ताज़ा खबर
 

एक मीट‍िंग में लेफ्ट से राइट हो गई थी योगी की राजनीत‍ि, वरना आज होते कम्‍युन‍िस्‍ट

योगी आदित्यनाथ के स्वभाव में ही 'बगावत' है। इसकी झलक छात्र राजनीति में ही दिख गई थी, जब एबीवीपी से टिकट न मिलने पर उन्होंने निर्दल ही छात्रसंघ चुनाव लड़ा था।कभी योगी लेफ्ट की राजनीति करने जा रहे थे, मगर बाद में सीनियर के कहने पर एबीवीपी से जुड़े।

Author नई दिल्ली | June 6, 2018 7:15 AM
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ(फाइल फोटो)

बात 1991 की है। जब योगी आदित्यनाथ बीएससी की पढ़ाई कर रहे थे। दाखिला लिया था उन्होंने कोटद्वार के राजकीय कॉलेज में। तब अजय सिंह बिष्ट नाम से ही पहचान थी।कॉलेज के दिनों में छात्र राजनीति ने योगी को आकर्षित किया। इसके लिए उन्हें जरूरत थी एक प्लेटफॉर्म की। कुछ दोस्तों ने उन्हें वामपंथी छात्र संगठन स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया(SFI) से जुड़ने की सलाह दी।तब योगी के रिश्तेदार जय प्रकाश उनके कॉलेज में ही पढ़ते थे, वह खुद वामपंथी छात्र संगठन के सदस्य हुआ करते थे। लिहाजा, उन्होंने भी योगी को वामपंथी राजनीति से जुड़ने के लिए काफी दबाव बनाया। योगी भी असमंजस में पड़ गए, इस बीच संयोग से उनकी भेंट सीनियर प्रमोद रावत से हुई।

प्रमोद ने उन्हें वामपंथी राजनीति के चक्कर में न फंसने की सलाह दी और उन्हें एक मीटिंग के लिए बुलाया। इस मीटिंग के जरिए प्रमोद ने योगी आदित्यनाथ की लेफ्ट की ओर मुड़ती राजनीति की दिशा को राइट की तरफ मोड़ दिया। तमाम कोशिशों के बाद प्रमोद उन्हें बीजेपी की छात्र इकाई एबीवीपी से जुड़ने के लिए राजी करने में सफल रहे। इन बातों का जिक्र है योगी आदित्यनाथ की जिंदगी पर लिखी गई शांतनु गुप्ता की अंग्रेजी में प्रकाशित किताब में। जिसका नाम है- द मंक हू विकम चीफ मिनिस्टर। इस किताब में शांतनु ने योगी आदित्यनाथ  के जीवन के बारे में कुछ रोचक जानकारियां दी हैं।

बहरहाल, प्रमोद रावत के कहने पर योगी आदित्यनाथ एबीवीपी से जुड़ गए। एबीवीपी मेंबर के तौर पर राम जन्मभूमि आंदोदन के दौरान वह महंथ अवैद्यनाथ के संपर्क में आए। योगी की चाल-ढाल और वाकपटुता से महंत अवैद्यनाथ काफी प्रभावित हुए और उसी वक्त उन्हें लगा मानो उन्होंने गोरक्षपीठ का उत्तराधिकारी खोज लिया है।हालांकि उन्होंने योगी आदित्यनाथ को बाद में महंत की गद्दी संभालने के लिए बुलाया।

नहीं मिला एबीवीपी से टिकटः बहरहाल एक साल से ज्यादा वक्त एबीवीपी में बिताने के बाद योगी आदित्यनाथ को लगा कि उन्हें चुनाव लड़ना चाहिए। वर्ष 1992 में योगी आदित्यनाथ ने कॉलेज में सचिव पद के लिए एबीवीपी से टिकट मांगा।उन्हें पूरी उम्मीद थी कि संगठन की सेवा देखते हुए टिकट जरूर मिलेगा। मगर ऐन वक्त पर योगी का टिकट काटकर दूसरे छात्रनेता को संगठन ने सौंप दिया। मगर योगी आदित्यनाथ ठहरे जिद्दी और उन्होंने एबीवीपी के उम्मीदवार के खिलाफ ही बतौर निर्दल उम्मीदवार ताल ठोंक दी। हालांकि जीवन के इस पहले चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।हार के लिहाज से यही आखिरी चुनाव भी साबित हुआ। बाद में योगी गोरखपुर से 26 साल की उम्र में सांसद बने और फिर लगातार जीतते हुए पांच बार सांसद रहे। अब जाकर मुख्यमंत्री बन गए।एबीवीपी से टिकट न मिलने पर बागी उम्मीदवार के तौर पर ताल ठोंकने की घटना बताती है कि योगी शुरुआत से बागी और जिद्दी रहे हैं।

पीएम मोदी के साथ योगी

कैसे पहुंचे गोरखपुरःपांच जून 1972 को जन्मे योगी आदित्यनाथ ने नवंबर 1993 में उत्तराखंड के पौढ़ी गढ़वाल का पैतृक गांव छोड़ दिया। परिवार और दोस्तों से एक शब्द भी नहीं बताया कि वह गोरक्षपीठ से जुड़ने जा रहे हैं। एक साल बाद परिवार को योगी आदित्यनाथ के बारे में तब पता चला कि जब एक स्थानीय अखबार में खबर छपी कि वह अब गोरक्षपीठ में अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी होंगे। परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई और पिता आनंद सिंह बिष्ट तथा माता सविता देवी गोरखपुर पहुंचे। वहां सन्यासी की वेशभूषा में योगी को देखकर दंग रह गए।इस मुलाकात के दो महीने बाद योगी आदित्यनाथ पैतृक गांव मां-बाप से भिक्षा लेने के लिए लौटे। दरअसल सन्यास की परंपरा में माता और पिता से भिक्षा लेने की परंपरा है।

PHOTOS: लखनऊ में योगी आदित्यनाथ संग शिल्पा शेट्टी पर टिकीं रहीं सबकी निगाहें

सियासी सफरः1998 में 26 वर्ष की अवस्था में  गुरु अवैद्यनाथ की परंपरागत गोरखपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़े और विजयी रहे। इसके बाद लगातार जीतते रहे। 2014 में पांचवी बार सांसद बने। विधानसभा चुनाव में बंपर सफलता के बाद पार्टी ने उन्हें 19 मार्च 2017 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का ताज सौंपा। करीब 44 साल में योगी सीएम बने। पारिवारिक पृष्ठिभूमि की बात करें तो बेहद सामान्य परिवार से नाता रहा। पिता आनंद सिंह बिष्ट फॉरेस्ट रेंजर की नौकरी करते थे। योगी कुल सात भाई- बहन हैं। सन्यासी बनने के बाद से परिवार से नाता टूट गया है।

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App