Ganesh Puran: धर्म ग्रंथों में देवी-देवताओं के क्रोध और उनके द्वारा दिए गए श्रापों के बारे में कई कथाएं है, जो हमें ये सिखाती है कि देवी-देवताओं का क्रोध अंत में किसी न किसी बड़े कल्याण का मार्ग खोलता है। ऐसे ही एक भगवान शनि देव से संबंधित कथा है। श्रीगणेश पुराण में वर्णित माता पार्वती और शनिदेव का प्रसंग भी कुछ ऐसा ही है। ये वह कथा है जब एक अनजानी भूल के कारण मां पार्वती से शनिदेव को श्राप दे दिया था। लेकिन जब वह शांत हुई, तो उन्होंने शनिदेव को योगीन्द्र और ग्रहों का राजा बना दिया था। आइए जानते हैं ‘धर्म गाथा’ की श्रृंखला में इस दिव्य कथा के बारे में जब माता पार्वती के कोप से शनिदेव का अंग-भंग हो गए थे और फिर उन्हें मिला योगियों में श्रेष्ठ होने का वरदान….

श्रीगणेश पुराण के सप्तम अध्याय में मां पार्वती अपने पुत्र गणेश के प्राकट्य के उपलक्ष्य में एक भव्य उत्सव का आयोजन करती हैं और इस बालक को देखने के लिए देवी-देवता आते हैं। ऐसे में शनिदेव की आते हैं। लेकिन उनकी पत्नी के द्वारा मिले श्राप के कारण वह सिर झुकाएं हुए खड़े थे। लेकिन मां पार्वती के कहने पर उन्होंने जैसे ही गणेश जी को देखा, तो उनका सिर छिन्न हो जाता है। ऐसे में मां पार्वती के व्याकुल होने पर श्री हरि विष्णु, शिव जी सहित अन्य देवी-देवता प्रयत्न करके गणेश जी से सिर में गजानन का सिर लगा देते हैं। लेकिन फिर भी मां पार्वती का गुस्सा शांत नहीं होता है।

शनिदेव को पार्वती का श्राप

शनि देव अब भी अपना सिर नीचा किए हुए खड़े। वे संकोच के कारण न तो जा सके और न उत्सव में ही भाग ले सके। तभी पार्वतीजी की दृष्टि शनिदेव पर पड़ी तो उन्हें क्रोध हो आया और उन्होंने शनिदेव को श्राप देते हुए कहा कि ‘तू सभा के मध्य ही अंगहीन हो जा।

“शनिं सलज्जितं दृष्ट्वा पार्वती कोपशालिनी।
शशाप च सभामध्येऽप्यङ्गहीनो भवेति च॥”

सूर्यदेव, कश्यप तथा यमराज का पार्वती पर क्रोधित होना

मां पार्वती का इस तरह से सूर्यपुत्र को श्राप देने से सूर्य देव भी क्रोधित हो जाते हैं और वह कहते हैं कि सभी उपस्थित सज्जन देख लें कि गिरिजा ने मेरे पुत्र को व्यर्थ ही श्राप दिया है। उस बेचारे का थोड़ा सा दोष नहीं था। वह मात्र गणेश जी के दर्शन करने आया था और मां पार्वती की आज्ञा के बाद देखाथा। फिर अब, जबकि बालक पुनर्जीवित हो गया और उसी उपलक्ष्य में उत्सव भी मनाया जा रहा है, तो इस अवस्था में उसे श्राप देने का प्रयोजन ही क्या था?’

सूर्यदेव की बात को सुनकर  कश्यप और यमराज भी क्रुद्ध हो जाते हैं और कहते हैं कि वास्तव में शनिदेव का कोई अपराध नहीं था।  फिर शनैश्चर तो लज्जा से सिर झुकाए खड़ा था। इसलिए उसे अभिशप्त करने की अपेक्षा उसपर दया करनी चाहिए थी। इसके साथ ही अन्य देव भी क्रोधित हो जाते हैं और सभी मां पार्वती और विष्णु जी को उनके कर्मों को याद दिखाते समय श्राप देने वाले थे। कभी ब्रह्मा जी ने सभी को शांत रहने के लिए कहा।

माता पार्वती की शरण में शनिदेव

ब्रह्माजी के समझाने पर महर्षि कश्यप और सूर्यदेव ने पुनः तर्क रखा कि शनिदेव तो पहले से ही पत्नी के शाप से दृष्टि-दोषी थे और मां पार्वती की आज्ञा के बाद ही उन्होंने बालक को देखा था। अतः जब तक उनके पुत्र के अंग-भंग (लंगड़ापन) के श्राप को रोका नहीं जाता, तब तक शांति संभव नहीं है।

तब ब्रह्माजी ने शनिदेव से कहा, “ग्रहेश्वर! तुम तुरंत ही देवी पार्वती की शरण में चलो। तुम्हारे श्राप का निवारण उन्हीं की कृपा से संभव है। इसके बाद सभी माता के पा पहुंचे और उनसे कहा कि इस निर्दोष के श्राप का प्रतिकार होना आवश्यक है।

माता पार्वती ने कुछ देर विचार किया और स्पष्ट किया, “पितामह! मेरा श्राप अमोघ है, उसका व्यर्थ होना किसी भी प्रकार संभव नहीं है।” लेकिन ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि की रक्षा और देवताओं के कोप को शांत करने के बार-बार आग्रह पर माता का हृदय करुणा से भर आया।

श्राप बना महावरदान: ‘योगीन्द्र’ स्वरूप की प्राप्ति

माता पार्वती ने मुस्कुराते हुए ब्रह्मा जी से कहा कि यदि वे श्राप दे सकती हैं, तो शनिदेव को वरदान भी दे सकती है। इसे और इनके पक्ष के सभी देवताओं को मैं वरदान से संतुष्ट कर दूंगी। ब्रह्मन्! आप उन सभी को यहां बुला लीजिए।

सूर्य आदि सभी वहां बुला लिए गए। उन्होंने आकर जगत जननी के चरणों में प्रणाम किया और जय-जयकार करते हुए बोल परमेश्वरी! कृपा करो। इस निर्दोष शनैश्चर को अपनी अनुग्राहात्मक दृष्टि से निहारिए।’

इस प्रकार से सूर्य, कश्यप आदि द्वारा की स्तुति से मां पार्वती संतुष्ट हो गईं और शनि के प्रति कहने लगीं…

“ग्रहराजो भव शने मद्वरेण हरिप्रियः।
चिरजीवी च योगीन्द्रो हरिभक्तस्य का विपत्॥

‘हे शने! तुम भगवान श्रीहरि के प्रिय हो। मेरे वरदान से ग्रहों के राजा होगे। योगियों में परम योगी रूप योगीन्द्र और चिरंजीवी बनोगे। अरे, हरि-भक्त का विपत्ति क्या कर सकती है? मेरा यह भी वर है कि भगवान श्रीहरि के तुम परम भक्त हो जाओ। तुम्हारे हृदय में उनकी दृढ़ भक्ति रहेगी। परन्तु वत्स! मेरा शाप अमोघ होने के कारण नष्ट तो नहीं हो सकता, किंतु उसका किञ्चित् प्रभाव पांव पर ही पड़कर रह जायेगा। तुम कुछ लंगड़े हो जाओगे।

माता पार्वती के इन करुणामयी वचनों को सुनकर शनिदेव को परम संतोष हुआ। उनके पैर में थोड़ा लंगड़ापन तो अवश्य रहा, लेकिन बदले में उन्हें ग्रहों के राजा, चिरंजीवी और महायोगी होने का गौरव प्राप्त हुआ। सूर्यदेव, कश्यप और यमराज सहित सभी देवता भी इस न्याय और अनुग्रह से अत्यंत संतुष्ट हुए और माता जगदम्बा की स्तुति करने लगे। अंत में, प्रसन्न मन से शनिदेव माता को प्रणाम कर अपने पिता सूर्या सहित अन्य देवताओं के साथ अपने लोक को प्रस्थान कर गए।

अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख लोक मान्यताओं और शिव महापुराण में वर्णित पारंपरिक पौराणिक कथाओं पर आधारित है। जनसत्ता डॉट कॉम (Jansatta.com) इसके ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण का दावा नहीं करता है। इसका उद्देश्य केवल पाठकों को सांस्कृतिक और धार्मिक प्रसंगों से अवगत कराना है