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सर्वग्राह्य साधना पद्धति ‘विपश्यना’

ओशो कहते हैं, ‘अगर तुम श्वास को ठीक से देखते रहो तो अनिवार्य रूपेण, अपरिहार्य रूप से, शरीर से अलग तुम जागने लगोगे।’

Author Updated: February 3, 2020 3:01 AM
आज हमारे समाज के बहुसंख्य लोगों का जीवन चिंता, तनाव और अवसाद से घिरा है।

आपने कभी सोचा है कि भविष्य की चिंता में हम अपने वर्तमान को किस तरह खराब कर रहे हैं! कारण साफ है कि हमारे दिमाग में यह बात बैठी हुई है कि अगर हमारा भविष्य सुरक्षित होगा तो हमें कोई चिंता नहीं रहेगी। भौतिक जीवन में अपने भविष्य के बारे में यह दृष्टिकोण उचित है लेकिन इसके लिए वर्तमान को चिंता में डालना सही नहीं है। इस चिंता से मुक्ति पाने का एक सहज और कारगर उपाय है विपश्यना साधना।

विपश्यना यानी अंतर्मन की गहराइयों तक जाकर आत्मनिरीक्षण द्वारा आत्मशुद्धि की साधना। इसे हम प्राणायाम और साक्षीभाव का मिला-जुला रूप कह सकते हैं। इस विधि के अनुसार हम अपने श्वास-प्रश्वास के प्रति सजग रह कर बिना कोई प्रतिक्रिया दिए खुद के भीतर की वास्तविकता का अवलोकन कर उसे महसूस करते हैं। कोई भी व्यक्ति इसकी शुरुआत प्राकृतिक सांस का निरीक्षण कर मन को केंद्रित करने के साथ कर सकता है तथा जागरूकता के साथ शरीर और मन के परिवर्तनों का अवलोकन कर तनाव, पीड़ा और अहंकार से मुक्ति की राह पर चल सकता है। सहज शांत जीवन जीने की यह कला हमारे दुखों के तीन मूल कारणों तृष्णा, घृणा और अज्ञानता को नष्ट करती है। इस विधा का साधक अपने जीवन की सुखद और दुखद परिस्थितियों में संतुलन बैठाकर अपनी सकारात्मक और रचनात्मक ऊर्जा का इस्तेमाल व्यक्ति व समाज की भलाई में करता है।

श्वास ही जीवन है और विपश्यना शरीर और आत्मा के बीच श्वास के पुल की तरह है जो न केवल हमारे विचारों और भावों को संचालित करती है बल्कि शरीर का संतुलन भी बनाए रखती है। सहज नैसर्गिक सांस के निरीक्षण से आरंभ करके अपने शरीर और चित्तधारा पर पल-पल होने वाली परिवर्तनशील घटनाओं को तटस्थ भाव से निरीक्षण करते हुए चित्त शोधन और सद्गुण संवर्द्धन का यह अभ्यास साधक को किसी सांप्रदायिक बंधन से बंधने नहीं देता। इसीलिए यह साधना विधि सर्वग्राह्य है। बिना किसी भेदभाव के सबसे लिए समान रूप से कल्याणकारी विपश्यना का उद्देश्य साधक को ईर्ष्या-द्वेष और लोभ, मोह व आसक्ति के दुर्गुणों से छुटकारा दिलाना है; ताकि हमारा समाज संकीर्ण जातीयता के विषैल अहंभाव के बंधनों से मुक्त हो स्वस्थ, सुखी बन सके, आत्म मंगल तथा सर्वमंगल की भावनाओं से परिपूर्ण विधेयात्मक और सृजनात्मक जीवन जीकर अपना जीवन सुधार सके।

आज हमारे समाज के बहुसंख्य लोगों का जीवन चिंता, तनाव और अवसाद से घिरा है। आतंकवाद, जातीय हिंसा, कुंठा व निराशा जनित नशाखोरी और आत्महत्याएं, दुष्कर्मों की बाढ़, महामारी के रूप में फैलता जानलवा पर्यावरण-प्रदूषण और नैतिक मूल्यों का गिरता स्तर वाकई चिंताजनक है। आगे बढ़ने की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में हम लोग दिन ब शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होते जा रहे हैं। इन परिस्थितियों से निजात पाने का कारगर तरीका है विपश्यना। जेलों में बंद कैदियों पर किए जाने वाले विपश्यना साधना के प्रयोगों के नतीजे काफी उत्साहवर्धक रहे हैं।

जैसा कि हम सभी अनुभव करते हैं कि मन में कोई भी विकार जागता है तो तत्क्षण सांस एवं संवेदनाओं को प्रभावित करता है। इस प्रकार सांस एवं संवेदनाओं को देख कर हम विकारों को देखते हैं, विकारों के आमुख होकर सच्चाई का सामना करते हैं तो शीघ्र ही देखते हैं कि ऐसा करने पर विकारों की ताकत कम होने लगती है और सतत अभ्यास से धीरे-धीरे इन विकारों का निर्मूलन हो जाता है। विकारों से मुक्त होते-होते हम सुख एवं शांति का जीवन जीने लग जाते हैं।

आत्मनिरीक्षण की यह विद्या हमें भीतर और बाहर दोनों सच्चाइयों से अवगत कराती है। शारीरिक और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है। नकारात्मकता दूर होने से मन में व्यर्थ के विचार आना बंद हो जाते हैं। मन में शांति का अनुभव होता है तथा मन और मष्तिष्क के स्वस्थ रहने पर इसका सीधा असर आपके शरीर पर पड़ता है। शरीर के सभी रोगों से मुक्ति मिलती है और देह निरोगी बनती है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि निरंतर ध्यानपूर्वक इसे करने से आत्म-साक्षात्कार होने लगता है तथा सिद्धियां अपने आप ही जाग्रत होने लगती है।

खास बात है कि औरों की सुख-शांति भंग न करने वाल इस मौन साधना के पालन का कोई विरोध नहीं भी है। आखिर अपने बारें में सच्चाई जानने वाली प्रज्ञा का, जिससे मन के विकार दूर होते हों, कोई विरोध करेगा भी तो क्यों!

ओशो कहते हैं, ‘अगर तुम श्वास को ठीक से देखते रहो तो अनिवार्य रूपेण, अपरिहार्य रूप से, शरीर से अलग तुम जागने लगोगे।’ विपश्यना साधना का मर्म ओशो के इस सूत्र में निहित है। वे कहते हैं कि जो श्वास को देखेगा, वह श्वास से भिन्न हो गया और जो श्वास से भिन्न हो गया वो शरीर से तो भिन्न हो ही गया। शरीर से छूटो, श्वास से छूटो, तभी शाश्वत का दर्शन होगा। ऐसा दर्शन जिसमें उड़ान है, ऊंचाई है, गहराई है। बाकी सब व्यर्थ की आपाधापी है।

पूनम नेगी

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