Dhrma Gatha, Mahabharat Katha: महाभारत के महान योद्धा दानवीर कर्ण साहस, संघर्ष और अटूट मित्रता का प्रतीक माना जाता हैं। सूर्य देव और माता कुंती के पुत्र होने के बावजूद उनका पूरा जीवन अपनी पहचान और सम्मान की लड़ाई में बीता। एक महान धनुर्धर और परशुराम के शिष्य होने के साथ-साथ, उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनकी असीमित दानवीरता थी। अपनी मृत्यु के बात जानते हुए भी उन्होंने अपने इंद्र को अपने जन्मजात कवच-कुंडल दान कर दिए। दुर्योधन के प्रति उनकी निष्ठा मित्रता की एक अनूठी मिसाल है, जहां उन्होंने जानते हुए भी कि अधर्म की हार निश्चित है, केवल कृतज्ञता और वचन निभाने के लिए पांडवों के विरुद्ध युद्ध किया। कुरुक्षेत्र के मैदान में श्राप और नियति के जाल में उलझ कर वीरगति प्राप्त कर गए। आइए जानते हैं आप ‘धर्म गाथा’ श्रृंखला में महादानी कर्ण के बारे में जिन्हें अजेय का वरदान होने के बावजूद एक श्राण उनकी मृत्यु का कारण बन गया..

कर्ण को पहला वरदान उनको जन्म के साथ ही भगवान सूर्यदेव ने दिया था।  महाभारत के आदिपर्व के गर्भाधान प्रसंग में दिया गया है। इसके अनुसार, माता कुंती को दुर्वासा ऋषि ने एक वशीकरण का मंत्र दिया था उन्होंने कुंती से कहा कि इस मंत्र के द्वारा जिस देवता का आवाहन करोगी, उसी-उसी के अनुग्रह से तुम्‍हें पुत्र प्राप्त होगा। ब्रह्मर्षि दुर्वासा के यों कहने पर कुंती के मन में बड़ा कौतूहल हुआ और उन्होंने मंत्र की परीक्षा के लिये सूर्य देव का आवाहन किया। इसके बाद कुंती से सूर्यदेव ने समझाते हुए कई बातें की, क्योंकि वह उस समय कुंवारी कन्या थी।  

पहला वरदान-  कर्ण का जन्म और कवच-कुंडल

सूर्यदेव ने कुंती से कहा कि सुन्दर मुख एवं सुंदर भौहों वाली राजकुमारी! तुम्‍हारे लिए जैसे पुत्र का निर्माण होगा। वह माता अदिति के दिए हुए दिव्‍य कुंडलों और मेरे कवच को धारण किये हुए उत्पन्न होगा। उसका वह कवच किन्हीं अस्त्र-शस्त्रों से टूट न सकेगा। उसके पास कोई भी वस्‍तु ब्राह्मणों के लिए अदेय न होगी। मेरे कहने पर भी वह कभी अयोग्‍य कार्य या विचार को अपने मन में स्‍थान न देगा। । ब्राह्मणों के याचना करने पर वह उन्‍हें सब प्रकार की वस्तुएं देगा ही। साथ ही वह बड़ा स्‍वाभिमानी होगा। रानी! मेरी कृपा से तुम्‍हें दोष भी नहीं लगेगा।

श्लोक

ददामि तुभ्यं कवचं कुण्डलाभ्यां समन्वितम्।
अभेद्यं सर्वशस्त्राणां पुत्र ते भविष्यति ध्रुवम्॥
ब्राह्मणेषु च याचितः सर्वं दास्यति नित्यशः।
न चास्य कश्चिद् दोषो वै मम प्रसादात् भविष्यति॥”

कुंती-राजकुमारी कुंती से यों कहकर प्रकाश और गर्मी उत्पन्न करने वाले भगवान् सूर्य ने उसके साथ समागम किया इससे उसी समय एक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सम्‍पूर्ण शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ था। उसने जन्‍म से ही कवच पहन रखा था और वह देव कुमार के समान तेजस्‍वी तथा शोभा सम्पन्न था। जन्म के साथ ही कवच धारण किये उस बालक का मुख जन्मजात कुंडली में प्रकाशित हो रहा था। इस प्रकार कर्ण नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सब लोकों में विख्यात है।

