Mahabharat Katha In Hindi: महाभारत में धृतराष्ट्र, पांडू और विदुर भाई-भाई थे। तीनों के जैविक पिता वेद व्यास थे। लेकिन माताएं अलग-अलग थी। विदुर दासी पुत्र थे। इसीलिए वे भीष्म पितामह से युद्ध कला नहीं सीख सकते थे। लेकिन वे बहुत बुद्धिमान और विद्वान के साथ धर्म के रक्षक थे।उन्होंने शास्त्रों, वेदों और राजनीति का बहुत अच्छा ज्ञान था। उन्हीं की सलाह की वजह से पांडवों की कई बार जान बची थी। आइए जानते हैं किस कारण व्यास जी का पुत्र होने के बावजूद भीष्म पितामह से युद्ध कला नहीं सीख सकते थे। जानें महाभारत के आदिपर्व में दी गई विदुर जी की संपूर्ण जन्म कथा…
आपने पिछले आर्टिकल में पढ़ा था कि राजा शांतनु की पत्नी सत्यवती ने अपने पुत्र महर्षि व्यास को कुरु वंश का कुल आगे बढाने के लिए बुलाया गया, जिससे तीन संतानों का जन्म हुआ धृतराष्ट्र, पांडू और विदुर के बारे में। आपने धृतराष्ट और पांडु राजा के बारे में पढ़ा कि कैसे धृतराष्ट जन्मे से अंधे और पांडु को ‘पांडु रोग’ हुआ था। जब माता सत्यवती को पता चला कि उनके दोनों पोतों को कोई न कोई समस्या है, तो उन्होंने फिर एक और पुत्र की इच्छा व्यक्त की, जिसे व्यास जी ने स्वीकार कर लिया। ऐसे में विदुर का जन्म हुआ।
ऐसे हुआ था विदुर जी का जन्म
महाभारत के आदिपर्व में विदुर जी के जन्म की दी गई कथा के अनुसार, कुछ समय पश्चात जब पुनः ऋतुकाल आया, तो सत्यवती ने अपनी बड़ी बहू अंबिका को फिर से व्यासजी के पास जाने के लिए कहा। लेकिन अंबिका महर्षि के कठोर रूप और गंध को याद करके भयभीत हो गई और उसने स्वयं जाने के स्थान पर अपनी एक सुंदर दासी को अपने आभूषणों से सजा कर उनके पास भेज दिया।
जब महर्षि व्यास वहां पहुंचे, तो उस दासी ने आदरपूर्वक उनका स्वागत किया, प्रणाम किया और विनम्रता से उनकी सेवा की। उसके व्यवहार से व्यासजी अत्यंत प्रसन्न हुए। संयोग के पश्चात उन्होंने उससे कहा कि अब तुम दासी नहीं रहोगी। तुम्हारे गर्भ से एक श्रेष्ठ, धर्मात्मा और बुद्धिमान पुत्र उत्पन्न होगा। यही बालक आगे चलकर विदुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
विदुर, व्यासजी के पुत्र थे और इस प्रकार धृतराष्ट्र तथा पांडु के भाई बने। वे अत्यंत धर्मज्ञ, न्यायप्रिय और काम-क्रोध से रहित थे। माना जाता है कि महात्मा मांडव्य के शाप के कारण स्वयं धर्मराज ने ही विदुर के रूप में जन्म लिया था।
बाद में व्यासजी ने सत्यवती को यह भी बताया कि अंबिका ने छल करके अपनी दासी को उनके पास भेजा था, इसलिए दासी के गर्भ से ही पुत्र उत्पन्न हुआ। इस प्रकार व्यासजी ने मातृ आज्ञा का पालन करते हुए अपना कर्तव्य पूरा किया और सत्यवती को सब कुछ बताकर वहां से अंतर्धान हो गए।
इस प्रकार विचित्रवीर्य की वंश परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए व्यासजी से तीन पुत्र उत्पन्न हुए—धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर। जो देवतुल्य तेजस्वी थे और आगे चलकर कुरुवंश के विस्तार का कारण बने।
