Adhik Maas 2026: हिंदू धर्म में अधिक मास का विशेष महत्व है। करीब 3 साल बाद आने वाले अधिक मास को पुरुषोत्तम मास, मलमास के नाम से भी जानते हैं। ये मास भगवान विष्णु का सबसे प्रिय माना जाता है। ऐसे में उनकी विधिवत पूजा करने से विशेष फलों की प्राप्ति होने के साथ कई तरह के पापों से भी मुक्ति मिल जाती है। इसके साथ ही इस अवधि में ब्रज की यात्रा करने से सभी तीर्थों की यात्रा करने के बराबर पुण्य की प्राप्ति हो सकती है। आइए जानते हैं अधिक मास में कैसे करें श्री विष्णु की पूजा, मंत्र, आरती और चालीसा.. यात्रा करने जितना पुण्य फल मिलता है।
बता दें कि अधिक मास करीब 3 साल बाद आता है, जब वर्ष में 12 नहीं बल्कि 13 महीने होते हैं। आमतौर पर हर माह के 30 दिन सौर कैलेंडर के हिसाब से होते हैं। लेकिन चंद्र कैलेंडर की गणना के मुताबिक, एक साल में 365 दिन और 6 घंटे होता है। लेकिन चंद्रमा का एक वर्ष 354 दिनों का होता है। ऐसे में हर साल 11 दिन का अंतर होता है। इसी के कारण 3 साल बाद ये अलग से एक पूरा माह हो जाता है, जो अधिक मास यानी पुरुषोत्तम मास कहलाता है।
अधिक मास में ऐसे करें श्री विष्णु की पूजा
पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु का पूजा करने के लिए सबसे सही षोडशोपचार पूजन माना जाता है, जो 16 क्रियाओं से परिपूर्ण मंत्रों के साथ होता है। इसकी शुरुआत ध्यान-प्रार्थना से होती हैं। इसके बाद आसन, पाद्य,अर्ध्य, आचमन,.स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंधाक्षत, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, दक्षिणा, जल आरती, मंत्र पुष्पांजलि और अंत में प्रदक्षिणा-नमस्कार एवं स्तुति होती है।
नियमित रूप से सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करके साफ वस्त्र धारण कर लें। अब सबसे पहले सूर्यदेव को अर्घ्य दें। इसके लिए एक तांबे के लोटे में जल, थोड़ा दूध, सिंदूर, अक्षत और लाल फूल डाल लें। अर्घ्य के बाद पूजा आरंभ करें। सबसे पहले विष्णु जी का पंचामृत, गंगाजल आदि से स्नान कराएं और साफ वस्त्र, आभूषण पहनाएं। इसके बाद फूल, माला और पीला चंदन लगाएं। फिर केसर युक्त खीर, मौसमी फल सहित अन्य भोग चढ़ाएं। फिर जल से आचमन करने के बाद घी का दीपक और धूप जलाकर श्री विष्णु जी के मंत्र, चालीसा और अंत में आरती कर लें।
श्री विष्णु मंत्र
अधिक मास के दौरान इस मंत्रों को रुद्राक्ष या फिर तुलसी माला से 108 बार करें।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
- नारायण मंत्र – ॐ नमो नारायणाय
- विष्णु गायत्री मंत्र- ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।
- शांति मंत्र- शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।
- विष्णु मंत्र- ॐ विष्णवे नमः या श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय।।
विष्णु चालीसा लिरिक्स (Vishnu Chalisa Lyrics)
विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥
॥ चौपाई ॥
नमो विष्णु भगवान खरारी,कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी,त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥
सुन्दर रूप मनोहर सूरत,सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।
तन पर पीताम्बर अति सोहत,बैजन्ती माला मन मोहत ॥
शंख चक्र कर गदा बिराजे,देखत दैत्य असुर दल भाजे ।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे,काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥
सन्तभक्त सज्जन मनरंजन,दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन,दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥
पाप काट भव सिन्धु उतारण,कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।
करत अनेक रूप प्रभु धारण,केवल आप भक्ति के कारण ॥
धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा,तब तुम रूप राम का धारा ।
भार उतार असुर दल मारा,रावण आदिक को संहारा ॥
आप वाराह रूप बनाया,हरण्याक्ष को मार गिराया ।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया,चौदह रतनन को निकलाया ॥
अमिलख असुरन द्वन्द मचाया,रूप मोहनी आप दिखाया ।
देवन को अमृत पान कराया,असुरन को छवि से बहलाया ॥
कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया,मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया,भस्मासुर को रूप दिखाया ॥
वेदन को जब असुर डुबाया,कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।
मोहित बनकर खलहि नचाया,उसही कर से भस्म कराया ॥
असुर जलन्धर अति बलदाई,शंकर से उन कीन्ह लडाई ।
हार पार शिव सकल बनाई,कीन सती से छल खल जाई ॥
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी,बतलाई सब विपत कहानी ।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी,वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥
देखत तीन दनुज शैतानी,वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी,हना असुर उर शिव शैतानी ॥
तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे,हिरणाकुश आदिक खल मारे ।
गणिका और अजामिल तारे,बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे ॥
हरहु सकल संताप हमारे,कृपा करहु हरि सिरजन हारे ।
देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे,दीन बन्धु भक्तन हितकारे ॥
चहत आपका सेवक दर्शन,करहु दया अपनी मधुसूदन ।
जानूं नहीं योग्य जब पूजन,होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन ॥
शीलदया सन्तोष सुलक्षण,विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण ।
करहुं आपका किस विधि पूजन,कुमति विलोक होत दुख भीषण ॥
करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण,कौन भांति मैं करहु समर्पण ।
सुर मुनि करत सदा सेवकाई हर्षित रहत परम गति पाई ॥.
दीन दुखिन पर सदा सहाई,निज जन जान लेव अपनाई ।
पाप दोष संताप नशाओ,भव बन्धन से मुक्त कराओ ॥
सुत सम्पति दे सुख उपजाओ,निज चरनन का दास बनाओ ।
निगम सदा ये विनय सुनावै,पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै ॥
॥ दोहा ॥
भक्त हृदय में वास करें पूर्ण कीजिये काज ।
शंख चक्र और गदा पद्म हे विष्णु महाराज ॥
विष्णु आरती लिरिक्स (Vishnu Aarti Lyrics)
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय जगदीश हरे…॥
डिसक्लेमर- यह लेख पूरी तरह से ज्योतिषीय गणनाओं और मान्यताओं पर आधारित है। जनसत्ता इसकी सत्यता या इससे होने वाले किसी भी लाभ-हानि की पुष्टि नहीं करता है। अधिक जानकारी के लिए पंचांग, शास्त्र या फिर किसी पंडित से अवश्य जानकारी लें।
