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महाभारत: जानिए, भीष्म को कैसे मिली महाशक्ति

कुछ दिन बाद जब एक दिन शांतनु गंगा नदी के किनारे घूम रहे थे तब उन्हें वहां एक दिव्य युवक दिखा जो अपने वाणों से गंगा की धार को रोक रहा था। तभी वहां गंगा प्रकट हुईं और शांतनु को बताई कि वो उन्हीं का पुत्र है और उसका नाम देवद्रत है।

Author नई दिल्ली | February 12, 2019 10:56 AM
रथ पर सवार भीष्म पितामह।

महाभारत में एक से बढ़कर एक योद्धाओं ने भाग लिया। इसमें हर योद्धा की अपनी अलग विशेषता थी। इसी युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवत गीता के उपदेश भी दिए। इस युद्ध में महाशक्तिशाली भीष्म ने भी भाग लिया। जिनके शौर्य की गाथा चारों ओर फैली हुई थी। भीष्म पितामह के समान कोई और योद्धा नहीं था। महाभारत के 18 दिनों में दस दिनों तक सब ने उनका शौर्य देखा। लेकिन आपको शायद भीष्म पितामह के बारे में पूरी जानकारी नहीं होगी कि वो इतने शक्तिशाली कैसे बने? महाभारत के अनुसार जानते हैं कि भीष्म को महाशक्ति कैसे मिली?

दरअसल 33 मुख्य देवों में आठ वसु अपनी पत्नियों के साथ मेरु पर्वत पर आए। तब एक वसु प्रभास की पत्नी ने महर्षि वशिष्ठ की गाय कामधेनु देखी और उन्हें वो इतनी पसंद आई कि उन्होंने प्रभास से उसे चुराने को कहा। जिसके बाद प्रभास ने उस गाय का हरण कर लिया लेकिन जब महर्षि वशिष्ठ वापस आए तो पूरी बात जान गए। उन्होंने अष्ट वसु को श्राप दिया कि उन्हें अब मनुष्य जाति में जन्म लेना होगा। तब सब वसु के माफी मांगने के बाद महर्षि वशिष्ठ ने कहा कि जल्द ही सबको मनुष्य जाति से मुक्ति मिल जाएगी लेकिन प्रभास को लंबे समय मनुष्य जीवन जीना होगा। उसके बाद एक समय एक राजा शांतनु शिकार खेलने जंगल में गया था लेकिन उन्होंने नदी तट पर एक स्त्री को देखा और उनपर मोहित हो गए।

राजा शांतनु ने उस स्त्री से शादी का प्रस्ताव रखा इसे वो मान गई लेकिन उनकी एक शर्त थी कि शांतनु उन्हें किसी काम के लिए नहीं रोकेंगे। इस तरह समय बीतता गया और शांतनु की सात संताने हुईं लेकिन उस स्त्री ने एक एक कर सभी संतानों को नदी में डाल दिया। शांतनु चाहकर भी कुछ नहीं कर पाए परंतु जब उस स्त्री ने आठवीं संतान को गंगा नदी में डालना चाहा तो शांतनु ने उसे रोक दिया। पूछने पर उस स्त्री ने बताया कि ये सब संतानें वो वसु हैं जो महर्षि वशिष्ठ के श्राप के कारण मनुष्य जीवन में आए हैं और वो स्वयं गंगा हैं। इस तरह वो आठवीं संतान समेत गंगा नदी में चली गईं।

कुछ दिन बाद जब एक दिन शांतनु गंगा नदी के किनारे घूम रहे थे तब उन्हें वहां एक दिव्य युवक दिखा जो अपने वाणों से गंगा की धार को रोक रहा था। तभी वहां गंगा प्रकट हुईं और शांतनु को बताई कि वो उन्हीं का पुत्र है और उसका नाम देवद्रत है। इसने महर्षि वशिष्ठ से वेदों के अध्ययन किया है और परशुराम जी से अस्त्र-शस्त्र कला सीखी है। तब गंगा उस बालक को शांतनु को सौंपकर चली गईं। शांतनु ने देवव्रत को राजकुमार बनाया।

कहते हैं कि देवव्रत का नाम ही बाद में भीष्म पड़ा। उनका पराक्रम अपराजेय था। उन्हें वरदान मिला था कि उनकी इच्छा मृत्यु होगी। इस शक्ति से ही भीष्म पितामह ने महाभारत में प्रलय ला दिया था। फिर महाभारत में शीखंडी को आगे कर भीष्म पितामह पर वाणों के प्रहार किए गए। इस तरह 58 दिनों तक बाणों के बिस्तर पर रहने के बाद उन्होंने स्वयं ही प्राण त्याग दिए और उन्हें मनुष्य जाति से मुक्ति मिली।

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