Bhalchandra Sankashti Chaturthi Aarti: हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष रूप से भगवान गणेश को समर्पित माना जाता है। इसे व्रति जीवन के सभी संकटों से मुक्ति पाने और सुख-समृद्धि प्राप्त करने का अवसर मानते हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार, हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को यह व्रत रखा जाता है। चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विशेष रूप से भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किए गए व्रत और पूजा से व्यक्ति के जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं, सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और घर-परिवार में शांति और सुख का वातावरण बनता है। कहते हैं संकष्टी चतुर्थी का व्रत और पूजा गणेश जी की आरती के बिना अधूरी मानी जाती है। यही कारण है कि व्रत रखने वाले भक्त पूजा के बाद भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत की आरती अवश्य पढ़ते हैं। मान्यता है कि इस आरती का पाठ करने से न केवल जीवन की बाधाओं से मुक्ति मिलती है, बल्कि आर्थिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत क्षेत्रों में सुख-समृद्धि भी आती है।
गणेश जी की आरती (Ganesh ji ki Aarti)
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी ।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी ॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
पान चढ़े फल चढ़े, और चढ़े मेवा ।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा ॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया ।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी ।
कामना को पूर्ण करो, जाऊं बलिहारी ॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व की जानकारी सामान्य मान्यताओं, पंचांग और धार्मिक ग्रंथों पर आधारित है। संकष्टी चतुर्थी का समय और विधि अलग-अलग क्षेत्रों या परंपराओं में भिन्न हो सकती है। जनसत्ता इसकी पूर्ण सत्यता या सटीक परिणामों का कोई दावा नहीं करता है। किसी भी त्योहार की तिथि या पूजा विधि के बारे में अंतिम निर्णय लेने से पहले अपने क्षेत्र के विद्वान ज्योतिषी या पुरोहित से परामर्श अवश्य लें।
