दिल्ली के जंतर मंतर पर CJP के नेतृत्व में हुए आंदोलन का यूपी के आगामी विधानसभा चुनाव पर कितना असर पड़ेगा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद गठबंधन भाजपा के लिए कितना मुफीद रहने वाला है, इसे लेकर राजनीति के स्थापित जानकारों के बीच चर्चाएं तेज हैं।

भाजपा और रालोद के बीच अभी सीटों को लेकर कोई औपचारिक सीधी वार्ता भी शुरू नहीं हुई है। पूर्व सांसद और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजनीति के प्रमुख जानकार रालोद नेता केसी त्यागी ने बताया कि उनकी पार्टी जिलों में अपने संगठन चुस्त-दुरूस्त कर रही है और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में लगी है। उन्होंने कहा कि बृज प्रदेश, हस्तिनापुर प्रदेश और रूहेलखंड की 85 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां रालोद एनडीए को जिताने और खुद भी जीत दर्ज करने का असर रखता है।

2022 में सपा और 2024 में बीजेपी संग लड़ा चुनाव

पिछला विधानसभा चुनाव रालोद ने सपा गठबंधन के साथ लड़ा था जिसमें उसके 33 उम्मीदवारों में से आठ ने जीत दर्ज की थी और 15 दूसरे स्थान पर रहे थे। बाद में हुए उपचुनाव में उसने खतौली सीट जीतकर अपनी संख्या नौ कर ली थी। रालोद ने 2024 का लोकसभा चुनाव भाजपा के साथ मिलकर लड़ा। बिजनौर में उसके युवा उम्मीदवार चंदन चौहान और बागपत से डा. राजकुमार सांगवान चुनाव जीते।

केसी त्यागी कहते हैं कि हमारी पार्टी का नारा है मजबूत आरएलडी-मजबूत एनडीए। उन्होंने दावा किया कि सीटों को लेकर उनका भाजपा से कोई विवाद नहीं होगा।

ज्यादातर जाटों का हमें मिलेगा समर्थन- राजेंद्र चौधरी

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और विधान परिषद सदस्य राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों का रूझान महत्वपूर्ण रहेगा और वह इस इलाके के बेहतर जानकार हैं, उस नाते वे मानते हैं कि भाजपा और आरएलडी गठबंधन को मुश्किल से 20-22 फीसद जाटों का ही समर्थन मिल पाएगा।

उन्होंने कहा कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने डिंपल यादव के बजाए जयंत चौधरी को राज्यसभा में भेजा था और उसी सांसद के नाते वह केंद्र में मंत्री बने हुए हैं। हमने उन्हें लोकसभा की सात सीटें दी थीं जबकि भाजपा में उन्हें दो सीटें ही मिल पाईं।

हरेंद्र मलिक बोले- जयंत चाहें तो अखिलेश से कर सकते हैं सिफारिश

वह कहते हैं कि हमें नहीं लगता कि रालोद वापस सपा गठबंधन में लौटेगा। यही बात पश्चिम के प्रमुख जाट नेता और मुजफ्फरनगर से सपा सांसद हरेंद्र मलिक कहते हैं। हरेंद्र मलिक का यह भी कहना है कि अगर जयंत चौधरी उनकी पार्टी के साथ आना चाहेंगे तो वह इसकी सिफारिश अपने अध्यक्ष अखिलेश यादव से कर सकते हैं। वे राजी होते हैं या नहीं इसके बारे में वे कुछ भी नहीं कह सकते हैं।

हरेंद्र मलिक का मानना है कि जाटों का रूझान सपा की ओर है। भाजपा के साथ जाटों के संबंध सहज नहीं रहते हैं। वह यह भी मानते हैं कि जयंत चौधरी जहां हैं वहीं रहेंगे।

क्या पश्चिम में बीजेपी की लोकप्रियता उतार पर?

चौधरी चरण सिंह और वीरेंद्र वर्मा के साथ काम कर चुके राजनीतिक चिंतक और बुद्धिजीवी चौधरी प्रीतम सिंह ने कहा कि आज भाजपा की लोकप्रियता उतार पर है। सरकार जरूर दबंगई के साथ चलाई जा रही है लेकिन लोग डर और खौफ वाली सरकार को पसंद नहीं करते हैं।

उन्होंने कहा कि नीट परीक्षाओं के पेपर लीक होने और बेरोजगारी एवं अन्य मुद्दों को लेकर छात्रों और युवाओं के आंदोलन का असर बिहार के बांकीपुर और मध्य प्रदेश के दतिया सीट के उपचुनाव में साफ दिखा। बिहार की सीट पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन सिन्हा और भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद के अपने बूथों पर भी भाजपा की हार का संदेश पढ़ा जाना चाहिए।

त्यागी और गुर्जर वोट भी महत्वपूर्ण

चौधरी प्रीतम सिंह रालोद के बारे में कहते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सियासी जानकार केसी त्यागी के रालोद में शामिल होने से जयंत चौधरी को लाभ मिल सकता है। केसी त्यागी पश्चिमी के सीटों के समीकरणों को ठीक से समझते हैं। अगर जिताऊ समीकरणों का ध्यान रखकर उम्मीदवार चयनित किए जाते हैं तो रालोद को फायदा हो सकता है लेकिन जहां तक जाटों के रूझान का सवाल है तो वह नहीं मानते कि 20-25 फीसद से ज्यादा जाट रालोद-भाजपा गठबंधन के पक्ष में जाएगा।

पश्चिम में गुर्जर मतदाताओं का रूझान भी मायने रखता है। संयोग से रालोद के बिजनौर सांसद गुर्जर किसान बिरादरी से आते हैं। इसी गठबंधन से सांसद रहे उनके पिता संजय चौहान और बाबा पहले उपमुख्यमंत्री चौधरी नारायण सिंह का गुर्जरों पर जबरदस्त प्रभाव है।

यह भी पढ़ें: मुश्किल हालात में बीजेपी की नैया पार लगा पाएंगे योगी?

सवाल है कि क्या योगी भाजपा को लगातार तीसरी बार सत्ता में ला पाएंगे और मुख्यमंत्री के पद पर फिर से आसीन होंगे। उनकी डगर बेहद कठिन प्रतीत हो रही है। पूरा लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें।