वेदांत और विज्ञान का महामिलन

फेसबुक के हालिया एलान के बाद मेटावर्स के जरिए हमारी पूरी नस्ल के साईबोर्ग बन जाने का खतरा और रोमांच एक साथ बढ़ गया है।

क्षिप्रा माथुर

फेसबुक के हालिया एलान के बाद मेटावर्स के जरिए हमारी पूरी नस्ल के साईबोर्ग बन जाने का खतरा और रोमांच एक साथ बढ़ गया है। पर तकनीक और उससे जुड़ी संभावनाओं की दुनिया यहीं नहीं थमने वाली। चेतना, कामना और कल्पना के नए रचाव को क्वांटम विज्ञान के जरिए संभव होते देख रहे जानकार बता रहे हैं कि यह सब दुनिया के लिए अथाह ज्ञान और रोमांच का ऐसा अनुभव साबित होगा जो चमत्कार को जीने जैसा होगा।

दुनिया के जाहिर होने, सर्वशक्ति के मौजूद होने न होने, ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने, भौतिक जगत के पंचभूत में समाए होने और परमाणुओं की बाहरी-भीतरी हलचल के ताल्लुक समेत तमाम सवाल आस्था और विज्ञान दोनों की कुलबुलाहट के रहे हैं। दोनों अपने रास्ते पर चलते हुए कभी विरोध में खड़े दिखते हैं तो कभी इस बात पर अडिग कि आखिर दोनों सच की ही तलाश में तोे हैं। तर्क और आजमाइश से हासिल आधे-अधूरे जवाब के बीच दुनिया हमेशा से रोशनी, नरमी और गरमाहट को तवज्जो देती रही है। बल्कि उसी के बूते कायम भी रह पाई है। यही खूबियां एक दूसरे को महसूस कर पाने का जरिया है जो हमारी समझ के सिरे उलझने पर हमारी ताकत बनी रहती हैं।

अमेरिकी मानवविज्ञानी मारग्रेट मीड ने मुश्किल दौर में मददगार की तरह पेश आने को ही सभ्यता की पहली कोपल माना है और मुट्ठी भर मगर भरपूर लगन वाले लोगों को दुनिया को बदलने की सबसे बड़ी ताकत। इन्हीं चंद लोगों के खपने की वजह से आज हम यहां तक पहुंच पाए हैं जहां सोच के बड़े फलक के साथ लगातार खोजबीन करते हुए सच के करीब जाने की ललक है। अनजानी बातों को तलाशने की इन्सानी कसक ने भी ज्ञान और विज्ञान दोनों ठिकानों को भरपूर टटोला है और इसी वजह से हम हदों से बाहर जाकर अनहद तक पहुंचने का हौसला कर पाए हैं।

समाधान का अध्यात्म

एक नजरिया यह भी है कि जब और जहां आस्था और ज्ञान-विज्ञान की टकराहट सुनाई दी वहां सहलाने के लिए सिर्फ अध्यात्म ही बाकी रहा। वो अध्यात्म जो हर पंथ और मजहब के गुणगानों-किताबों में घुला-मिला रहा हैै। पन्ने दर पन्ने पलटते हुए किताबी तकरीरों से रूहानी मचान तक थाम कर ले जाने के लिए मचलते रहे अध्यात्म ने सभ्यताओं के हर दौर में इन्सानी बस्तियों के दिल-दिमाग को बहलाए रखा है। बल्कि कहें कि उसकी शैतानी फितूर को काबू में रखने में भी कुछ हद तक वही कामयाब हुआ है। सनातन परंपरा में ज्ञान और अध्यात्म को न्याय, सांख्य, योग और वेदांत के घेरे में देखने पर जितनी कशमकश दिखती है उतनी ही इस सोच की भी कि हर एक धारा की अपनी अहमियत है जो एक दूसरे को लांघने में नाकाम रही है। हर एक की गहराई इतनी है कि जो जिसे मान ले, बस उसी कायदे से चलता चले। ‘एकम् सत विप्रा बहुधा वदन्ति’- उसी खुलेपन की बात है कि सच के कई चेहरे हैं, जो जैसा जिस तरह देख पाए, वही मुकम्मल।

