Dharm Gatha, Mahabharat Katha: महाभारत का युद्ध केवल शस्त्रों का नहीं, बल्कि साधना और दैवीय शक्तियों का भी संगम था। जब दुर्योधन से चौसर में हारकर पांडव वनवास का कष्ट भोग रहे थे। तब आने वाले धर्मयुद्ध के लिए पांडवों को तैयार होना बेहद जरूरी था। ऐसे में महाप्रतापी अर्जुन भी कुल का मोह और धर्म युद्ध में विजय होने के लिए वेद व्यास के कहने पर शिव की आराधना आरंभ की थी। अपनी शक्ति को सिद्ध करने के लिए स्वयं महादेव की कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ा। यह गाथा है ‘किरातेश्वर महादेव’ और अर्जुन के उस अद्भुत युद्ध की, जहां एक भक्त ने अनजाने में अपने ही आराध्य पर प्रहार कर दिया और बदले में उसे ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली ‘पाशुपत अस्त्र’ प्राप्त हुआ। आइए ‘धर्म गाथा‘ श्रृंखला में आज जानते हैं महादेव द्वारा अर्जुन की ली परीक्षा और उन्हें दिए हुए अस्त्र से लेकर किरातेश्वर महादेव अवतार के बारे में….
शिव पुराण शतरुद्र संहिता में किरातेश्वर महादेव अवतार और पांडव पुत्र अर्जुन को मिले शस्त्र के बारे में विस्तार से बताया गया है। कथा के अनुसार, महामुनि व्यास और श्री कृष्ण के कहने पर पांडवों ने शिवजी की आराधना शुरू कर दी। वहीं अर्जुन इंद्रकील नामक पर्वत के पास गंगा नदी के तट पर जाकर महादेव की आराधना करने लगे थे। वह महामुनि व्यास जी द्वारा बताई गई विधि से शिवजी की उपासना कर रहे थे।
अर्जुन की तपस्या भंग करने के लिए दुर्योधन से भेजा राक्षस
अर्जुन लगातर महादेव की तपस्या कर रहे थे। उनकी इस तपस्या से उनके तप का तेज से तजी से बढ़ने लगा और वह रौद्र रूप धारण करने की वाला है। अर्जुन सूर्य की ओर मुखकर करके एक पैर में खड़े होकर शिव के पंचाक्षर मंत्र ‘ऊं नम: शिवाय:’ मंत्र का जाप करना शुरू कर दिया। ऐसे में पआणी से लेकर देवता भी परेशान होने लगे। वहीं दूसरी ओर दुर्योधन को भी अर्जुन के इस तपस्या के बारे के पता, तो उसने एक मूक दैत्य को अर्जुन के पास शूकर का भेष धारण करके भेजा।
वह राक्षस काफी उत्पाद मचाता हुआ अर्जुन के पास आ रहा था। ऐसे में अर्जुन का मन अचानक से भ्रमित होने लगा। उन्होंने पलटकर देखा, तो बिल्कुल नजदीक वह शूकर खड़ा। ऐसे में अर्जुन ने मन ही मन सोचा कि जिसे देखकर मन व्याकुल हो, वह अवश्य ही हमारा शत्रु होता है। यह विचार मन में आते ही अर्जुन को दुर्योधन का छल-कपट याद आ गया।
शिव जी ने अर्जुन की रक्षा व परीक्षा के लिए रखा किरातेश्वर महादेव का अवतार
अर्जुन ने वहीं बैठे-बैठे उस पर बाण चला दिया। उसी समय स्वयं भगवान शिव भी अपने भक्त अर्जुन पर आए संकट को देखकर उनकी रक्षा व परीक्षा हेतु तुरंत वहां आ गए और उन्होंने भी उस बहुरूपिए राक्षस पर अपना बाण चला दिया। उस समय महादेव ने एक भील का वेश धारण किया हुआ था। उनके शरीर में श्वेत धारियां थीं और वह कच्छ बांधे हुए थे। उनके कमर पर तरकश और हाथ में धनुष बाण था और वे भी उसी शूकर का पीछा कर रहे थे।
अर्जुन-शिव जी के बाणों से मारा गया दुष्ट राक्षस
भीलरूपी भगवान शिव और अर्जुन दोनों ने एक साथ शूकर रूपी दैत्य को निशाना बनाया। शिवजी का बाण उसकी पूंछ में और अर्जुन का बाण उसके मुख में लगा। इस भयंकर आघात से वह सहन नहीं कर सका और तुरंत धरती पर गिर पड़ा। सभी देवताओं ने भगवान शिव की जय-जयकार की। अर्जुन ने सोचा कि यह दैत्य उसे मारने आया था, लेकिन भगवान शिव ने उनकी रक्षा की और उन्हें सद्बुद्धि प्रदान कर उसे मारने का साहस दिया। अर्जुन ने भगवान शिव के चरणों में प्रणाम किया और भक्ति भाव से उनकी स्तुति आरंभ की।
बाणों को लेकर किरात-अर्जुन के बीच हुआ विवाद
