Mahabharat Katha In Hindi: महाभारत की गाथा केवल युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पात्रों के जन्म को लेकर कई रोचक कथाएं भी मौजूद है। ऐसे ही कुरुवंश के दो प्रमुख स्तंभ यानी धृतराष्ट्र और राजा पांडु को माना जाता है। इन दोनों के जन्म की कथा अत्यंत विशिष्ट है। आखिर क्यों धृतराष्ट्र जन्म से अंधे हुए और क्यों पांडु का शरीर पीला पड़ गया? महाभारत के आदिपर्व में वर्णित इन कथाओं में बताया गया है कि कुरुवंश के अस्तित्व को बचाने के लिए जब माता सत्यवती ने महर्षि व्यास का आह्वान किया, तो धृतराष्ट्र और पांडु के रूप में दो प्रतापी पुत्रों का जन्म हुआ। इसके अलावा एक अन्य पुत्र विदुर का जन्म भी व्यास और अंबिका की दासी के द्वारा हुआ था।

धृतराष्ट्र और पांडु दोनों के जन्म के साथ कुछ ऐसी शारीरिक विसंगतियां जुड़ीं, जिन्होंने महाभारत की नींव रख दी। धार्मिक ग्रंथ महाभारत आदिपर्व के के अनुसार, धृतराष्ट्र के अंधे होने और पांडु के ‘पांडुवर्ण’ (पीले रंग) के होने के पीछे माता अंबिका और अंबालिका की एक चूक थी। इन कथाओं से एक महत्वपूर्ण बात बार-बार सामने आती है कि मां के विचार, भावनाएं और कर्म केवल उसके जीवन को ही नहीं, बल्कि उसके गर्भ में पल रहे बच्चे के भविष्य को भी प्रभावित करते हैं। आइए आज ‘धर्म गाथा‘ श्रृंखला में जानते हैं राजा पांडु और धृतराष्ट्र के जन्म की कथा…

महाभारत में अनुसार, माता सत्यवती और राजा शांतनु से दो पुत्र चित्रांगद और विचित्रवीर्य था। लेकिन सत्यवती ने विवाह से पूर्व ऋषिवर पराशर से एक पुत्र उत्पन्न किया था, जो महर्षि व्यास थे। महर्षि वेद व्यास को भगवान विष्णु का अवतार और चिरंजीवी (अमर) माना जाता है। जबकि चित्रांगद गंधर्व युद्ध में मारे गए और विचित्रवीर्य की मृत्यु क्षय रोग (टीबी) से हुई थी। ऐसे में वंश बचाने हेतु नियोग द्वारा धृतराष्ट्र और पांडु का जन्म हुआ।

माता सत्यवती ने महर्षि व्यास से ली थी मदद

महाभारत ग्रंथ आदिपर्व में धृतराष्ट्र और राजा पांडु  के जन्म से संबंधित कथा वर्णित है। इस कथा के अनुसार, हस्तिनापुर के राजा शांतनु की पत्नी सत्यवती ने महर्षि व्यास से कहा कि उनके पुत्र संतान उत्पन्न करने और राज्य चलाने में असमर्थ रहे, इसलिए कुल की परंपरा को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि वे अपनी देवरानियों (अंबिका और अंबालिका ) के गर्भ से योग्य संतानों को जन्म दें। उन्होंने यह भी कहा कि यह कार्य केवल पारिवारिक ही नहीं, बल्कि धर्म और लोक कल्याण से जुड़ा हुआ है।

इस पर व्यासजी ने उत्तर दिया कि वे धर्म के अनुसार ही वह बिना किसी काम भावना के इस कर्तव्य को निभाएंगे। उन्होंने यह भी बताया कि विचित्रवीर्य की पत्नियों अंबिका और अंबालिका को पहले एक वर्ष तक संयम और व्रत का पालन करना चाहिए, तभी वे इस योग्य होंगी।

लेकिन माता सत्यवती ने तत्काल परिस्थिति की गंभीरता को बताते हुए आग्रह किया कि राज्य बिना राजा के असुरक्षित हो रहा है। प्रजा दुखी है, धर्म-कर्म बाधित हो रहे हैं और व्यवस्था बिगड़ रही है। इसलिए उन्होंने व्यासजी से शीघ्र ही संतान उत्पन्न करने का अनुरोध किया और कहा कि आगे चलकर भीष्म उन बच्चों का पालन-पोषण कर लेंगे।

