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रत्न धारण करने से पहले इस मंत्र के जाप के साथ कर लें ये काम तो मिलेगा लाभ

सर्वप्रथम रत्न धारण करने वाला स्नान कर, पूर्व की तरफ मुंह कर बैठ जाए एवं दाहिने हाथ में जल, कुमकुम, चावल, दूर्वा एवं दक्षिणा लेकर संकल्प करें-

किसी भी ग्रह के रत्न में जब तक प्राणप्रतिष्ठा नहीं की जाती वह तो रत्न निरर्थक-सा हो जाता है

किसी भी ग्रह के रत्न में जब तक प्राणप्रतिष्ठा नहीं की जाती वह तो रत्न निरर्थक-सा हो जाता है तथा उसके पहनने से कोई लाभ नहीं होता, क्योंकि पत्थर तो पत्थर ही है, इसलिए रत्न धारण करने वाले जातक को चाहिए कि शुभ मुहूर्त में प्राणप्रतिष्ठा करा देनी चाहिए। सर्वप्रथम रत्न धारण करने वाला स्नान कर, पूर्व की तरफ मुंह कर बैठ जाए एवं दाहिने हाथ में जल, कुमकुम, चावल, दूर्वा एवं दक्षिणा लेकर संकल्प करें-

‘ॐ विष्णु: विष्णु: श्रीमद्भागवतो महापुरूषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्री ब्राह्मणो द्वितीय परार्धे श्री श्वेत वाराह कल्पे सप्तमे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति में कलियुगे कालिप्रथमचरणे भारतवर्षे भरतखंडे जम्बू द्वीपे आर्यातवर्तान्तर्गत ब्रह्मावर्तेक देशे कन्याकुमारिका क्षेत्रे श्री महानद्योगंगा यतुनयो: पश्चिमे तटे नर्मदायां उत्तरे तटे विक्रम शके बौद्धावतारे देच ब्राह्मणानां सन्निधो प्रभवादि अमुक संवत्सरे अमुकायने अमुक नक्षत्रे अमुक राशिस्थिते चन्द्रे अमुक राशिस्थिते सूर्ये अमुक राशिस्थिते देवगुरो शेषेसु ग्रहेषु यथायथा स्थान स्थितितेषु सत्सु एवं ग्रण गुण विशेषण विशिष्टतायां पुण्यतिथौ अमुक गौत्रोSमुकशर्माहं ममात्मन श्रुतिस्मृति पुराणोक्त फलवाप्तये ममकमलत्रादिभि: सह सकलाधि व्यादि निरसनपूर्वक दीर्घायुष्य बलपुष्टि नेरुज्यादि अमुक ग्रह सम्बंधे अमुक रत्ने प्राणप्रतिष्ठा सिध्यर्थ करिष्ये।’

इसके पश्चात हाथ में जल-अक्षत लेकर प्राणप्रतिष्ठा मंत्र पढ़े-

‘ततो जलेन प्रक्षालय प्राण-प्रतिष्ठा कुर्यात।। प्रतिमाया: कपलौ दक्षिण पाणिना स्पष्ट्वा मंत्रा: पठनीया:।। अस्य श्री प्राणप्रतिष्ठा मंत्रस्य विष्णुरूदौ ऋषी ऋग्यजु: सामान्छिदांसि प्राणख्या देवता।। ॐ आं बीजं हीं शक्ति: क्रां कीलंय यं रं लं वं शं षं सं हं हं स: एत: शक्तय: मूर्ति प्रतिष्ठापन विनियोग:।। ॐ आं ह्मीं कों यं रं लं वं शं षं हं स: देवस्य प्राणा: इह पुरूच्चार्य देवस्य सर्वेनिन्द्रयाणी इह:। पुनरुच्चार्य देचस्य त्वक्पाणि पाद पस्थादीनि इह:। पुनरुच्चार्य देवस्य वाड्. मनश्चृतक्षु: श्रोत्र घ्राणानि इह्मगत्य सुखेन चिरं तिष्ठतु स्वाहा।। प्राणप्रतिष्ठाा विधाय ध्यायेत्।। ववं प्राणप्रतिष्ठाा कुत्वा षोडशोपचारै: पूज्येत्।।’

इस प्रकार प्राणप्रतिष्ठा कर विधिपूर्वक रत्न की पूजा कर अभिषेक करके मुद्रिका धारण करें। प्राणप्रतिष्ठा के उपरान्त अंगूठी को कच्चे दूध, मिश्री, शुद्ध घी देसी, गंगाजल, मधु और फूल के घोल में डालकर रख दें। स्नानादि से निवृत होकर धूप अगरबत्ती दिखाकर बतलायी गयी अंगुली में पहन लें। दिन व समय विद्वान ज्योतिषी से पूछ लें।

(साभार: पं. शशि मोहन बहल द्वारा लिखित पुस्तक ‘रत्न रंग और रुद्राक्ष’)

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