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Chhath Puja 2018: जानिए छठ पूजा का महत्व और इतिहास

Chhath Puja 2018: छठ पूजा सूर्यदेव की कृपा पाने के लिए की जाती है। माना जाता है इससे घर में धन धान्य की प्राप्ति होती है और जिन महिलाओं को संतान नहीं होती है उनके लिए यह पूजा बहुत महत्वपूर्ण होती है, कहा जाता है छठ से सूर्यदेव को प्रसन्न करने से संतान सुख प्राप्त होता है।

Chhath Puja 2018: छठ पूजा सूर्यदेव की कृपा पाने के लिए की जाती है।

Chhath Puja 2018: छठ पर्व कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है। यह पर्व खास तौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश,बिहार और झारखंड में मनाया जाता है। इस पर्व में सूर्यदेव की पूजा की जाती है। यह पर्व चार दिनों तक चलता है। यह त्यौहार भैयादूज के तीसरे दिन बाद से शुरू हो जाता है। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को यह पर्व मनाया जाता है, इसलिए इस पर्व का नाम छठ पड़ा। छठ पूजा के दौरान लोग 36 घंटों तक उपवास रखते हैं। इस साल यह पर्व 13 और 14 नवंबर को मनाया जाएगा। छठ पूजा के दौरान डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार छठ सूर्य देव की बहन हैं और सूर्योपासना करने से छठ माता प्रसन्न होती है और घर में सुख-शांति और समृद्धि प्रदान करती है।

क्यों की जाती है छठ पूजा : छठ पूजा सूर्यदेव की कृपा पाने के लिए की जाती है। माना जाता है इससे घर में धन धान्य की प्राप्ति होती है और जिन महिलाओं को संतान नहीं होती है उनके लिए यह पूजा बहुत महत्वपूर्ण होती है, कहा जाता है छठ से सूर्यदेव को प्रसन्न करने से संतान सुख प्राप्त होता है।

छठ माता की उत्पत्ति: छठ माता को सूर्य देव की बहन माना जाता है। छठ कथा के अनुसार छठ माता भगवान की पुत्री देवसेना बताई गई हैं। अपने परिचय में वे कहती हैं कि वह प्रकृति की मूल प्रवृत्ति के छठवें अंश से उत्पन्न हुई हैं यही कारण है कि उन्हें षष्ठी कहा जाता है। संतान की चाहत रखने वाले जातक के लिए यह पूजा बहुत लाभकारी मानी जाती है। पौराणिक ग्रंथों में इसे रामायण काल में भगवान श्री राम के अयोध्या वापसी के बाद माता सीता के साथ मिलकर कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना करने से भी जोड़ा जाता है।

आइए जानते हैं चार दिन मनाये जाने वाले छठ पर्व के हर दिन का महत्व –

पहला दिन- नहाय खाए: पहले दिन नहाय खाए की रस्म होती है। घरों की सफाई के साथ आसपास की सफाई की जाती है। लोग घरों में तामसिक खुद्ध शाकाहरी खाना बनाते हैं। इस दिन व्रत करने वाले कद्दू की सब्जी, दाल-चावल खाते हैं।

दूसरा दिन- खरना: कार्तिक मास की शुक्ल पंचमी को खरना होता है। इस दिन निर्जल उपवास रखा जाता है। शाम को खाना खाया जाता है। इस रस्म को खरना कहा जाता है। शाम को चावल और गुड़ से खीर बनाई जाती है। इस खाने में नमक और चीनी का प्रयोग नही किया जाता है। इस दिन अपने पड़ोसियों एवं जान-पहचान के लोगों को प्रसाद ग्रहण करने के लिए बुलाया जाता है।

तीसरा दिन- संध्या अर्घ्य: कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को छठ पूजा का प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद में ठेकुआ का विशेष महत्व होता है, इसे टिकरी भी कहा जाता है। चावल के लड्डू भी बनाए जाते हैं, फिर शाम को प्रसाद और पूजा के फलों को बांस की टोकरी में सजाया जाता है। इस टोकरी को व्रती नदी या तालाब किनारे लेकर जाता है। शाम को व्रतधारी किसी नदी या तालाब में खड़े होकर अस्ताचालगामी सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस दौरान छठव्रती सूर्य देव को दूध और जल से अर्घ्य देते हैं और अपने बच्चों व परिवार के अन्य जनों की अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं।

चौथा दिन – उषा अर्घ्य : कार्तिक शुक्ल पक्ष की सप्तमी को व्रती ‘संध्या अर्ध्य’ विधि अनुसार पूरे परिवार के साथ उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं और विधिवत पूजा पाठ करने के बाद प्रसाद का वितरण करते हैं, जिसके बाद छठ पूजा का समापन होता है।

छठ पूजा 2018 : 13 नवंबर
छठ पूजा के दिन सूर्योदय : 6.41
छठ पूजा के दिन सूर्यास्त : 05.28
षष्ठी तिथि का आरंभ : 1.50 (13 नवंबर 2018)
षष्ठी तिथि की समाप्ति : 04.22 (14 नवंबर 2018)

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