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जन्माष्टमी विशेष: कोरोना से फीकी हुई जन्माष्टमी, न शंख बजे न मंदिरों के घंटे

श्रीकृष्ण की महिमा मथुरा-वृंदावन की गलियों में रचाई रासलीलाओं में ही नहीं है। उनके ठाठ देखना है तो द्वारकाधीश जाइए। समुद्र पार कर भेंट द्वारका जाकर देखिए। ऐसे ही थोड़े कहा गया सारी भूमि गोपाल की। उनकी बाल लीलाएं सुनने में ही रोचक लगती है। सुनकर ही इंसान मंत्रमुग्ध हो जाता है।

Janmashtami 2020, Janmashtami puja, janmashtami aarti, bhagwan krishna, krishna ji i aarti, krishna aarti lyricsभगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि के समय हुआ था

कोरोना ने हिंदुओं के राष्ट्रीय त्योहार जन्माष्टमी के उत्सव को फीका कर दिया। मंदिरों के पट श्रद्धालुओं के लिए नहीं खोले गए। और मंदिर से श्रीकृष्ण जन्म की घंटियां भी सुनाई नहीं दी और न ही शंख फूंके गए। ऐसा शायद देश के इतिहास में पहली दफा हुआ है। हजारों साल की परंपरा टूट गई। भागलपुर ही नहीं पूरे देश में कोरोना ने यशोदानंदन का उत्सव मनाने से रोक दिया। लोगों ने घरों में ही कान्हा का जन्मोत्सव मनाया। और गाया नंद के घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की— । जिनने मंगलवार 11 को जन्माष्टमी नहीं मनाई वे आज 12 अगस्त को मना रहे है।

लेकिन श्रीकृष्ण की महिमा मथुरा-वृंदावन की गलियों में रचाई रासलीलाओं में ही नहीं है। उनके ठाठ देखना है तो द्वारकाधीश जाइए। समुद्र पार कर भेंट द्वारका जाकर देखिए। ऐसे ही थोड़े कहा गया सारी भूमि गोपाल की। उनकी बाल लीलाएं सुनने में ही रोचक लगती है। सुनकर ही इंसान मंत्रमुग्ध हो जाता है।

देवकी ने जन्म जरूर दिया। मगर यशोदा ने पाला। जन्म देने वाले से बड़ा ईश्वर ने पालने वाले का स्थान दिया है। यशोदा की कुर्बानी कम नहीं है। इसीलिए गाना या भजन भी बना ” यशोदा का नंद लाला बृज का उजाला है। मेरे लाल से सारा जग झिलमिलाए। “कृष्ण श्रीराम की तरह कभी मर्यादा में नहीं बंधे। कथावाचकों ने अपनी दुकानदारी चलाने के लिए कृष्ण को लीलाओं तक ही बांध कर रखा है। उनके सब रूपों का बखान नहीं किया। श्रीराम का चरित्र मर्यादित होने की वजह से मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहलाए।

मगर महाभारत के मैदान में श्रेष्ठ योद्धा अर्जुन ने गांडीव रख युद्ध लड़ने से मना किया तो अंदर का ज्ञान श्रीकृष्ण ने ही दिया था। और बोले मरना-मारना लीला है। ऐसे भी आत्मा कभी नहीं मरती। युद्ध के चश्मदीद बरबरी ने भी कहा था कि युद्ध के मैदान में श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र ही घूम रहा था। कृष्ण विराट है। राग है। रंग है। कृष्ण राजनीति और कूटनीति का संगम है। वे अवतार है। राम आंशिक तो कृष्ण पूर्ण परमात्मा है। उनकी सोच हमेशा सकारात्मक है। सूरदास के लिए कृष्ण हमेशा बालक है। उनकी व्याख्या करना धरती पर किसी के बूते की बात नहीं।

मगर कृष्ण तो महान है। परम योद्धा है। कृष्ण हमारे अंदर है। हमारी सांसों में है। मीरा ने इसी युग में कृष्ण को पाया। श्याम का रूप भी कृष्ण कन्हैया का ही है। श्याम तेरे कितने नाम। कोई मुरली मनोहर, घनश्याम, नटवर नागर, माखन चोर, रास रचिया, जय बिहारी जी जैसे कितने नामों से लोग पुकारते है।

कोई तो बेचारा डूबता रोजाना हरि, बनवारी, गिरधारी, छैला पुकारता बदहवास सा हो गया है। उसके प्रेम और फिर वियोग ने भक्तों को मूर्छित कर देता है। दवा की गोलियां खाने पर भी नींद नहीं आती। आधी रात को उठ सड़क पर निकल जाता है और पागलों की तरह नाम ले पुकारता है। यह श्रद्धालु का प्रेम है, आस्था है। मीरा को कन्हैया के सिवा कुछ नहीं दिखता था। उसके भाव में विष का प्याला पी गई।

श्याम की वंशी में बहुत ताकत है। जन्माष्टमी धूमधाम से ऐसे ही लोग नहीं मनाते है। भाव विभोर होकर जो उसे मनाता है वह सब कुछ दे देता है। ठगने पर बहुत कुछ ले लेता है। श्याम माखन चोर कहलाया। रास रचिया कहलाया। जन्म मथुरा में लिया। वृंदावन में रास रचाया। चिटकी अंगुली पर पर्वत उठा गोवर्धन, गिरधारी कहलाए। उनके रास रचाने के निशान वृंदावन में आज भी मिल जाएंगे। राजपाट करने के लिए द्वारकाधीश गए। वहां का ठाठ आज भी वैसे ही है। दिन में सात दफा उनकी आरती और प्रसाद बाकायदा राजसी ठाठ से लगाया जाता है।

भागलपुर के मंदिरों, ठाकुरवाड़ी समेत देश के दूसरे तमाम मंदिरों में मनाया जाने वाला उत्सव उसी परंपरा की कड़ी है। लोग बड़े उत्साह के साथ जन्माष्टमी मनाते है, मगर इस दफा सब फीका-फीका है। बांके बिहारी बड़े दयालु है। वे जो करते है पता नहीं चलता। सुदामा को जो उन्होंने दोस्त के नाते दिया वह आज भी मिसाल है। दुर्योधन जैसे दुष्ट को सबक सिखाया वह भी उदाहरण है।

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