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विश्व पुस्तक मेलाः समाज के साथ संवाद कर रहा किताबों का मेला

वरिष्ठ कवयित्री अनामिका कहती हैं, ‘पुस्तक मेले में सबसे अच्छा मुझे यह देख कर लगा कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा के छोटे कस्बों से झुंड बनाकर लड़कियां किताबें खरीदने पहुंची थीं।

Author January 12, 2018 02:54 am

दिल्ली के 26वें विश्व पुस्तक मेले में किताबों के साथ समाज का भी संवाद छाया हुआ है। किताब और समाज का यह रिश्ता कुछ कहता है। कविता, कहानी और शायरी के अलावा समाज के विमर्शों पर किताबों की मांग बढ़ी है। जिनके बारे में कल तक सिर्फ लिखा जा रहा था आज वो लिख भी रहे हैं और पाठक उन्हें खोज रहे हैं। जो पर्यावरण कल तक बादलों को घिरते देखने में सिमटा हुआ था आज वह भी बराबरी और भागीदारी की मांग कर किताबों के विमर्श में अपनी जगह बना चुका है। पुस्तक मेले से निकले पाठकों के मिजाज पर साहित्यकारों से बात।

साहित्य तो हर घर जानेवाली मुंहलगी बेटी है

वरिष्ठ कवयित्री अनामिका कहती हैं, ‘पुस्तक मेले में सबसे अच्छा मुझे यह देख कर लगा कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा के छोटे कस्बों से झुंड बनाकर लड़कियां किताबें खरीदने पहुंची थीं। पारंपरिक वेश-विन्यास की लड़कियां दोस्तों के साथ किताबों में गुम थीं। एक लड़की से मेरी बात हुई। उसके पिता चौकीदार का काम करते हैं और वह दिल्ली विश्वविद्यालय के आइपी कॉलेज में पढ़ती है। पुस्तक मेले में दिल्ली के अंदर एक छोटी सी दिल्ली दिख रही थी जो कस्बे से आती है और एक नई पहचान बनाती है’। समाजशास्त्रीय किताबों की बढ़ती मांगों को कैसे देखती हैं? इसे बहुत ही शुभ बताते हुए अनामिका कहती हैं, ‘समाज को देखने का तीन नजरिया तो है ही। समाजशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक और साहित्य व दार्शनिक। तीनों लेंस से समाज को समग्रता से समझा जाए। सत्य तो एक नायाब हीरा है जिसके कई कोण हैं। वह किसी व्यक्ति की जेब में तहा के रखे गए रूमाल की तरह नहीं है। साहित्य की कल्पना तो मुहल्ले की उस मुंहलगी बेटी की तरह की जा सकती है जो हर घर में जाती है। वह इतिहास, दर्शन, मनोविज्ञान हर जगह पहुंचती है, कोई अलगाव नहीं है। इंटरनेट से जुड़े युवा महाप्रलय से लेकर विलय और विध्वंस देख रहे हैं। वे जितनी खिड़कियां खोलेंगे उतना अच्छा रहेगा’।

लोगों को बांध रहा साहित्य का बढ़ता आयाम

साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत साहित्यकार नासिरा शर्मा कहती हैं कि किताब और मेले को लेकर मेरा अनुभव शानदार रहा। मैं यह मान ही नहीं सकती कि लोग पढ़ना नहीं चाहते। पुस्तक मेले में जहां भी कहानी, कविता पाठ या लेखकों से संवाद हो रहा था लोग रचनाकारों को सुनने के लिए लालायित थे। बैठने का इंतजाम नहीं था खड़े होकर कविता और कहानी का पाठ सुन रहे थे। मेरे मध्य पूर्व के लेखन को लोगों का जितना प्यार मिला तो मैं कह सकती हूं कि हिंदी के लोग नया पढ़ने के लिए हमेशा लालायित रहते हैं। आज पाठक नए आयाम तक पहुंच बढ़ाना चाहते हैं यह बहुत अच्छी बात है। दलित, स्त्री से लेकर पर्यावरण तक कितने सारे विषय हैं जिसमें नया लिखा और पढ़ा जा रहा है। इन विषयों पर लोग ज्यादा जानना और पढ़ना चाह रहे हैं और यह रुझान बहुत अच्छा है। इससे लोग अपनी स्थितियों के बारे में भी ज्यादा जान पाएंगे। साहित्य लोगों को बांध रहा है और विस्तार पा रहा है। पहले तो लोग हिंदी में अनुवाद करने में झिझकते थे। अब अनुवाद को भी प्रतिष्ठा मिलने लगी है। नए विषयों तक पाठकों की पहुंच बन रही है।

समाजशास्त्रीय विमर्श से भला होगा साहित्य का बढ़ता आयाम

आलोचक मैनेजर पांडेय कहते हैं ‘मैं खुद साहित्य और समाजशास्त्र का व्यक्ति हूं। अगर युवा साहित्य में समाजशास्त्रीय विमर्श की मांग कर रहे हैं तो यह बहुत अच्छा लक्षण है हिंदी साहित्य और पूरे देश भर के साहित्य के लिए। यह प्रवृत्ति क्रमश: बढ़ती गई तो साहित्य और समाज का भला होगा। समाज के सुख, दुख, चिंताओं और समस्याओं के साथ युवा पीढ़ी जुड़ेगी तो कई नए आयाम खुलेंगे। इसलिए मुझे लग रहा है कि यह बहुत अच्छी प्रवृत्ति है। साहित्य और आलोचना के समाजशास्त्र पर मेरी बहुत सी किताबें हैं।

 

 

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