचार्य को विनाश के लिए द्रुपद को चाहिए था पुत्र

तब उनसे राजा द्रुपद इस प्रकार बोले कि भगवन.. मैं आपको अस्‍सी हजार गौएं भेंट करता हूं। आप मेरा यज्ञ करा दीजिए। मैं द्रोण के वैर से संतप्त हो रहा हूं। आप मुझे प्रसन्नता प्रदान करें। इसके साथ ही द्रुपद ने द्रोणाचार्य के बारे में बताया और स्वीकार किया कि वे अकेले द्रोणाचार्य को नहीं हरा सकते क्योंकि द्रोणाचार्य के पास ‘ब्राह्मतेज’ (तप और ज्ञान की शक्ति) है। इसीलिए उन्होंने उस शक्ति को हराने के लिए ऋषि याज की आध्यात्मिक शक्ति का सहारा लिया।

राजा की बात सुनकर ब्रह्मर्षियों ने यज्ञ के लिए की हामी

राजा की व्यथा सुनकर ऋषि याज ने कहा कि राजन इस यज्ञ से तुम जैसा पुत्र चाहते हो, वैसा ही तुम्‍हें होगा। तुम्‍हारा वह पुत्र महान पराक्रमी, महातेजस्‍वी और महाबली होगा। याज जी समझ गए कि यह कोई साधारण काम नहीं बल्कि बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। इसलिए उन्होंने अपने भाई उपयाज (जो बहुत निस्वार्थ थे) को भी इस कार्य में शामिल होने के लिए मनाया। अंत में, याज ने द्रोणाचार्य के विनाशक पुत्र को उत्पन्न करने की प्रतिज्ञा ली और उपयाज ने राजा द्रुपद को उस विशेष यज्ञ की विधि समझाई।

द्रुपद की रानी के हविष्‍य ग्रहण में की गई देरी से वेदी से उत्पन्न हुई द्रौपदी

कथनानुसार सारी व्यवस्था की। हवन के अंत में याज ने द्रुपद की रानी को आज्ञा दी कि पृषत की पुत्रवधु, महारानी, शीघ्र मेरे पास हविष्‍य ग्रहण करने के लिए आओ। तुम्‍हें एक पुत्र और एक कन्‍या की प्राप्ति होने वाली है। वे कुमार और कुमारी अपने पिता के कुल की वृद्धि करने वाले होंगे।

याज के बुलाने पर रानी से कहा कि हे ब्रह्मन्.. अभी मेरे मुख में ताम्बूल आदि का रंग लगा है। मैं अपने अंगों में दिव्‍य सुगन्धित अंगराग धारण कर रही हैं। इसलिए मुंह धोए और स्‍नान किए बिना पुत्रदायक हविष्य का स्पर्श करने के योग्य नहीं हूं, इसलिए याज जी! मेरे इस प्रिय कार्य के लिए थोड़ी देर ठहर जाये।

याज ने कहा कि इस हविष्‍य को स्‍वयं याज ने पकाकर तैयार किया है और उपयाज ने इसे अभिमंत्रित किया है। इसलिए तुम आओ या वहीं खड़ी रहो, यह हविष्‍य यजमान की कामना को पूर्ण कैसे नहीं करेगा?

ऐसे हुआ द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न जन्म

ऐसा कहकर याज ने उस संस्कार युक्त हविष्य की आहुति ज्‍यों ही अग्नि में डाली। वैसे ही यज्ञ की वेदी देवता के समान तेजस्वी एक कुमार प्रकट हुआ। उसके अंगों की कान्ति अग्नि की ज्वाला के समान उद्भासित हो रही थी। उसका रूप भय उत्पन्न करने वाला था। उसके माथे पर किरीट सुशोभित था। उसने अंगों में उत्तम कवच धारण कर रखा था। हाथों में खड्ग, बाण और धनुष धारण किये वह बार-बार गर्जना कर रहा था। वह कुमार उसी समय एक श्रेष्ठ रथ पर जा चढ़ा, मानो उसके द्वारा युद्ध के लिये यात्रा कर रहा हो। यह देखकर पांचालों को बड़ा हर्ष हुआ। उस समय हर्षोल्लास से भरे हुए इन पांचालों का भार यह पृथ्‍वी नहीं सह सकी।
 
आकाश में कोई अदृश्‍य महाभूत इस प्रकार कहने लगा कि यह राजकुमार पांचालों के भय को दूर करके उनके यश की वृद्धि करने वाला होगा। यह राजा द्रुपद का शोक-दूर करने वाला है। द्रोणाचार्य के वध के लिए ही इसका जन्‍म हुआ है।

ऐसे हुई द्रौपदी का जन्म

राजकुमार धृष्टद्युम्न  के जन्म के बाद यज्ञ की वेदी में से एक कुमारी कन्या भी प्रकट हुई, जो पांचाली कहलाई। वह बड़ी सुन्‍दरी एवं सौभाग्य शालिनी थी। उसका एक-एक अंग देखने ही योग्‍य था। उसकी श्‍याम आंखें बड़ी-बड़ी थीं। उसके शरीर की कान्ति श्‍याम थी। नेत्र ऐसे जान पड़ते मानो खिले हुए कमल के दल हों। केश काले-काले और घुंघराले थे। नख उभरे हुए और लाल रंग के थे। भौंहें बड़ी सुंदर थीं। दोनों उरोज स्‍थूल और मनोहर थे। वह ऐसी जान पड़ती मानो साक्षात देवी दुर्गा ही मानव शरीर धारण करके प्रकट हुई हों। उसके अंगों से नील कमल की सी सुगन्‍ध प्रकट होकर एक कोस तक चारों ओर फैल रही थी। उसने परम सुन्दर रूप धारण कर रखा था। उस समय पृथ्‍वी पर उसके-जैसी सुन्‍दर स्‍त्री दूसरी नहीं थी। देवता, दानव और यक्ष भी उस देवोपम कन्या को पाने के लिये लालायित थे।

द्रुपद की रानी ने मांगा ये वरदान

उन दोनों पुत्र और पुत्री को देखकर पुत्र की इच्‍छा रखने वाली राजा पृषत की पुत्रवधू महर्षि याज की शरण में गई और बोली कि  भगवान अब आप ऐसी कृपा करें, जिससे ये दोनों बच्चे मेरे सिवा और किसी को अपनी माता न समझें।

तब राजा का प्रिय करने की इच्‍छा से याज ने कहा कि ऐसा ही होगा। उस समय सम्‍पूर्ण द्विजों ने सफल-मनोरथ होकर उन बालकों के नामकरण किये।