जब भीलरूपी शूकर भगवान शिव और अर्जुन के बाणों से मारा गया और पृथ्वी पर गिर पड़ा। ऐसे में एक ओर अर्जुन हाण लेने आ हे थे, तो दूसरी और शिवजी ने अपने एक सेवक को भेजकर उस शूकर से बाण निकालने को कहा। अर्जुन भी अपने बाण लेने आए। तभी बाणों को लेकर अर्जुन और शिवगण में विवाद शुरू हुआ। गण ने कहा कि ये बाण मेरे स्वामी के हैं, इसलिए इन्हें मुझे दे दो। अर्जुन ने मना कर दिया। गण ने चुनौती दी कि यदि तुम सच्चे तपस्वी हो तो बाण दिखाओ, मैं अपने बाण की पहचान कर लूंगा।
अर्जुन ने शांति से उत्तर दिया कि वह युद्ध समान योद्धा से करते हैं और बाण को लेकर झूठे विवाद में नहीं पड़ेंगे। उन्होंने कहा कि यदि गण अपनी बात जानना चाहते हैं तो अपने स्वामी को भेजें। यह सुनकर गण किरात रूप धारण किए भगवान शिव के पास गया और अर्जुन की बात बताई।
भगवान शिव ने अर्जुन की ली परीक्षा
किरातेश्वर शिव ने अपनी सेना के साथ युद्ध भूमि में आकर फिर अपने दूत को अर्जुन के पास भेजा। दूत ने कहा कि इतनी विशाल सेना है, एक बाण के लिए अपनी जान क्यों जोखिम में डालो। बाण हमें दे दो और अपनी रक्षा करो। अर्जुन ने क्रोध से कहा कि वे अपने कुल को कलंक नहीं लगने देंगे और युद्ध से पीछे नहीं हटेंगे। “शेर कभी गीदड़ से नहीं डरते। क्षत्रिय युद्ध से डरते नहीं, बल्कि शत्रुओं को परास्त करते हैं।”
यह सुनकर दूत अपने स्वामी के पास वापस गया और अर्जुन की भक्ति, निडरता और अडिगता बताई। लीलाधारी शिव अर्जुन की विशेषताएं देखकर प्रसन्न हुए और अपनी सेना के साथ युद्धभूमि की ओर बढ़े। ऐसे में दोनों के बीच बाणों की वर्षा होने लगी।
अर्जुन ने अपने तीव्र बाणों महादेव जी पर हमला कर दिया परंतु वे शिवजी का कुछ न बिगाड़ सके। उनका एक भी बाण शिवजी तक नहीं पहुंचता था। यह सब देखकर देवाधिदेव भगवान शिव हंस रहे थे। जब अर्जुन ने देखा कि वह किसी भी प्रकार से उस किरात को अपने वश में नहीं कर पा रहे हैं तो उन्होंने भगवान शिव की स्तुति की।
अर्जुन की स्तुति के प्रभाव ने शिव ने दिए उन्हें दर्शन
अर्जुन की स्तुति से तुरंत ही त्रिलोकीनाथ, भक्तवत्सल, कल्याणकारी शिवजी ने अपने अद्भुत स्वरूप के साक्षात दर्शन अर्जुन को कराए। उन्हें देखकर अर्जुन धन्य हो गए और प्रसन्न होकर पल भर उन्हें देखते ही रह गए। तब यह जानकर कि वह किरात कोई और नहीं अपितु स्वयं शिवजी ही थे, उन्हें अपने युद्ध करने और उनका अपमान करने के कारण बहुत लज्जा महसूस हुई। वे अपने आराध्य के चरणों में गिर पड़े।
ऐसे में शिवजी ने उन्हें उठाया और बोले कि अर्जुन दुखी मत हो। ऐसे में अर्जुन ने हाथ जोड़कर भगवान शिव की स्तुति करने लगे और कहा कि हे महादेव जी! आपने इस प्रकार मुझसे रूप बदलकर युद्ध क्यों किया? मैंने आपका भक्त होते हुए भी आपका अपमान किया है। स्वामी! मुझे माफ कर दीजिए और मेरा कल्याण कीजिए।
अर्जुन को भगवान शिव ने दिया वरदान और अस्त्र
अर्जुन के वचनों से महेश्वर प्रसन्न हो गए और बोले कि अर्जुन दुखी मत हो । मेरे द्वारा प्रेरित होने पर ही तुमने युद्ध किया था। इसलिए यह तुम्हारा अपराध नहीं धर्म था। मैं तुम पर प्रसन्न हूं। कहो पुत्र ! किस कारण से तुम इतनी घोर तपस्या और साधना कर रहे थे। मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करने का वचन देता हूं। शिवजी के ऐसे वचन सुनकर अर्जुन ने शिवजी की स्तुति आरंभ कर दी।
स्तुति से प्रसन्न होकर शिव जी ने कहा कि हे अर्जुन। तुम अपनी सारी चिंताएं त्याग दो। तुम्हारे कुल का कल्याण अवश्य होगा। तुम्हें सब कुछ मिल जाएगा, थोड़ा धैर्य रखो। इसके साथ ही शिवजी ने अर्जुन को अमोघ पाशुपत अस्त्र प्रदान किया। फिर अर्जुन को युद्ध में विजय पाने और शत्रुओं का नाश करने का वर प्रदान किया। इसके साथ ही शिव जी ने अर्जुन की सहायता के लिए श्रीकृष्ण जी को भी सहयोग करने के लिए कहा। तत्पश्चात अर्जुन को आशीर्वाद देकर शिवजी वहां से अंतर्धान हो गए।
डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। जनसत्ता इन कथाओं की ऐतिहासिकता या वैज्ञानिक प्रमाण की पुष्टि नहीं करता है।
