मानसून की बारिश के चलते यमुना पर बने हथिनीकुंड बैराज में जलप्रवाह बढ़ा लेकिन नदी में छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा कई दिनों तक नहीं बढ़ाई गई है। ‘साउथ एशिया नेटवर्क आन डैम्स, रीवर्स एंड पीपुल’ (एसएएनडीआरपी) की हालिया जारी की गई रिपोर्ट में दावा किया गया है पानी नहीं छोड़े जाने की वजह से दिल्ली के निचले हिस्से में यमुना की पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
एसएएनडीआरपी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि मानसून शुरू होने के बाद भी हथिनीकुंड बैराज पर पानी की आवक लगातार बढ़ी, लेकिन अतिरिक्त पानी का अधिकांश हिस्सा पश्चिमी व पूर्वी यमुना नहरों में मोड़ दिया गया। नदी में केवल गर्मियों के दौरान छोड़े जाने वाले न्यूनतम स्तर का पानी ही छोड़ा जाता रहा।
रिपोर्ट के मुताबिक, एक से पांच जुलाई के बीच बैराज पर औसत दैनिक जलप्रवाह लगभग 192 क्यूमेक्स से बढ़कर करीब 242 क्यूमेक्स हो गया, लेकिन नदी में छोड़ा जाने वाला पानी पूरे दिन लगभग 9.97 क्यूमेक्स (करीब 352 क्यूसेक) पर ही स्थिर रहा। यही स्थिति अगले सप्ताह भी बनी रही। आठ और नौ जुलाई को जलप्रवाह क्रमश: लगभग 390 और 442 क्यूमेक्स तक पहुंचने के बावजूद नदी में छोड़ा गया पानी ज्यादातर समय न्यूनतम स्तर पर ही रहा।
14 जुलाई तक भी जलप्रवाह अधिक होने के बावजूद नदी में छोड़ा जाने वाला पानी फिर लगभग 9.97 क्यूमेक्स पर लौट आया। दिल्ली में 22 किलोमीटर लंबे यमुना के हिस्से में अशोधित सीवर, औद्योगिक अपशिष्ट और शहरी बहाव मिलता है। मानसून में पर्याप्त जलप्रवाह न मिलने से नदी की प्राकृतिक रूप से प्रदूषकों को कम करने, तलछट को बहाने और बाढ़ क्षेत्र को पुनर्भरित करने की क्षमता प्रभावित होती है।
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सवा दो सौ साल में दिल्ली में यमुना नदी की चौड़ाई करीब 68 फीसद कम हो गई है। नदी का बहाव भी लगभग 89 फीसद घट गया है। वर्ष 1799 के नक्शे से यमुना नदी के बारे में अध्ययन में मदद मिली है। उस नक्शे में यमुना ज्यादा चौड़ी और मुक्त दिखाई देती है। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह पता लगाया है कि दिल्ली में 225 साल में मानव दखल और शहरीकरण की वजह से नदी पर क्या असर पड़ा है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
