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Bhishma Ashtami 2019 Vrat Katha: इस दिन भीष्म पितामह ने छोड़ा था अपना शरीर, ये है व्रत कथा

Bhishma Ashtami 2019 Vrat Katha: भीष्म यह सुनकर बडे दुःखी हुए और "आज जौ हरिहि न शस्त्र गहाऊँ" ऐसी प्रतिज्ञा की। इसके बाद घमासान युद्ध हुआ। भगवान श्रीकृष्ण को भीष्म प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए सुदर्शन चक्र को हाथ मे उठाना पड़ा।

Author नई दिल्ली | February 13, 2019 9:26 AM
भीष्म।

Bhishma Ashtami 2019 Vrat Katha: माघ माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को प्रतिवर्ष भीष्म अष्टमी (भीष्माष्टमी) के रूप में मनाया जाता है। इस बार यह 13 फरवरी, बुधवार (2019) को यानि आज मनाया जा रहा है। महाभारत के अनुसार इस दिन भीष्म पितामह ने अपने शरीर को छोड़ा था, इसीलिए यह दिन उनका निर्वाण दिवस है। माना जाता है कि इस दिन भीष्म पितामह की स्मृति के निमित्त जो श्रद्धालु कुश, तिल, जल के साथ श्राद्ध तर्पण करता है, उसे संतान तथा मोक्ष की प्राप्ति अवश्य होती है और पाप नष्ट हो जाते हैं। आज भीष्म अष्टमी पर जानते हैं व्रत कथा।

व्रत कथा: पौराणिक कथा के अनुसार – भीष्म पितामह (देवव्रत) हस्तिनापुर के राजा शांतनु की पटरानी गंगा की कोख से उत्पन्न हुए थे। एक समय की बात है। राजा शांतनु शिकार खेलते-खेलते गंगा तट के पार चले गए। वहां से लौटते वक्त उनकी भेंट हरिदास केवट की रूपवान पुत्री मत्स्यगंधा (सत्यवती) से हुई। शांतनु उसके लावण्य पर मोहित हो गए। राजा शान्तनु हरिदास से उसका अपने लिए हाथ मांगा लेकिन हरिदास ने राजा के प्रस्ताव को ठुकरा दिया कि महाराज आपका ज्येष्ठ पुत्र देवव्रत आपके राज्य का उत्तराधिकारी है यदि आप मेरी कन्या के पुत्र को राज्य उत्तराधिकारी बनाने की घोषणा करे तो मैं तैयार हूं।

शांतनु ने इस बात को मानने से मना कर दिया परन्तु मत्स्य गंधा को न भूला सके। उसकी याद में व्याकुल रहने लगे। एक दिन देवव्रत द्वारा उनसे उनकी व्याकुलता का कारण पूछने पर सारा वृतांत बताया। ज्ञान होने पर देवव्रत स्वयं केवट हरिदास के पास गये और गंगाजल हाथ में लेकर आजीवन अविवाहित रहने की शपथ ली। इसी कठिन प्रतिज्ञा के कारण उनका नाम भीष्म पड़ा। उनका पूरा जीवन सत्य और न्याय का पक्ष लेते हुए व्यतीत हुआ। राजा शांतनु ने देवव्रत से प्रसन्न होकर उसे इच्छित मृत्यु का वरदान दिया। कौरव पांडव युद्ध में दुर्योधन ने अपनी हार होती देख भीष्म पितामह पर शंका व्यक्त करते हुए कहा कि आप अधूरे मन से युद्ध कर रहे हैं। आपका मन पांडवों की तरफ है।

भीष्म यह सुनकर बडे दुःखी हुए और “आज जौ हरिहि न शस्त्र गहाऊँ” ऐसी प्रतिज्ञा की। इसके बाद घमासान युद्ध हुआ। भगवान श्रीकृष्ण को भीष्म प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए सुदर्शन चक्र को हाथ मे उठाना पड़ा। भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिज्ञा भंग होते ही भीष्म पितामह युद्ध बंद करके शरशैया पर लेट गए। कहते हैं कि महाभारत के युद्ध की समाप्ति पर जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण हुए तब भीष्म पितामह ने अपना शरीर त्याग दिया। इसलिए माघ शुक्ल अष्टमी उनकी पावन स्मृति में उत्सव के रूप में मनाते हैं।

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