रमजान के पवित्र महीने का आखिरी अशरा चल रहा है और इसके साथ ही 13 मार्च यानी शुक्रवार को इस रमजान का आखिरी जुमा है जिसे ‘अलविदा जुम्मा’ के नाम से जाना जाता है। ये जुमा सिर्फ इस महीने का आखिरी शुक्रवार नहीं है, बल्कि आत्म-मंथन, इबादत और इंसानियत के प्रति अपने कर्तव्यों को याद करने का दिन है। मस्जिदों में उमड़ती भीड़ और नमाजियों के अल्लाह की बारगाह में उठते हुए हाथ अल्लाह से अपने गुनाहों की मांफी, आखिरत की मगफिरत, दुनिया में सुख चैन पाने की अपील करते हैं। रमजान का आखिरी जुमा इस बात की गवाही देता है कि रमजान की एक महीने की इबादत के बाद ईद की खुशियां बस अब दहलीज पर खड़ी हैं।
दिल्ली की ऐतिहासिक फतेहपुरी मस्जिद के मौजूदा शाही इमाम मुफ्ती मुकर्रम अहमद (Dr. Mufti Mohd. Mukarram Ahmed) एक प्रसिद्ध इस्लामिक विद्वान, लेखक और खतीब हैं ने बताया रमजान के तीन जुमे गुजर चुके हैं ये चौथा जुमा है जिसपर अलविदा की नमाज पढ़ाई जाएगी। अलविदा का जुमा खुशी का मौका है जिसदिन अल्लाह की इबादत की जाती है। इस महीने की इबादत का दर्जा अल्लाह दोगुना और चौगुना देता है। अलविदा की नमाज ईद की तैयारी का मौका देती है। इस दिन आस-पास के लोग शाही मस्जिद में नमाज पढ़ने आते हैं और ईद की खरीदारी भी करते हैं।
अलविदा का महत्व
रमजान के विदा होने का गम और ईद के आने की खुशी इन दोनों भावनाओं का संगम है अलविदा जुम्मा। इस्लामिक कैलेंडर में इस दिन की अहमियत बहुत खास है, क्योंकि ये इबादत की उस कड़ी का आखिरी हिस्सा है जो पूरे महीने चलती है। आज के दिन ज़कात और जरूरतमंदों की मदद पर खासतौर पर जोर दिया जाता है जो इंसानियत के सबसे बड़े धर्म को दर्शाता है।
अलविदा पर दुआओं का महत्व
मुफ्ती साहब ने बताया अलविदा जुम्मा पर दुआ करने का खास महत्व माना जाता है। लोग अपने लिए, परिवार के लिए और पूरी उम्मत की भलाई के लिए दुआ करते हैं। ये दिन अल्लाह से रहमत, बरकत और गुनाहों की माफी मांगने का भी मौका होता है। मुसलमान मस्जिदों में जाकर खास नमाज अदा करते हैं और अल्लाह से दुआ मांगते हैं कि उनके रोजे इबादत और नेक काम कबूल हों। अलविदा का दिन सिर्फ मजहबी नहीं, इंसानियत का पैगाम है। इस दिन दुआओं का खास महत्व।
रमजान खत्म होने पर फितरा और दान का महत्व
रमजान खत्म होने से पहले ‘सदका-ए-फितर’ देना मुसलमानों के लिए जरूरी है। फितरा और दान गरीब लोगों को दिया जाता है ताकि गरीबों की मदद की जा सके और वो ईद की तैयारियां कर सकें। रमजान के खत्म होने से पहले सदका-ए-फितर देना मुसलमानों के लिए जरूरी माना जाता है। ये दान गरीब और जरूरतमंद लोगों को दिया जाता है ताकि वे भी ईद की खुशियों में शामिल हो सकें। फितरा देने का मकसद रोज़ों में हुई छोटी-मोटी गलतियों की माफी मांगना और समाज के कमजोर वर्ग की मदद करना है। फितरा देने का मकसद बराबरी और भाईचारे का संदेश देना है।
अलविदा जुम्मा के बाद चांद का इंतजार
रमजान के आखिरी जुमे यानी अलविदा जुम्मा के बाद ईद का इंतजार शुरू हो जाता है। इसके बाद लोग ईद के चांद के दीदार का बेसब्री से इंतजार करते हैं। इस साल भारत में ईद कब होगी, इसे लेकर अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं। Mufti Mukarram Ahmed के मुताबिक अगर चांद नजर आता है तो भारत में आने वाले जुम्मे को ईद मनाई जा सकती है। हालांकि अंतिम फैसला चांद दिखने पर ही होता है।
बाजार और खरीदारी की रौनक
अलविदा जुम्मा के बाद ईद की तैयारियों के लिए बाजारों में खरीदारी का आखिरी दौर तेज हो जाता है। कपड़े, जूते, सेवइयां और ईद से जुड़ी चीजें खरीदने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है। Jama Masjid और Chandni Chowk जैसे बाजारों में देर रात तक रौनक रहती है। चांद रात तक यहां लोगों का हुजूम खरीदारी और ईद की तैयारियों में जुटा रहता है। क्योंकि इस दिन मस्जिदों में भारी भीड़ होती है, इसलिए प्रशासन की ओर से जारी सुरक्षा दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए लोगों से शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से इबादत करने की अपील की जाती है।
डिस्क्लेमर:
यह लेख धार्मिक मान्यताओं और विशेषज्ञों द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य केवल सामान्य जानकारी देना है। अलग-अलग जगहों पर धार्मिक परंपराएं, चांद दिखने का समय और तरीक़े अलग हो सकते हैं। पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी धार्मिक निर्णय या जानकारी के लिए स्थानीय उलेमा, मस्जिद या संबंधित धार्मिक प्राधिकरण की सलाह जरूर लें।
