विष्णु पुराण में एक अत्यंत गूढ़ और प्रेरणादायक कथा है। जिसे श्रीमैत्रेय जी ने श्रीपराशर जी को सुनाया था। इस कथा में महाभारत के युद्ध के उपरांत पांडु पुत्र नकुल ने पितामह भीष्म से संसार के सबसे बड़े सत्य के बारे में पूछा था। नकुल ने जानना चाहा कि क्या इस ब्रह्मांड में कोई ऐसा मार्ग है, जिसे अपनाकर मनुष्य जन्म-मरण के चक्र और यमराज की यातनाओं से मुक्त हो सकता है? तब भीष्म पितामह ने उन्हें एक कालिंग देश के ब्राह्मण की कथा सुनाई, जिसमें यमराज और उनके दूतों के बीच हुआ संवाद वर्णित था। यह कथा आज भी हमें बताती है कि कर्म ही वह सूत्र है जो हमें यम के बंधन से मुक्त कर सकता है। ‘धर्म गाथा’ की श्रृंखला में जानते हैं कि उस दिव्य कथा के बारे में जिसे जानकर वैसे ही कर्म करके व्यक्ति यमराज के भी वशीभूत नहीं हो सकता है…
श्री मैत्रेय जी ने श्री पराशर से पूछा ये सवाल
विष्णु पुराण के तृतीय अंश के सातवें अध्याय ‘यमगीता’ में इस बारे में विस्तार से बताया गया है। इसमें श्री मैत्रेय जी स्वयं श्री पराशर जी से पूछते हैं कि हे गुरु। मैंने जो कुछ पूछा था वह सब आपने यथावत वर्णन किया। अब मैं एक बात और सुनना चाहता हूं, वह आप मुझसे कहिए। हे महामुने। सातों द्वीप, सातों पाताल और सातों लोक ये सभी स्थान जो इस ब्रह्मांड के अंतर्गत हैं, स्थूल, सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मातिसूक्ष्म तथा स्थूल और स्थूलतर जीवों से भरे हुए हैं। एक अंगुल का आठवां भाग भी कोई ऐसा स्थान नहीं हैं जहां कर्म-बंधन से बंधे हुए जीव न रहते हो। लेकिन हे भगवन। आयु के समाप्त होने पर ये सभी यमराज के वशीभूत हो जाते हैं और उन्हीं के आदेशानुसार नरक आदि नाना प्रकार की यातनाएं भोगते हैं।
इसके आगे श्री मैत्रेय जी कहते हैं कि तदनन्तर पाप-भोग के समाप्त होने पर वे देवादि योनियों में घूमते रहते हैं। सकल शास्त्रों का ऐसा ही मत है। अत: आप मुझे वह कर्म बताइए जिसे करने से मनुष्य यमराज के वशीभूत नहीं होता। मैं आपसे यही सुनना चाहता हूं।
श्री मैत्रेय जी की बात को सुनकर श्री पराशर जी कहते हैं कि हे मुने। यहीं प्रश्न महात्मा नकुल ने पितामह भीष्म से पूछा था। उसके उत्तर में उन्होंने जो कुछ कहा था वह सुनो।
पुरा ममागतो वत्स सखा कालिङ्कको द्विजः ।
स मामुवाच पृष्टो वै मया जातिस्मरो मुनिः ॥ ९
तेनाख्यातमदं सर्वमित्थं चैतद्भविष्यति ।
तथा च तदभूद्वत्स यथोक्तं तेन धीमता ॥ १०
स पृष्टश्च मया भूयः श्रद्धधानेन वै द्विजः ।
यद्यदाह न तद् दृष्टमन्यथा हि मया क्वचित् ॥ ११
एकदा तु मया पृष्टमेतद्भवतोदितम् ।
