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पहाड़ की चढ़ाई पर ‘आप’का धीमा सफर

आम आदमी पाटी अभी तक केवल शिक्षा व स्वास्थ्य के अलावा बाकी मुददों पर ज्यादा बात भी नहीं कर रही है।

पहाड़ की चढ़ाई पर ‘आप’का धीमा सफर

ओमप्रकाश ठाकुर

अपनी बदलाव यात्रा के सहारे पहाड़ की चढाई चढ़ने में जुटी आम आदमी पार्टी चुनावों से चंद महीने पहले न तो सत्तासीन भाजपा और न ही विपक्षी पार्टी कांग्रेस को अभी बड़ी चुनौती देती दिख रही है, जबकि पार्टी को बदलाव यात्रा शुरू किए हुए कई दिन हो गए हैं। यह दीगर है कि सेल्फी विद स्कूल अभियान चलाकर स्कूलों की हालात को लेकर जयराम ठाकुर सरकार को जरूर कुछ बैचेन किया। इस मसले पर दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और प्रदेश के शिक्षा मंत्री गोविंद ठाकुर के बीच कुछ जुबानी जंग भी चली, लेकिन जब तक पार्टी के कहे व किए कि जनता में स्वीकार्यता बड़े पैमाने पर न हो तब तक सत्ता में आने का सपना देखना ही बेमानी ही है।

बेशक आम आदमी पार्टी ने प्रदेश में बदलाव यात्रा शुरू कर रखी है व वह हर विधानसभा हलके में अपने पांव भी धर रही है लेकिन सत्ता में आने के लिए जो जनसैलाब किसी पार्टी को चाहिए वह जमीन पर अभी कहीं नजर नहीं आ रहा है। मौजूदगी भर नजर आ रही है। हालांकि दिल्ली के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन के धनशोधन मामले में जेल में जाने के बाद अब प्रदेश में संगठन की बागडोर आम आदमी पार्टी के राज्य सभा सासंद संदीप पाठक के हाथ में है लेकिन अभी तक वे भी कोई ऐसी संभावना नहीं जगा पाए हैं कि प्रदेश की राजनीति में वह विकल्प बन कर उभर पाएंगे।

हालांकि पार्टी की भारी भरकम कार्यकारिणी घोषित की गई है लेकिन कोई ऐसा चेहरा सामने नहीं आया है जो जनता के बीच अपना प्रभाव छोड़ने की क्षमता रखता हो। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल का चेहरा था। पंजाब में भगवंत मान बेशक बड़ा चेहरा नहीं थे लेकिन वे सांसद थे। इसके अलावा कांग्रेस की फूट का भी पंजाब में आम आदमी पार्टी को पूरा फायदा मिला। कारण अन्य भी रहे थे। हिमाचल में कांग्रेस में वर्चस्व की जंग तो है लेकिन पंजाब जितनी ज्यादा फूट नहीं है कि कोई नेता एक दूसरे को उनके हलके में जाकर नुकसान पहुंचा सके।

आम आदमी पाटी अभी तक केवल शिक्षा व स्वास्थ्य के अलावा बाकी मुददों पर ज्यादा बात भी नहीं कर रही है। लेकिन इन्हीं दो मुद्दों को लेकर प्रदेश में तीसरा विकल्प खड़ा कर देना वह भी इतने कम समय में, आसान काम नहीं है। अभी तक कोई ऐसी टीम भी गठित नहीं की गई है जो जल, जंगल, जमीन से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर पर्यटन, कृषि समेत हिमाचल के मुददों पर गहरा अध्ययन कर सके। आर्थिकी से लेकर संसाधन जुटाने को लेकर कोई खाका लेकर भी पार्टी अभी सामने नहीं आई है। बिना प्रदेश के मसलों की समझ के पार्टी का आगे बढ़ना आसान नहीं है।

पार्टी के अध्यक्ष सुरजीत ठाकुर कहते भी है कि वे आंकड़ों के मायाजाल में नहीं फंसना चाहते। 70 साल से कांग्रेस व भाजपा आंकड़ों के ही मायाजाल में लोगों को फंसाती रही है। उनकी पार्टी जमीनी बदलाव के लिए काम कर रही है। वे कहते हैं कि शिक्षा व स्वास्थ्य के मुद्दे उनके लिए सर्वोपरि है। बाकी मसले उसके बाद हैं। शिक्षा का मसला भावनात्मक है।

लेकिन पार्टी गांवों-कस्बों में अभिभावकों को बड़े पैमाने पर इस मसले पर अपने साथ नहीं जोड़ पा रही है। राजधानी शिमला में ही जहां पर निजी स्कूलों की फीस की मोटी रकम से अभिभावक परेशान हैं, वहां पर भी का कुछ दखल नजर नहीं आ रहा है। शिमला नगर निगम चुनाव फिलहाल टल गए हैं।अन्यथा इन चुनावों में ही पता चल जाता कि पार्टी में कितना दमखम है। कायदे से तो पार्टी को अभी भी निगम के चुनावों को लेकर शहर में डेरा डाल देना चाहिए था। आखिर यह चुनाव विधानसभा चुनावों से पहले सेमीफाइनल से कम नहीं है। लेकिन कहीं शहर में कोई नजर नहीं आ रहा है। दिल्ली माडल के सहारे पहाड़ पर धीमी गति से आगे सरक रही अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी आगामी चंद महीने में किस रफ्ततार से चलती है, उससे ही तय होगा कि प्रदेश में इस पार्टी का भविष्य किस तरह का होगा।

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