दूसरा वरदान- देवराज इंद्र का से वासवी शक्ति मिलना

महाभारत ग्रंथ के वनपर्व के अनुसार, जब पांडवों के वनवास के बारह वर्ष बीत गए और तेरहवां वर्ष आरंभ हुआ। तब पांडवों के हितकारी इंद्र कर्ण से कवच-कुंडल मांगने को उद्यत हुए। कुंडल के विषय में देवराज इंद्र का मनोभाव जानकर भगवान सूर्य ने सपने में कर्ण को सचेत किया कि किसी भी कारण वह इंद्र को कुंडल और कवच न दें। इस बात पर कर्ण ने सूर्यदेव से कहा कि  आकाश में विचरण करने वाले सूर्यदेव से कर्ण कहते हैं कि यदि पांडवों के हित के लिए देवराज इंद्र ब्राह्मण का रूप लेकर भिक्षा मांगने आए, तो वह उन्हें अपने दोनों कुंडल और दिव्य कवच अवश्य दे देंगे, क्योंकि उनकी दृष्टि में जीवन से अधिक महत्वपूर्ण कीर्ति है। वे मानते हैं कि वीर पुरुष के लिए यश की रक्षा हेतु प्राण त्याग देना उचित है, जबकि अपयश के साथ जीवन जीना व्यर्थ है। यदि सुयश के साथ मृत्यु भी मिले, तो वह गौरवपूर्ण होती है। वे यह भी कहते हैं कि यदि इंद्र जैसे देवता भी उनसे कुंडल आएं, तो वे बिना संकोच उन्हें दान देंगे, क्योंकि इससे उनकी कीर्ति और बढ़ेगी। इसके बाद सूर्य और कर्ण के बीच काफी संवाद हुआ।

अंत में सूर्यदेव ने कहा कि यदि तुम इंद्र को ये दोनों सुन्दर कुंडल  दे रहे हो, तो तुम भी उन महाबली इंद्र  से अपनी विजय के लिये कोई अस्त्र मांग लेना और उनसे स्पष्ट कह देना कि देवराज! मैं एक शर्त के साथ ये दोनों कुंडल आपको दे सकता हूँ। कर्ण! इन दोनों कुंडलों से युक्त रहने पर तुम सभी प्राणियों के लिये अवध्य बने रहोगे। इंद्र युद्ध में अर्जुन द्वारा तुम्हारा विनाश चाहते हैं। इसलिए वे तुम्हारे दोनों कुंडलों को हर लेने की इच्छा करते हैं। अतः तुम भी उनकी आराधना करके बारंबार मीठे वचन बोलकर देवराज इंद्र से किसी अमोघ अस्त्र के लिये प्रार्थना करना। अपने पिता सूर्य के द्वारा बताए गई बातों को ध्यान रखकर वह इंद्रदेव की प्रतीक्षा करने लगे।

फिर वह समय आ गया जब देवराज को ब्राह्मण के छद्मवेष में छिपकर आये देख कर्ण ने कहा कि यदि तुम सत्यव्रती हो, तो ये जो तुम्हारे शरीर के साथ उत्पन्न हुए कवच और कुण्डल हैं, इन्हें काटकर मुझे दे दो। फिर उन्होंने कि कवच तो मेरे शरीर के साथ ही उत्पन्न हुआ है और दोनों कुंडल भी अमृत से प्रकट हुए हैं। इन्हीं के कारण मैं संसार में अवध्य बना हुआ हूं। अतः मैं इन सब वस्तुओं को त्याग नहीं सकता। इंद्र समझ गए कि सूर्यदेव ने कर्ण को मेरे यहां आने के बारे में बता दिया है। तब इंद्र मे कहा कि तुम मुझे अपने दोनों कुण्डल और सहज कवच दे दो और मेरी यह शक्ति ग्रहण कर लो। इसी शर्त के अनुसार हम लोगों में इन वस्तुओं का विनिमय (बदला) हो जाये। दैत्यों का संहार करते समय मेरे हाथ से छूटने पर यह अमोघ शक्ति सैंकड़ों शत्रुओं को मार देती है और पुनः मेरे हाथ में चली आती है। वही शक्ति तुम्हारे हाथ में जाकर किसी एक तेजस्वी, ओजस्वी, प्रतापी तथा गर्जना करने वाले शत्रु को मार के पुनः मेरे पास आ जायेगी। इस तरह से कण को वासवी शक्ति मिली।

