Kab Hai Budh Pradosh Vrat: वैशाख माह का बुध प्रदोष व्रत अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना जाता है। यह व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है और जब यह बुधवार के दिन पड़ता है, तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। खास तौर पर बुध ग्रह से जुड़े दोषों को शांत करने और बुद्धि, वाणी व व्यापार में सफलता पाने के लिए यह व्रत बेहद फलदायी माना जाता है। इस साल वैखाश प्रदोष व्रत 15 अप्रैल यानी आज है। वहीं इस दिन इंद्र योग भी बन रहा है, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है। साथ ही कई अन्य योग भी बन रहे हैं। आइए जानते हैं तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त…
बुध प्रदोष व्रत की तिथि (Kab Hai Budh Pradosh Vrat)
फ्यूचर पंचांग के अनुसार, 15 अप्रैल दिन बुधवार को 12:12 ए एम पर वैशाख कृष्ण त्रयोदशी तिथि आरंभ होगी। वहीं इसका समापन 15 अप्रैल को ही रात 10 बजकर 31 मिनट पर होगा। ऐसे में उदयातिथि और प्रदोष पूजा मुहूर्त के आधार पर बुध प्रदोष व्रत 15 अप्रैल बुधवार को रखा जाएगा।
बुध प्रदोष व्रत पूजा शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार 15 अप्रैल को बुध प्रदोष व्रत की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम को 06 बजकर 47 मिनट से है, जो रात के 9 बजे तक मान्य है। वहीं प्रदोष के दिन ब्रह्म मुहूर्त 04:27 ए एम से लेकर 05:11 ए एम तक रहेगा। जो दान- स्नान के लिए शुभ रहेगा।
प्रदोष व्रत के मंत्र
महामृत्युंजय मंत्र
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
शिव गायत्री मंत्र
ऊँ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि, तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।
शिव आरोग्य मंत्र
माम् भयात् सवतो रक्ष श्रियम् सर्वदा।
आरोग्य देही में देव देव, देव नमोस्तुते।।
ओम त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।
भगवान शिव की आरती
जय शिव ओंकारा ॐ जय शिव ओंकारा ।
ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ जय शिव…॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे ।
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॐ जय शिव…॥
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
त्रिगुण रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ ॐ जय शिव…॥
अक्षमाला बनमाला रुण्डमाला धारी ।
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी ॥ ॐ जय शिव…॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे ।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥ ॐ जय शिव…॥
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता ।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता ॥ ॐ जय शिव…॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका ।
प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका ॥ ॐ जय शिव…॥
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी ।
नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ ॐ जय शिव…॥
त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे ।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॐ जय शिव…॥
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