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महिला कंडक्टरों ने कहा- शौचालय नहीं होने से कई घंटों तक पानी भी नहीं पीते, भीड़ में हर दिन होती हैं ऐसी समस्याएं

महिला कंडक्टरों को अपनी रोजमर्रा के कामकाज में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। खासकर शौचालय न होने की समस्या के चलते महिला बस कंडक्टर और ड्राइवर घंटों तक पानी भी नहीं पीती हैं।

प्रतीकात्मक फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

एक तरफ दुनियाभर में महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने के लिए जद्दोजहद जारी है। दूसरी तरफ उनके सामने पेशेवर जिंदगी की चुनौतियां कम होने का नाम नहीं ले रही है। बदलते समय के साथ लगभग हर पेशे में अब महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। बेंगलुरु की महिला कंडक्टरों ने भी अपनी समस्याएं सामने रखी हैं। महिला कंडक्टरों के लिए अपनी रोजी-रोटी कमाना इतना आसान नहीं है। इस दौरान अक्सर उन्हें बसों में धक्का-मुक्की, शौचालय जाने के लिए रूटीन ब्रेक न मिलने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (बीएमटीसी) में 33 हजार पुरुष बस कंडक्टर और 1512 महिला कंडक्टर हैं।

कर्नाटक लीगल सर्विस अथॉरिटी (केएलएसए) ने बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (बीएमटीसी) को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि जो महिला कंडक्टर गर्भवती है, उसे गर्भावस्था के दौरान कार्यालय का काम सौंपा जाए। महिला कंडक्टरों का कहना है कि ऐेसे समय में बस ड्यूटी संभालना उनके लिए किसी मुश्किल से कम नहीं होता है। बीएमटीसी की तरफ से 9 अप्रैल को लिखे गए इस पत्र में केएलएसए के सदस्य सचिव हंचाटे संजीव कुमार ने चेतावनी दी कि यदि परिवहन निगम ने गर्भवती महिला कंडक्टरों के हित में कार्य शर्तों में संशोधन नहीं किया तो वह उच्च न्यायालय का रूख करेंगे।

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टिकट बेचने के दौरान होती है परेशानीः अधिकांश महिला कंडक्टर यह बात स्वीकार करती हैं कि उन्हें नौकरी करने से पहले अंदाजा था कि किन परिस्थितियों में काम करना पड़ेगा। एक कंडक्टर मधुआर जो प्रतिदिन मैजेस्टिक-नंदिनी रूट से सफर करती हैं ने बताया कि जब वह टिकट बेचती हैं तो उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई बार उन्हें पुरुष सवारियों की प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। दूसरा मुद्दा जिस पर उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता है वह है शौचालय की समस्या।

शौचालय की समस्या के चलते नहीं पीतीं पानीः बहुत महिला कंडक्टर शौचालय की समस्या के चलते कई घंटों तक पानी भी नहीं पीती हैं। शहर की एकमात्र महिला ड्राइवर प्रेमा रामप्पा नबाबत्ती जो मैजेस्टिक और बेगुर के बीच बस चलाती हैं वे बतातीं हैं कि बेगुर तक पहुंचने के लिए उन्हें लगभग ढाई घंटे का समय लगता है। लेकिन रास्ते में कोई शौचालय न होने की वजह से चार घंटे तक पानी पीने से बचती हैं। वह बताती हैं कि मुख्य डिपो पर भी शौचालय अच्छी तरह से मेंटेन नहीं किए गए हैं। इसके अलावा बस कंडक्टर ललिता गौड़ा बताती हैं कि मासिक धर्म के समय शरीर में ऐंठन की समस्या हो जाती है और उन्हें घंटों तक खड़े रहना पड़ता है। ऐसे समय में पुरुष सहयोगियों को अपनी परेशानी बताते हुए वे असहज महसूस करती हैं।’

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