श्लोक

कवचं कुण्डले चैव दत्त्वा शक्राय भारत।
शक्तिं प्राप महातेजा वासवीं नाम भारत॥

अर्थ-
कर्ण ने कवच-कुंडल दान में देकर वासवी शक्ति प्राप्त की।

तीसरा वरदान- परशुराम से मिली ब्रह्मास्त्र की विद्या

महाभारत ग्रंथ के आदिपर्व के अनुसार, कर्ण बचपन से ही महान धनुर्धर बनने की इच्छा रखते थे, लेकिन वे जानते थे कि परशुराम केवल ब्राह्मणों को ही शस्त्र-विद्या सिखाते हैं। इसलिए उन्होंने अपनी पहचान छिपाकर स्वयं को ब्राह्मण बताया और परशुराम से शस्त्र-विद्या प्राप्त की, जिससे वे उनके प्रिय शिष्य बन गए। परशुराम जी ने कर्ण को कई दिव्य अस्त्रों के साथ ब्रह्मास्त्र चलाने की विद्या भी सिखाई।

परशुराम और ब्राह्मण का श्राप बना कर्ण की मृत्यु का कारण

इस श्राप के बारे में महाभारत के आदि पर्व के कर्ण-परशुराम प्रसंग में बताया गया है। इस कथा के अनुसार एक समय की बात है कि एक दिन कर्ण के साथ बात करते हुए परशुराम उनकी की गोद में सिर रखकर सो गए। उसी समय एक कीट कर्ण की जांघ में घुसकर उसे काटने लगा। कर्ण ने गुरु परशुराम की नींद न टूटे, इसलिए दर्द सहते रहें। लेकिन जब परशुराम जागे और उन्होंने खून देखा, तो समझ गए कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं हो सकता। सत्य जानकर उन्होंने कर्ण को श्राप दिया कि जब उसे सबसे अधिक जरूरत होगी, वह अपने अस्त्रों का ज्ञान भूल जाएगा। यहीं महाभारत युद्ध के दौरान कर्ण की मृत्यु का कारण बना। जब कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धंस गया, तब वे दुविधा में अस्त्रों का ज्ञान भूल गए और निहत्थे होने के कारण अर्जुन के बाण का शिकार बन गए थे।

आदि पर्व में वर्णित कर्ण कथा के अनुसार, एक बार अभ्यास के दौरान अनजाने में कर्ण से एक ब्राह्मण की गाय की मृत्यु हो गई। इससे क्रोधित ब्राह्मण ने उसे श्राप दिया कि जिस प्रकार उसकी गाय असहाय अवस्था में मरी, उसी प्रकार समय आने पर कर्ण भी असहाय स्थिति में पड़ जाएगा और उसे मृत्यु का सामना करना पड़ेगा। यही श्राप आगे चलकर कुरुक्षेत्र युद्ध में फलित हुआ, जब कर्ण का रथ का पहिया पृथ्वी में धंस गया और परशुराम के श्राप के कारण वह अपनी अस्त्र-विद्या भी स्मरण नहीं कर सका। इसी असहाय अवस्था में अर्जुन ने उसे पराजित कर दिया।

डिस्क्लेमर: “यह लेख पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। जंसत्ता इन कथाओं की ऐतिहासिकता या वैज्ञानिक प्रमाण की पुष्टि नहीं करता है।