ताज़ा खबर
 

ब्रह्म व शस्त्र शक्तिके समन्वयक

जिस प्रकार देवनदी गंगा को धरती पर लाने का श्रेय राजा भगीरथ को जाता है ठीक उसी प्रकार पहले ब्रह्मकुंड (परशुराम कुंड) से और फिर लौहकुंड (प्रभु कुठार) पर हिमालय को काटकर ब्रह्मपुत्र जैसे उग्र महानद को धरती पर लाने का श्रेय परशुराम जी को जाता है।

सांकेतिक फोटो।

पूनम नेगी

जिस प्रकार देवनदी गंगा को धरती पर लाने का श्रेय राजा भगीरथ को जाता है ठीक उसी प्रकार पहले ब्रह्मकुंड (परशुराम कुंड) से और फिर लौहकुंड (प्रभु कुठार) पर हिमालय को काटकर ब्रह्मपुत्र जैसे उग्र महानद को धरती पर लाने का श्रेय परशुराम जी को जाता है। यह भी कहा जाता है कि गंगा की सहयोगी नदी रामगंगा को वे अपने पिता जमदग्नि की आज्ञा से धरा पर लाए थे। तमाम पौराणिक उद्धरणों के अनुसार केरल, कन्याकुमारी व रामेश्वरम की स्थापना भगवान परशुराम ने ही की थी।

भृगुकुल शिरोमणि परशुराम जी ऋषियों के ओज और क्षत्रियों के तेज दोनों का अद्भुत संगम माने जाते हैं। इनके माता-पिता ऋषि जमदग्नि व रेणुका दोनों ही विलक्षण गुणों से सम्पन्न थे। जहां जमदग्नि जी को आग पर नियंत्रण पाने का वरदान प्राप्त था, वहीं माता रेणुका को पानी पर नियंत्रण पाने का।

देवराज इंद्र के वरदान के फलस्वरूप ऋषि दंपति की पांचवीं संतान के रूप में बैसाख माह की तृतीया को जन्मे परशुराम जी का प्रारंभिक नाम ह्यरामह्ण था जो कालान्तर में महादेव से परशु प्राप्त होने के बाद परशुराम हो गया। राम बालपन से ही बेहद साहसी, पराक्रमी, त्यागी व तपस्वी स्वभाव के थे। उन्होंने बहुत कम आयु में अपने पिता से धनुर्विद्या सीख ली थी। कहते हैं, महादेव शिव के प्रति विशेष श्रद्धा भाव के कारण एक बार बालक राम भगवान शंकर की आराधना करने कैलाश जा पहुंचे। वहां देवाधिदेव ने उनकी भक्ति और शक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अनेक अस्त्र-शस्त्रों सहित दिव्य परशु प्रदान किया।

परशुराम जी की गणना महान पितृभक्तों में होती है। श्रीमद्भागवत में एक दृष्टान्त है कि एक बार माता रेणुका स्नान करने व हवन हेतु जल लाने गंगा तट गईं। उस वक्त वहां गन्धर्वराज चित्ररथ अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे। रेणुका उनकी जलक्रीड़ा देखने में ऐसी निमग्न हो गईं कि उन्हें समय का बोध ही न रहा। जमदग्नि ऋषि को जब पता चला तो उन्होंने क्रोधित होकर अपने पुत्रों को मां का शीश काटने की आज्ञा दी।

प्रथम चारों पुत्रों ने पिता की आज्ञा नहीं मानी, किन्तु परशुराम ने पिता की आज्ञा पालन कर सिर काट दिया। कहते हैं कि अपनी आज्ञा की अवहेलना से क्रोधित हो जमदग्नि ने जहां अपने चार पुत्रों को जड़ हो जाने का श्राप दिया, वहीं परशुराम से प्रसन्न होकर वर मांगने को कहा। तब परशुराम ने पिता से वरदान में माता तथा अपने चारों भाइयों का पुनर्जीवन मांग कर न सिर्फ अपने हृदय की विशालता का परिचय दिया अपितु अपने पिता को भी उनकी भूल का भान करा दिया।

कहते हैं कि उन दिनों महिष्मती राज्य का हैहय क्षत्रिय कार्तवीर्य सहस्रार्जुन राजमद में मदान्ध था। समूची प्रजा उसके अत्याचार से त्राहि-त्राहि कर कर ही थी। भृगुवंशीय ब्राह्मणों (परशुरामजी के वंशजों) ने जब उसे रोकने का प्रयत्न किया तो अहंकार में भरे सहस्रार्जुन ने उनके आश्रम पर धावा बोलकर उसे तहस-नहस कर दिया। इस पर भी क्रोध शांत न हुआ तो उसने परशुराम जी के पिता ऋषि जमदग्नि पर हमला बोलकर उन्हें मार डाला। तब परशुराम जी ने अपने परशु से कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन को उसके समूचे कुल समेत मृत्युलोक पहुंचा दिया।

विदेहराज जनक की राजसभा में सीता स्वयंवर के दौरान श्रीराम द्वारा शिवधनुष तोड़ने पर परशुराम जी का क्रोध व राम के अनुज लक्ष्मण से उनका संवाद सनातनधर्मियों में सर्वविदित है। मगर उनकी महानता इस बात में है कि ज्यों ही उन्हें अवतारी श्रीराम के शौर्य, पराक्रम व धर्मनिष्ठा का बोध हुआ तो उन्होंने स्वत: दिव्य परशु सहित अपने समस्त अस्त्र-शस्त्र राम को सौंप दिए और महेन्द्र पर्वत पर तप करने के लिए चले गए।

Next Stories
1 विशेष संयोगों में मनाई जाएगी अक्षय तृतीया, जानिए दान-पुण्य और सोने की खरीदारी के लिए ये दिन क्यों होता है शुभ
2 ताजमहल से जुड़ी है बैरागी परंपरा
3 Akshaya Tritiya 2021: अक्षय तृतीया पर भूलकर भी ना करें ये काम, मां लक्ष्मी हो जाएंगी रुष्ट, जानिये क्या है मान्यता
ये  पढ़ा क्या?
X