इस पर व्यास जी ने कहा कि यदि तुरंत यह कार्य करना है, तो स्त्रियों को उनके कठोर और असामान्य रूप को देखकर विचलित नहीं होना चाहिए। विशेष रूप से उन्होंने कहा कि यदि अंबिका बिना भय के उन्हें स्वीकार कर ले, तो वह उसी समय एक श्रेष्ठ पुत्र को जन्म दे सकती है।

इसके बाद व्यास जी वहां से अंतर्धान हो गए। तब सत्यवती ने एकांत में जाकर अंबिका को समझाया कि भरतवंश का अस्तित्व संकट में है और उसके पुनरुद्धार की जिम्मेदारी उसी पर है। उन्होंने धर्म और कुल-हित का हवाला देते हुए उसे इस कार्य के लिए तैयार किया और कहा कि वह इंद्र के समान तेजस्वी पुत्र को जन्म दे, जो आगे चलकर राज्य की बागडोर संभालेगा। अंबिका धर्मपरायण थी, इसलिए सत्यवती ने उसे समझा-बुझाकर किसी प्रकार इस कार्य के लिए राजी कर लिया। इसके पश्चात उन्होंने ब्राह्मणों, देवर्षियों और अतिथियों का आदरपूर्वक सत्कार और भोजन कराया।

इस कारण धृतराष्ट्र पैदा हुए अंधे

इसके बाद सत्यवती ने उचित समय पर अपनी ऋतुस्नाता पुत्रवधू को शय्या पर बैठाते हुए समझाया कि पुत्री, तुम्हारे एक देवर हैं। आज वे ही गर्भाधान के लिए तुम्हारे पास आएंगे। तुम सावधानीपूर्वक उनकी प्रतीक्षा करना, वे आधी रात को यहां पहुंचेंगे।”

सास की आज्ञा पाकर वह पवित्र शय्या पर लेट गई और मन ही मन भीष्म तथा अन्य श्रेष्ठ कुरुवंशियों का स्मरण करने लगी। उसी समय संयमित मन वाले महर्षि व्यास वहां आए। उनका रूप अत्यंत प्रभावशाली किंतु कठोर था श्याम वर्ण, पिंगल जटाएं, तेजस्वी नेत्र और भूरी दाढ़ी-मूंछ। उन्हें देखकर वह भयभीत हो गई और डर के मारे अपनी आंखें बंद कर लीं।

माता की इच्छा पूर्ण करने के लिए व्यास जी ने उसके साथ नियोग विधि से संयोग किया, परंतु वह भय के कारण उनकी ओर देख भी न सकी। इसके बाद व्यासजी बाहर आए, तो सत्यवती ने उनसे पूछा कि क्या इससे कोई गुणवान पुत्र उत्पन्न होगा?”

व्यास जी ने उत्तर दिया कि मां, इससे एक अत्यंत बलवान, बुद्धिमान और पराक्रमी पुत्र जन्म लेगा, जिसके सौ पुत्र होंगे। किंतु माता के इस दोष के कारण वह जन्म से अंधा होगा।

यह सुनकर सत्यवती ने कहा कि कुरुवंश का राजा अंधा होना उचित नहीं है, इसलिए एक और योग्य पुत्र की व्यवस्था करें। व्यास जी ने ‘तथास्तु’ कहकर सहमति दी। समय आने पर अंबिका ने एक अंधे पुत्र को जन्म दिया।

इस कारण राजा पांडु का रंग था पीला

माता सत्यवती ने अपनी दूसरी पुत्रवधू को तैयार किया और पुनः व्यास जी को बुलाया। जब व्यासजी उसके पास पहुंचे, तो उनके रूप को देखकर वह भय और उदासी से पीली पड़ गई। तब व्यासजी ने कहा कि तुम मुझे देखकर पांडुवर्ण की हो गई हो, इसलिए तुम्हारा पुत्र भी पांडुवर्ण का होगा और उसका नाम ‘पांडु’ होगा।

इस प्रकार कहकर व्यास जी वहां से चले गए। बाद में सत्यवती ने फिर एक और पुत्र की इच्छा व्यक्त की, जिसे व्यास जी ने स्वीकार कर लिया।

इसके बाद उचित समय आने पर देवी अंबालिका ने एक पांडुवर्ण (पीले रंग) के तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जो दिव्य आभा से युक्त था। यही बालक आगे चलकर पांडु कहलाया, जिसके पुत्र महान धनुर्धर पांच पांडव (युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, और सहदेव) बने।

डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। जनसत्ता इन कथाओं की ऐतिहासिकता या वैज्ञानिक प्रमाण की पुष्टि नहीं करता है।