विदुर जी ने महाभारत में निभाई थी अहम भूमिका
विदुर जी को धर्म का प्रतीक और नीति-ज्ञान का श्रेष्ठ ज्ञाता माना जाता है। ऐसे में वह जब हस्तिनापुर के प्रधानमंत्री थे, तो उन्होंने हमेशा धर्म के साथ खड़ा पाया गया। इसी के चलते उन्होंने कई बार धृतराष्ट्र को सही सलाह दी। उस समय भी सलाह दी जब दुर्योधन और कौरवों द्वारा पांडवों के प्रति अन्याय किया जा रहा था। विदुर जी ने बार-बार युद्ध रोकने की भी कोशिश की। फिर वह धर्म की रक्षा के लिए पांडवों के सलाहकार बनें और महाभारत में धर्म और अधर्म के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास करते रहे। उन्होंने दुर्योधन के की जा रही साजिशों के बारे में कई बार पांडवों को आगाह भी किया था।
विदुर पूर्व जन्म में थे धर्मराज यमराज
महाभारत के ‘उद्योग पर्व’ में विदुर के जन्म और उनके “धर्मराज यम” के अंश होने का संकेत मिलता है। महाभारत काल में हस्तिनापुर के प्रधानमंत्री विदुर को पूर्व जन्म में यमराज माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार,आर्यावर्त में एक समय सुकर्ण नामक राजा का शासन था। उसी दौरान एक चोर ने राजा के महल में घुसकर शाही खजाना चुरा लिया और भागने लगा। जब सैनिकों ने उसे पकड़ने का प्रयास किया तो वह भागते-भागते माण्डव्य मुनि की कुटिया में पहुंचा। वहां उसने चोरी का धन छिपा दिया और मौके से फरार हो गया।
कुछ ही समय बाद सैनिक वहां पहुंचे और उन्हें वह धन मुनि की कुटिया में मिला। उन्होंने बिना जांच-पड़ताल के माण्डव्य मुनि को ही चोर समझ लिया और बंदी बना लिया। जब उन्हें राजा सुकर्ण के सामने पेश किया गया, तो मुनि ने बार-बार अपनी निर्दोषता साबित करने की कोशिश की, लेकिन किसी ने उनकी बात पर विश्वास नहीं किया। अंततः राजा ने भी बिना सही जांच के उन्हें मृत्यु दंड देने का आदेश दे दिया और सैनिकों ने उसी क्षण माण्डव्य मुनि को फांसी पर चढ़ा दिया। सूली पर लंबे समय तक जीवित रहने के बाद उन्होंने यमराज को ‘शूद्र’ के रूप में जन्म लेने का श्राप दिया, जिसके कारण यमराज ने विदुर के रूप में अवतार लिया। इसका मूल प्रसंग महाभारत के अनुशासन पर्व में माण्डव्य उपाख्यान में मिलता है।
यमराज ने जब माण्डव्य ऋषि को दंड दिया, तब ऋषि ने क्रोधित होकर यम से कहा:
“नाहं शूद्रेषु पापं वा कृतवान् किंचिदपि क्वचित्।
अज्ञातकृतमेतद् यत् त्वया मम कृतं दण्डम्॥”
अर्थ- जब मैंने कोई पाप नहीं किया, फिर भी मुझे अज्ञानवश दंड दिया गया है।)
इसके बाद माण्डव्य ऋषि यमराज को श्राप देते हैं कि त्वं मनुष्यत्वमाप्नोषि शूद्रयोनौ महाद्युते। यानी हे यम, तुम मनुष्य योनि में जन्म लोगे। इसके बाद ही उन्होंने विदुर के रूप में जन्म लिया था।
डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। जनसत्ता इन कथाओं की ऐतिहासिकता या वैज्ञानिक प्रमाण की पुष्टि नहीं करता है।
