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दानवीर बैरागी राजा

भारत के बैरागी संतो के जीवन आयाम में भिक्षु जीवन से लेकर राज सिंहासन तक के अनुभव शामिल रहे हैं।

राज सिंह

भारत के बैरागी संतो के जीवन आयाम में भिक्षु जीवन से लेकर राज सिंहासन तक के अनुभव शामिल रहे हैं। सैकड़ों वर्षो तक विदेशी शासकों ने सनातन धर्म को मिटाने के लिए अथक प्रयत्न किए। लेकिन इन साधु संतों ने न केवल धर्म का प्रचार प्रसार जारी रखा बल्कि अखाड़ों के रूप में सशस्त्र सेना बनाकर मठ मंदिरों की रक्षा की। स्वतंत्रता संग्राम में इन संतों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया और अनेक संतों ने अपने जीवन का बलिदान दिया।

वर्ष 1947 में देश अंग्रेजों से आजाद हो गया और 562 छोटी बड़ी देसी रियासतों का भारत या पाकिस्तान में विलय हो गया। इन देसी रियासतों के राजाओं के पास अपार संपत्ति थी जो जनता के खून-पसीने की कमाई से वसूले हुए लगान से बनी थी। इन राजाओं में इस सार्वजनिक संपत्ति को निजी संपत्ति बनाने की होड़ लग गई। इतनी जन संपत्ति को निजी संपत्ति बना लिया कि आने वाली 25 पीढ़ियों को कभी कुछ कमाने की जरूरत ही ना पड़े।

स्वतंत्रता के समय इन 562 रियासतों में से दो रियासत ऐसी भी थी जहां पर लगभग 200 वर्षों से बैरागी संतो का शासन था। ये रियासतें थी छत्तीसगढ़ में राजनांदगांव और छुई खदान। 1 जनवरी 1948 को इन दोनों रियासतों ने भी भारत में विलय की संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। ये दोनों रियासतें पेक्षाकृत बहुत छोटी रियासतें थीं। अत: इनके पास अपार संपत्ति या बड़ा खजाना तो नहीं था लेकिन साधु प्रवृत्ति और करुणा से भरा हुआ इनका हृदय बहुत बड़ा था। राज्य संपदा को व्यक्तिगत संपदा बनाकर भोगना इनका लक्ष्य नहीं था। इनका लक्ष्य था सर्वजन कल्याण, ताकि आजादी से उत्पन्न हुई विकास की धारा को पूरे राज्य में प्रवाहित किया जा सके।

राजनांदगांव के आखिरी राजा थे, निमोर्ही अखाड़े के संत और निंबार्क संप्रदाय से संबंध रखने वाले महंत राजा दिग्विजय दास। राजा दिग्विजय दास ने संपूर्ण राज्य संपदा भारत सरकार को सौंप दी। राजा के पास राजनांदगांव में एक भव्य राज महल भी था। इस राजमहल के दोनों ओर रानी सागर और बूढ़ा सागर नाम के दो रमणीक सरोवर भी थे। राजा का मानना था कि जनता से संग्रह किए गए लगान से बनाया हुआ राजमहल भी निजी संपत्ति नहीं हो सकता।

उन्होंने यह राजमहल भी सरकार को इस निवेदन के साथ सौंप दिया कि यहां पर एक कालेज चलाया जाए। इस प्रकार वर्ष 1952 में सरकार ने राजा दिग्विजय दास के नाम पर इस राज महल में दिग्विजय दास महाविद्यालय की स्थापना की जो आज भी छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा महाविद्यालय है। छत्तीसगढ़ का रायपुर शहर यद्यपि इन बैरागी राजाओं की रियासत का हिस्सा नहीं था लेकिन इसके विकास में राजनांदगांव के राजाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।

छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति को सहेजने और संवारने के लिए वर्ष 1875 में बैरागी राजा महंत घासीदास ने रायपुर शहर के मध्य में 5 एकड़ जमीन में एक सांस्कृतिक संग्रहालय का निर्माण किया। देश के 10 प्राचीनतम संग्रहालयों में शामिल, महंत घासीदास संग्रहालय के नाम से प्रसिद्ध यह धरोहर राजभवन के पास ही स्थित है। देवी देवताओं की पत्थर से बनी हुई प्राचीन प्रतिमाओं के साथ-साथ इस संग्रहालय में छत्तीसगढ़ की जनजातियां संस्कृति की अनेक कलाकृतियां मौजूद हैं।

राजा घासीदास ने अपने व्यक्तिगत संग्रह से 17 वीं शताब्दी में पत्थर से बनी हुई बनी हुई, नैतिक शिक्षा का उपदेश देती तीन बंदरों की मूर्तियां भी 1875 में इस संग्रहालय को भेंट की थी जो आज भी वहां सुरक्षित हैं। महात्मा गांधी को यह मूर्तियां इतनी पसंद आई कि दुनिया भर में इनका प्रचार किया और यह मूर्तियां बापू के तीन बंदर के नाम से प्रसिद्ध हो गई। रायपुर में पेयजल आपूर्ति के लिए राजनंदगांव के इन राजाओं ने एक वाटर वर्क्स और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं से सुसज्जित अस्पताल बनवाया। सैकड़ों एकड़ में बना रायपुर का सुप्रसिद्ध राजकुमार कॉलेज भी इन राजाओं द्वारा दान की गई राशि से बना।

19वीं सदी के उत्तरार्ध में छत्तीसगढ़ में भयंकर अकाल के कारण भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गई। करुणा सागर राजा लक्ष्मण दास ने खजाने के द्वार जनता के लिए खोल दिए। इसका अंग्रेजों ने कड़ा विरोध किया। राजा महंत लक्ष्मण दास अपनी आंखों के सामने जनता को भूख से तड़पते नहीं देख पाए और राज सिंहासन छोड़कर अयोध्या चले गए।

खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए राजनांदगांव का राजा सर्वेश्वर दास हाकी स्टेडियम भी इन राजाओं के दान की हुई राशि से बना। स्वतंत्रता के बाद भी राजा दिग्विजय दास ने अपने पूर्वजों द्वारा बनाए गए रायपुर के महंत घासीदास संग्रहालय का पुनर्निर्माण करवाया जिसका लोकार्पण तत्कालीन राष्ट्रपति डा राजेंद्र प्रसाद ने किया। छत्तीसगढ़ के इन दानवीर बैरागी राजाओं के व्यवहार ने यह सिद्ध कर दिया की राज सिंहासन और राज संपदा व्यक्तिगत भोग की अपेक्षा जनकल्याण का साधन होते हैं।
(लेखक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हैं)

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