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बिन श्रद्धालुओं के खुले चार धाम के कपाट

उत्तराखंड में चारों धाम के कपाट खुलने की प्रक्रिया अक्षय तृतीया के दिन यमुनोत्री के कपाट खुलने से शुरू होती है और बद्रीनाथ के कपाट खुलने के साथ ही संपन्न होती है।

बद्रीनाथ।

उत्तराखंड में चारों धाम के कपाट खुलने की प्रक्रिया अक्षय तृतीया के दिन यमुनोत्री के कपाट खुलने से शुरू होती है और बद्रीनाथ के कपाट खुलने के साथ ही संपन्न होती है। कोरोना के लगातार दो साल से जारी प्रकोप के कारण चार धाम के कपाट खुलने की प्रक्रिया में देश विदेश के आम श्रद्धालु भाग नहीं ले पाए। सीमित संख्या में यहां के पंडे पुजारी कोरोना के दिशा निदेर्शों के अनुसार पूजा पाठ करते हैं। आदि जगतगुरु शंकराचार्य ने बद्रीनाथ के कपाट खुलने के साथ ही ब्रह्म मुहूर्त में भगवान बद्री विशाल की पूजा आरती करने की परंपरा प्रतिपादित की थी। आदि गुरु शंकराचार्य की इस परंपरा को खंडित करने का प्रयास उत्तराखंड सरकार द्वारा हाल ही में बनाए गए देवस्थानम बोर्ड द्वारा किया जा रहा है जिसका देवभूमि में श्रद्धालु और पंडे पुजारी जबरदस्त विरोध कर रहे हैं।

अक्षय तृतीया पर परंपरा का होता है निर्वहन

यमुनोत्री धाम के कपाट अक्षय तृतीया 14 मई को अभिजीत मुहूर्त 12 बजकर 15 मिनट पर खोले गए थे। इसी के साथ चार धामों के कपाट खोलने की प्रक्रिया का शुभारंभ हुआ। यमुनोत्री की चलविग्रह डोली ने शीतकालीन गद्दीस्थल खरशाली (खुशीमठ) से प्रस्थान करती हैं। उनको विदा करने यमुना जी के छोटे भाई शनिदेव महाराज पहुंचते हैं ऐसी परंपरा है। यमुना जी यमराज की बहन मानी जाती हैं और यमराज भैया दूज के दिन पुण्य पावन टीका लगवाने बहन के घर आते हैं। इसलिए कहते हैं यमुनोत्री के दर्शन करने से मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।

यमुनोत्री के बाद खुलते हैं गंगोत्री के कपाट

छोटी बहन यमुनोत्री के कपाट खुलने के बाद ही उनकी बड़ी बहन गंगोत्री के मंदिर के कपाट खोलने की प्रक्रिया सदियों पुरानी चली आ रही है। धार्मिक परंपरा के अनुसार मां गंगा की चलविग्रह डोली शीतकालीन गद्दीस्थल मुखवा मुखीमठ से गंगोत्री धाम को प्रस्थान करती है और रात्रि प्रवास भैरव घाटी में करती है जहां से मां गंगा की डोली सुबह गंगोत्री धाम पहुंचती है। इन्हीं सब परंपराओं का निर्वहन करते हुए इस बार 15 मई शनिवार की सुबह 7 बजकर 31 मिनट पर श्री गंगोत्री धाम के कपाट खोले गए थे।

कोरोना महामारी के चलते हरिद्वार स्थित मां मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी महाराज ने पिछले साल की तरह ही इस साल गंगोत्री मंदिर की पूजा -अर्चना ,मां गंगा के भोग और वहां के पुजारियों के खाने-पीने की व्यवस्था का जिम्मा उठाया है। ग्यारहवें ज्योर्तिलिंग भगवान केदारनाथ धाम के कपाट विधि विधान पूर्वक मंत्रोचारण के साथ सोमवार 17 मई को मेष लग्न, पुनर्वसु नक्षत्र में सुबह पांच बजे खोले गए थे। कपाट खुलने की प्रक्रिया प्रात: तीन बजे से शुरू हो गई थी। मंदिर के कपाट खुलने के बाद मुख्य पुजारी ने स्वयंभू शिवलिंग को समाधि से जागृत किया तथा निर्वाण दर्शनों के पश्चात शृंगार तथा रूद्राभिषेक पूजाएं की गर्इं। केदारनाथ धाम के कपाट खुलने से दो दिन पहले केदारनाथ भगवान की चलविग्रह पंचमुखी डोली रात्रि विश्राम के लिए गौरीकुंड पहुंचती है। इस पंचमुखी दिव्य डोली को मंदिर में स्थापित किया जाता है।

बद्रीनाथ धाम के कपाट खोलने की परंपरा

बदरीनाथ धाम के कपाट 18 मई मंगलवार को खोले गए थे। मंदिर के कपाट खुलने की प्रक्रिया तड़के तीन बजे शुरू हो गई थी। इस प्रक्रिया के दौरान देश के आखिरी सीमांत माणा गांव के महिला मंडल द्वारा शीतकाल में कपाट बंद करते समय भगवान बद्री विशाल को ओढाया गया घृत: कंबल उतारा जाता है और प्रसाद स्वरूप वितरित किए जाने की सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन होता है। भगवान के निर्वाण दर्शन के बाद अभिषेक किया जाता है। संपूर्ण पूजा प्रक्रिया में रावल, डिमरी ,आचार्यों, हक हकूकधारियों, तीर्थ पुरोहितों की भूमिका अहम रहती है। कपाट खुलने से तीन दिन पहले बदरीनाथ धाम के मुख्य पुजारी रावल जोशीमठ में ज्योति पीठ में स्थित आदिगुरू शंकराचार्य की गद्दी और गाडू घड़ा ( तेलकलश) लेकर बद्रीनाथ की ओर प्रस्थान करते हैं। सुबह तड़के भगवान बद्री विशाल के कपाट खुलने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

कोरोना महामारी का दिखा प्रभाव

उत्तराखंड के चारों धाम के कपाट खोलते समय कोरोना महामारी का प्रकोप साफ-साफ दिखाई दिया। सीमित संख्या में मंदिर के पुजारी और सेवकों को मंदिर परिसर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी। सबके मुंह नाक मास्क से ढंके हुए थे। सामाजिक दूरी बनाई गई थी और थर्मल स्क्रीनिंग और सैनिटाइजेशन की व्यवस्था की गई थी। आम श्रद्धालुओं के प्रवेश पर पाबंदी रखी गई है।

कोरोना महामारी के कारण उत्तराखंड की चार धाम यात्रा शुरू नहीं हो पाई, जिससे यहां का पर्यटन व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित हुआ है। उत्तराखंड व्यापार मंडल के अध्यक्ष कैलाश केसवानी का कहना है कि उत्तराखंड के पर्यटन से जुड़े व्यवसाई और स्थानीय लोग दो साल से रोजी रोटी को मोहताज है और वे कोरोना महामारी की मार झेल रहे हैं। परंतु राज्य सरकार ने उनके लिए कोई आर्थिक पैकेज तक जारी नहीं किया है।

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