प्राह कालिङ्कको विप्रस्मृत्वा तस्य मुनेर्वचः ॥ १२
जातिस्मरेण कथितो रहस्यः परमो मम ।
यमकिङ्करयोर्योऽभूत्संवादस्तं ब्रवीमि ते ॥ १३
भीष्म ने नकुल को सुनाई ये कथा
भीष्म जी ने पांडव पुत्र नकुल से कहा कि हे वत्स, पूर्व काल में मेरे पास एक कालिंग देशीय ब्राह्मण मित्र आया और मुझसे बोला कि मेरे पुछ्ने पर एक जातिस्मर मुनि ने बतलाया था कि ये सब बातें अमुक- अमुक प्रकार ही होगी। उस बुद्धिमान ने जो- जो बातें जिस-जिस प्रकार होने को कही थीं वे सब वैसे ही हुई। इस प्रकार उसमें श्रद्धा हो जाने से मैंने उससे फिर कुछ और भी प्रश्न किए और उनके उत्तर में उस द्विज श्रेष्ठ ने जो-जो बातें बतलाईं उनके विपरीत मैंने कभी कुछ नहीं देखा।
भीष्म आगे कहते हैं कि एक दिन, जो बात तुम मुझसे पूछते हो वही मैंने उस कालिंग ब्राह्मण से पूछी। उस समय उसने उस मुनि के वचनों को याद करके कहा कि उस जातिस्मर ब्राह्मण ने, यम और उनके दूतों के बीच में जो संवाद हुआ था, वह अति गूढ़ रहस्य मुझे सुनाया था। वही मैं तुमसे कहता हूं।
कालिंग ने कहा कि अपने अनुचर को हाथ में पाश लिए देखकर यमराज ने उसके कान में कहा कि भगवान मधुसुदन के शरणागत व्यक्तियों को छोड़ देना क्योंकि मैं वैष्णवों से अतिरिक्त और सब मनुष्यों का ही स्वामी हूं।
देव-पूज्य विधाता ने मुझे ‘यम’ नाम से लोकों के पाप-पुण्य का विचार करने के लिए नियुक्त किया है | मैं अपने गुरु श्री हरि के वशीभूत हूं, स्वतंत्र नहीं हूं। भगवान विष्णु मेरा भी नियन्त्रण करने में समर्थ है।
कालिंग ने आगे कहा कि जिस प्रकार सुवर्ण भेद रहित और एक होकर भी कटक, मुकुट तथा कर्णिका आदि के भेद से नाना रूप प्रतीत होता है उसी प्रकार एक ही हरि का देवता, मनुष्य और पशु आदि नाना-विध कल्पनाओं से निर्देश किया जाता हैं।
जिस प्रकार वायु के शांत होने पर उसमें उड़ते हुए परमाणु पृथ्वी से मिलकर एक हो जाते हैं उसी प्रकार गुण-क्षोम से उत्पन्न हुए समस्त देवता, मनुष्य और पशु आदि उस सनातन परमात्मा से लीन हो जाते हैं। जो भगवान के सुरवरवन्दित चरण-कमलों की परमार्थ-बुद्धि से वन्दना करता है, घृताहुति से प्रज्वलित अग्नि के समान-समस्त पाप-बंधन से मुक्त हुए उस पुरुष को तुम दुर ही से छोडकर निकल जाना ।
क्षितितलपरमाणवोऽनिलान्ते
पुनरुपयान्ति यथैकतां धरित्र्याः ।
सुरपशुमनुजादयस्तथान्ते
गुणकलुषेण सनातनेन तेन ॥ १७
हरिममरवरार्चिताङ्घ्रिपद्मं
प्रणमति यः परमार्थतो हि मर्त्यः ।
तमपगतसमस्तपापबन्धं
व्रज परिहृत्य यथाग्निमाज्यसिक्तम् ॥ १८
कौन हैं वे मनुष्य जो यम के वश में नहीं आते?