ज्ञान और गणना

करीब-करीब यही टकराव विज्ञान की बहस और गणनाओं में भी नजर आता है। यहां भी फलसफे हैं, कायदे हैं, सुबूत हैं, सही-गलत साबित करने के औजार हैं। मगर कहे-लिखे-सुने को जमीनी जामा पहनाए बगैर विज्ञान कभी राजी नहीं होता और अपने ही तय खाकों को चुनौती दे-देकर नए उसूल बनाता जाता है। बहता हुआ विज्ञान कुछ मायने में ज्ञान परंपरा से आगे दौड़ जाता है क्योंकि वो अपने को भी शक की निगाह से देखने से परहेज नहीं करता। विज्ञान और अध्यात्म एक के बाद एक तमाम रहस्यों से पर्दा उठाते हुए वहां तक दस्तक दे चुका है जहां हम पूरी कायनात का अक्स इन्सानी प्रयोगशालाओं में देखने और उसे दर्ज करने के करीब पहुंच रहे हैं।

चांद तक पहुंचा देने वाला न्यूटोनियन विज्ञान, सितारों और आकाशीय दुनिया में अपने ही कायदों से पलटकर आइंस्टीनियन सापेक्षवाद को आजमाने लगता है। धरती और आकाश से परे जब परम-अणु के भीतर झांकता है तो उसकी सारी ताबीर पुराने को खारिज कर नए सिरे से लिखी नजर आती है। वहां क्वांटा की अलहदा दुनिया है जिसे बेहद रहस्यमयी मानकर यकीन न कर पाने वाला विज्ञान आखिरकार उसे ही सदी की सबसे अहम खोज कहकर एकदम नई सदी में दाखिल होने के लिए कमर कस रहा है। वो दौर जो कछुए की चाल से नहीं, रोशनी से भी तेज चलकर हमें खरबों साल आगे ले जाने में कामयाब होगा बशर्ते हम उसके मकसद में तालीम, इल्म, सेहत और तरक्की की सारी खाइयां पाटने का इरादा भी शामिल रख पाएं।

इनकार से चमत्कार तक

भारत के ब्रितानी राज से आजाद होने की तारीख से करीब दशक भर पहले आइंस्टीन ने क्वांटा हरकतों को ‘स्पूकी’ यानी डरावना कहकर उसे असल मानने से इनकार कर दिया था। एक ओर जमीन और जे़हन पर कब्जा करने वाली हुकमतें अपने अहम पर पड़ रही चोटों से तिलमिलाई हुई थीं। नस्लवाद, रंगभेद और कबीलाई फितरत को दुनिया भर से खदेड़ा जा रहा था तो इधर विज्ञान अपने मकसद से कतई नहीं डिगा था। उसके पैर अपनी जमीन में गड़े थे क्योंकि उसे राजनीति और समाज की जंगी साजिशों से परे जाकर वो सारे भेद तलाशने थे जिनके सही इस्तेमाल से दुनिया के कदम बेहतरी की ओर ही बढ़ने थे।

मैक्स प्लांक ने जिस क्वांटम का शगूफा छोड़ा था वो इस जल्दबाजी में कतई नहीं थी कि उसे आगे के दौर का कोई खाका खींचकर अपने करिश्माई होने का ऐलान करना है। जब भारत चीन के साथ सरहदी लड़ाई में अपना बड़ा इलाका खो चुका था, मात खा चुका था करीब-करीब उसी वक्त क्वांटम की दुनिया में स्टीवर्ट बैल ने विज्ञान का बड़ा इलाका फतह कर लिया था। उन्होंने क्वांटम के उस बर्ताव की झलक पा ली थी जो एक ही वक्तमें दूसरी जगह मौजूद रहकर एक-दूसरे से जुड़े रहने, संवाद करने का माद्दा रखता है।

आगे की राह
क्वांटम-जोड़ीदारी यानी ‘क्वांटम-एन्टेंगलमेंट’ की इस जादुई सी हकीकत को समझने में भौतिक विज्ञानियों का जितना वक्त लगा उतना उसे आजमाने में भी लगेगा इसका अंदाज सुपर कंप्यूटर से आगे के दौर के क्वांटम कंप्यूटर अभी से दे रहे हैं। इस साल नई विज्ञान, तकनीक और नवाचार नीति के अमल में आने के साथ ही भारत ने करीब 80 हजार करोड़ क्वांटम पर खर्च के लिए दिए हैं ताकि अपनी सरहदों की नहीं अपने बौद्धिक खजानों की भी हिफाजत करने में किसी से मात न खाए। अब जमीनों पर कब्जे, परमाणु हथियारों की दहशत और कारोबारी दायरा बढ़ाकर नहीं बल्कि क्वांटम में बाजी मारने वाले देश ही अब दुनिया के सरताज बनेंगे, इसमें कोई दो राय नहीं।

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