Chaitra Navratri Day 1, Maa Shailputri Vrat Katha: हिंदू धर्म में नवरात्रि को साधना और भक्ति के लिए काफी पवित्र माना जाता है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के साथ चैत्र नवरात्रि आरंभ हो रही है। चैत्र नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के पहले स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा करने का विधान है। शास्त्रों के अनुसार मां शैलपुत्री को हिमालय की पुत्री हैं, जो हिमालय पर्वतों का राजा हैं। नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना करने के साथ विधिवत तरीके से शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इसके साथ ही इस व्रत कथा का पाठ या श्रवण अवश्य करना चाहिए। आइए जानते हैं मां शैलपुत्री की संपूर्ण व्रत कथा…

Chaitra Navratri 2026 Ghatasthapana: दुर्लभ योगों में होगी चैत्र नवरात्रि आरंभ, जानें कलश स्थापना का मुहूर्त, विधि, मंत्र, मां शैलपुत्री पूजा सहित अन्य जानकारी

मां शैलपुत्री को मां पार्वती के नाम से भी जाना जाता है और उनका विवाह पुनः भगवान शिव से ही हुआ। उनका निवास काशी नगरी वाराणसी में माना जाता है। जहां पर उनका एक प्राचीन मंदिर स्थित है। मान्यता है कि वहां दर्शन करने मात्र से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं।

मां शैलपुत्री का स्वरूप

मां शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और करुणामयी है। इनके दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित रहता है, जबकि वे नंदी बैल (वृषभ) पर आरूढ़ हैं। इनके मस्तक पर अर्धचंद्र विराजमान है, जो दिव्य ज्ञान और आकर्षण का प्रतीक माना जाता है।

मां शैलपुत्री की कथा (Maa Shailputri Vrat Katha)

मां शैलपुत्री को देवी सती के रूप में भी जाना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार प्रजापति दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया और सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन भगवान शिव को निमंत्रण नहीं दिया। देवी सती को विश्वास था कि उन्हें बुलाया जाएगा, लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो वे व्याकुल हो उठीं। भगवान शिव ने बिना निमंत्रण यज्ञ में जाने से मना किया, परंतु सती के बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने उन्हें जाने की अनुमति दे दी।

जब सती अपने पिता दक्ष के यज्ञ में पहुंचीं, तो उन्होंने देखा कि वहां कोई भी उनका आदर नहीं कर रहा है। केवल उनकी माता ने स्नेहपूर्वक उनका स्वागत किया, जबकि उनकी बहनों ने उनका उपहास किया और भगवान शिव का भी अपमान किया। स्वयं दक्ष ने भी उनका और उनके पति का तिरस्कार किया। यह सब देखकर सती अत्यंत दुखी और आहत हो गईं। अपने और अपने पति के अपमान को सहन न कर पाने के कारण उन्होंने उसी यज्ञ की अग्नि में स्वयं को समर्पित कर प्राण त्याग दिए।

जब भगवान शिव को इस घटना का पता चला, तो वे शोक और क्रोध से भर उठे। उन्होंने यज्ञ को नष्ट कर दिया। इसके बाद सती ने हिमालय के घर पुनर्जन्म लिया, जिस कारण उनका नाम शैलपुत्री पड़ा।

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डिसक्लेमर- यह लेख पूरी तरह से ज्योतिषीय गणनाओं और मान्यताओं पर आधारित है। जनसत्ता इसकी सत्यता या इससे होने वाले किसी भी लाभ-हानि की पुष्टि नहीं करता है। अधिक जानकारी के लिए पंचांग, शास्त्र या फिर किसी पंडित से अवश्य जानकारी लें।