यमराज के ऐसे वचन सुनकर यमदूत ने उनसे पूछा कि प्रभो, सबके विधाता भगवान हरि का भक्त कैसा होता है, यह आप मुझसे कहिए।
न चलति निजवर्णधर्मतो यः
सममतिरात्मसुहृद्विपक्षपक्षे ।
न हरति न च हन्ति किञ्चदुच्चैः
सितमनसं तमेवेहि विष्णुभक्तम् ॥ २०
कलिकलुषमलेन यस्य नात्मा
विमलमतेर्मलिनीकृतस्तमेनम् ।
मनसि कृतजनार्दनं मनुष्यं
सततमवेहि हरेरतीवभक्तम् ॥ २१
यमराज कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों से नहीं भटकता, अपने मित्र और शत्रु दोनों के साथ समान व्यवहार करता है, किसी का हक नहीं छीनता और किसी भी जीव को नुकसान नहीं पहुंचाता। ऐसा शांत, साफ और निष्पक्ष मन वाला व्यक्ति ही भगवान विष्णु का सच्चा भक्त होता है।
जिस इंसान का मन बुराइयों और पापों से प्रभावित नहीं हुआ है, और जिसने अपने दिल में भगवान को बसाया हुआ है, उसे भगवान का सच्चा और श्रेष्ठ भक्त माना जाता है।
जो व्यक्ति अकेले में पड़ा हुआ भी किसी दूसरे के धन या सोने को देखकर लालच नहीं करता और उसे तिनके के समान महत्वहीन समझता है, और हमेशा पूरे मन से भगवान का स्मरण करता रहता है। वही सच्चा विष्णु भक्त कहलाता है।
भगवान विष्णु का स्वरूप बिल्कुल स्फटिक (क्रिस्टल) की तरह साफ और पवित्र है, जबकि इंसान के मन में अक्सर राग (लगाव) और द्वेष (नफरत) जैसे दोष होते हैं। जैसे चंद्रमा की ठंडी किरणों में कभी आग की गर्मी नहीं हो सकती, वैसे ही भगवान की शुद्धता में इन बुराइयों की कोई जगह नहीं होती।
ऐसे लोगों के मन में हमेशा विराजते हैं श्री विष्णु
यमराज आगे कहते हैं कि जो व्यक्ति साफ मन वाला हो, ईर्ष्या से मुक्त हो, शांत स्वभाव का हो, अच्छे आचरण वाला हो, सभी जीवों के प्रति मित्रभाव रखता हो, सबका भला चाहता हो और अहंकार या छल-कपट से दूर रहता हो। उसके हृदय में भगवान वासुदेव हमेशा निवास करते हैं।
जब भगवान ऐसे व्यक्ति के हृदय में बसते हैं, तो उसका स्वभाव और व्यक्तित्व भी बहुत कोमल, सुंदर और आकर्षक हो जाता है। जैसे एक नया, हरा-भरा शाल वृक्ष अपने बाहरी सौंदर्य से ही अंदर की ताजगी और रस को प्रकट कर देता है, वैसे ही ऐसा व्यक्ति अपने आचरण और व्यवहार से अपनी अंदरूनी पवित्रता को दिखा देता है।
यमराज ने अपने दूतों को क्या आदेश दिया?
हे दूत ! यम और नियम के द्वारा जिनकी पाप राशि दूर हो गयी हैं, जिनका ह्रदय निरंतर श्री अच्युत में ही आसक्त रहता हैं तथा जिनमें गर्व, अभिमान और मात्सर्य का लेश भी नहीं रहा हैं उन मनुष्यों को तुम दुर ही से त्याग देना। अगर खड्ग, शंख और गदाधारी अव्ययात्मा भगवान हरि ह्रदय में विराजमान हैं तो उन पापनाशक भगवान के द्वारा उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। सूर्य के रहते हुए भला अन्धकार कैसे ठहर सकता हैं ?
ऐसे मनुष्य के हद्य में नहीं विराजते श्री हरि विष्णु
जो पुरुष दूसरों का धन हरण करता हैं, जीवों की हिंसा करता हैं तथा मिथ्या और कटुभाषण करता हैं उस अशुभ कर्मोंन्मत दुष्टबुद्धि के ह्रदय में भगवान अनंत नहीं टिक सकते। जो कुमति दूसरों के वैभव को नहीं देख सकता, जो दूसरों की निंदा करता है, साधुजनों का अपमान करता है तथा न तो श्री विष्णु भगवान की पूजा ही करता हैं और न दान ही देता हैं उस अधम के ह्रदय में श्रीजनार्दन का निवास कभी नहीं हो सकता।
जो दुष्टबुद्धि अपने परम सुह्रद, बंधू-बान्धव, स्त्री, पुत्र, कन्या, पिता तथा भृत्यवर्ग के प्रति अर्थतृष्णा प्रकट करता हैं उस पापाचारी को भगवान का भक्त मत समझो। जो दुर्बुद्धि पुरुष असत्कर्मों में लगा रहता हैं, नीच पुरुषों के आचार और उन्हीं के संग में उन्मत्त रहता हैं तथा नित्यप्रति पापमय कर्मबंधन से ही बंधता जाता है वह मनुष्य के रूप में पशु ही है। वह भगवान वासुदेवका भक्त नहीं हो सकता।
जो व्यक्ति भगवान के चरणों में इस प्रकार पुकारता है, तो उनसे दूर रहना
यह सकल प्रपंच और मैं एक परमपुरुष परमेश्वर वासुदेव ही है, ह्रदय में भगवान अनंत के स्थित होने से जिनकी ऐसी स्थिर बुद्धि हो गयी हो, उन्हें तुम दूर ही से छोडकर चले जान। जो लोग भगवान विष्णु को इस तरह पुकारते हैं तो उन निष्पाप व्यक्तियों को तुम दूर से ही त्याग देना- हे कमलनयन ! हे वासदेव ! हे विष्णो ! हे धरणिधर ! हे अच्युत ! हे शंख – चक्र – पाणे ! आप हमें शरण दीजिए..
जिस पुरुषश्रेष्ठ के अंत:करण में वे अव्ययात्मा भगवान विराजते हैं उसका जहां तक दृष्टिपात होता हैं वहां तक भगवान के चक्र के प्रभाव से अपने बल-वीर्य नष्ट हो जाने के कारण तुम्हारी अथवा मेरी गति नहीं हो सकती | वह तो अन्य लोकों का पात्र है।
कालिंग बोला ;– हे कुरुवर ! अपने दूत को शिक्षा देने के लिये सुर्य पुत्र धर्मराज ने उससे इस प्रकार कहा | मुझसे यह प्रसंग उस जातिस्मर मुनिने कहा था और मैंने यह सम्पूर्ण कथा तुमको सुना दी है।
अंत में भीष्म ने नकुल से कहीं ये बात
श्रीभीष्मजी बोले ;– हे नकुल ! पूर्वकाल में कलिंगदेश में आये हुए उस महात्मा ब्राह्मण ने प्रसन्न होकर मुझे यह सब विषय सुनाया था। हे वत्स ! वही सम्पूर्ण वृतांत, जिस प्रकार कि इस संसार-सागर में एक विष्णु भगवान को छोडकर जीव का और कोई भी रक्षक नहीं हैं। मैंने जैसा सुना वैसे ही तुम्हें सुना दिया। जिसका ह्रदय निरंतर भगवत्परायण रहता हैं उसका यम, यमदूत, यमपाश, यमदंड अथवा यम-यातना कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।
नकुलैतन्ममाख्यातं पूर्वं तेन द्विजन्मना ।
कलिङ्गदेशादभ्येत्य प्रीतेन सुमहात्मना ॥ ३६
मयाप्येतद्यथान्यायं सम्यग्वत्स तवोदितम् ।
यथा विष्णुमृते नान्यत्राणं संसारसागरे ॥ ३७
किंकराः पाशदण्डाश्च न यमो न चयातनाः ।
समर्थास्तस्य यस्यात्मा केशवालम्बनस्सदा ॥ ३८
डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। जनसत्ता इन कथाओं की ऐतिहासिकता या वैज्ञानिक प्रमाण की पुष्टि नहीं करता है।
